भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 149

सहस्रोदारपादाय सहस्रनयनाय च । सहस्रबाहवे चैव सहस्रवदनाय च ॥ 'जिनके सहस्रों उदर, सहस्रों पैर और सहस्रों नेत्र हैं, जो सहस्रों भुजाओं और सहस्रों मुखोंसे सुशोभित हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ।।

शुचिश्रवाय महते ऋतुसंवत्सराय च । ऋग्यजुःसामवक्त्राय अथर्वशिरसे नमः ॥ 'जिनका यश पवित्र है, जो महान् तथा ऋतु एवं संवत्सररूप हैं, ऋक्, यजुः और सामवेद जिनके मुख हैं तथा अथर्ववेद जिनका सिर है, उन नारायण-देवको नमस्कार है ।।

हृषीकेशाय कृष्णाय द्रुहिणोरुक्रमाय च । ब्रह्मेन्द्रकाय तार्क्ष्याय वराहायैकशृङ्गिणे ॥ 'जो हृषीकेश (सम्पूर्ण इन्द्रियोंके नियन्ता), कृष्ण (सच्चिदानन्दस्वरूप), द्रुहिण (ब्रह्मा), उरुक्रम (बहुत बड़े डग भरनेवाले त्रिविक्रम), ब्रह्मा एवं इन्द्ररूप, गरुडस्वरूप तथा एक सींगवाले वराहरूपधारी हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ।।

शिपिविष्टाय सत्याय हरयेऽथ शिखण्डिने । हुतायोर्ध्वाय वक्त्राय रौद्रानीकाय साधवे ॥ सिन्धवे सिन्धुवर्षघ्ने देवानां सिन्धवे नमः । 'जो शिपिविष्ट (तेजसे व्याप्त), सत्य, हरि और शिखण्डी (मोरपंखधारी श्रीकृष्ण) आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं, जो हुत (हविष्यको ग्रहण करनेवाले अग्निरूप), ऊर्ध्वमुख, रुद्रकी सेना, साधु, सिन्धु, समुद्रमें वर्षाका हनन करनेवाले तथा देवसिन्धु (गंगास्वरूप) हैं, उन भगवान् विष्णुको प्रणाम है ।।

गरुत्मते त्रिनेत्राय सुधामाय वृषावृषे ॥ सम्राडुग्रे संकृतये विरजे सम्भवे भवे । 'जो गरुडरूपधारी, तीन नेत्रोंसे युक्त (रुद्ररूप), उत्तम धामवाले, वृषावृष, धर्मपालक, सबके सम्राट्, उग्ररूपधारी, उत्तम कृतिवाले, रजोगुणरहित, सबकी उत्पत्तिके कारण तथा भवरूप हैं, उन श्रीहरिको नमस्कार है ।।

वृषाय वृषरूपाय विभवे भूर्भुवाय च ॥ दीप्तसृष्टाय यज्ञाय स्थिराय स्थविराय च । 'जो वृष (अभीष्ट वस्तुओंकी वर्षा करनेवाले), वृषरूप (धर्मस्वरूप), विभु (व्यापक) तथा भूर्लोक और भुवर्लोकमय हैं, जो तेजस्वी पुरुषोंद्वारा सम्पादित यज्ञरूप हैं, स्थिर हैं और स्थविरूप (वृद्ध) हैं, उन भगवान्को नमस्कार है ।।

अच्युताय तुषाराय वीराय च समाय च ॥ जिष्णवे पुरुहूताय वशिष्ठाय वराय च ।