भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1483, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1483

इत्युक्तः स तदा तूष्णीमभूद् वायुस्ततोऽब्रवीत् । शृणु राजन् वसिष्ठस्य मुख्यं कर्म यशस्विनः ॥ १५ ॥ भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! उनके ऐसा कहनेपर भी कार्तवीर्य अर्जुन चुप ही रहा। तब वायु देवता फिर बोले—'राजन्! अब यशस्वी ब्राह्मण वसिष्ठ मुनिका श्रेष्ठ कर्म सुनो ॥ १५ ॥

आदित्याः सत्रमासन्त सरो वै मानसं प्रति । वसिष्ठं मनसा गत्वा ज्ञात्वा तत् तस्य गौरवम् ॥ १६ ॥ 'एक समय देवताओेंने वसिष्ठ मुनिके गौरवको जानकर मन-ही-मन उनकी शरण जाकर मानसरोवरके तटपर यज्ञ आरम्भ किया ॥ १६ ॥

यजमानांस्तु तान् दृष्ट्वा सर्वान् दीक्षानुकर्शितान् । हन्तुमैच्छन्त शैलाभाः खलिनो नाम दानवाः ॥ १७ ॥ 'समस्त देवता यज्ञकी दीक्षा लेकर दुबले हो रहे थे। उन्हें यज्ञ करते देख पर्वतके समान शरीरवाले 'खली' नामक दानवोंने उन सबको मार डालनेका विचार किया (फिर तो दोनों दलोंमें युद्ध छिड़ गया) ॥ १७ ॥

अदूरात् तु ततस्तेषां ब्रह्मदत्तवरं सरः । हताहता वै तत्रैते जीवन्त्याप्लुत्य दानवाः ॥ १८ ॥ 'उनके पास ही मानसरोवर था, जिसके लिये ब्रह्माजीके द्वारा दैत्योंको यह वरदान प्राप्त था कि 'इसमें डुबकी लगानेसे तुम्हें नूतन जीवन प्राप्त होगा'; अतः उस समय दानवोंमेंसे जो हताहत होते थे, उन्हें दूसरे दानव उठाकर सरोवरमें फेंक देते थे और वे उसके जलमें डुबकी लगाते ही जी उठते थे ॥ १८ ॥

ते प्रगृह्य महाघोरान् पर्वतान् परिघान् द्रुमान् । विक्षोभयन्तः सलिलमुत्थितं शतयोजनम् ॥ १९ ॥ अभ्यद्रवन्त देवांस्ते सहस्राणि दशैव हि । ततस्तैरर्दिता देवाः शरणं वासवं ययुः ॥ २० ॥ 'फिर सरोवरके जलको सौ योजन ऊँचे उछालते तथा हाथमें महाघोर पर्वत, परिघ एवं वृक्ष लिये हुए वे देवताओंपर टूट पड़ते थे। उन दानवोंकी संख्या दस हजारकी थी। जब उन्होंने देवताओंको अच्छी तरह पीड़ित किया, तब वे भागकर इन्द्रकी शरणमें गये ॥ १९-२० ॥

स च तैर्व्यथितः शक्रो वसिष्ठं शरणं ययौ । ततोऽभयं ददौ तेभ्यो वसिष्ठो भगवानृषिः ॥ २१ ॥ तदा तान् दुःखितान् ज्ञात्वा आनृशंस्यपरो मुनिः । अयत्नेनादहत् सर्वान् खलिनः स्वेन तेजसा ॥ २२ ॥