महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 148, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंऋग्यजुःसामगानां च मधुराः सुस्वरा गिरः । इन अग्नियोंके समीप अक्षरोंका स्पष्ट उच्चारण करनेवाले तथा अपने प्रभावसे अदृश्य रहनेवाले, ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके विद्वानोंकी सुस्वर मधुर वाणी मैंने सुनी। उनके पद और अक्षर बहुत सुन्दर ढंगसे उच्चारित हो रहे थे ॥ तान्यनेकसहस्राणि परीयंस्तु महाजवात् । अपश्यमानस्तं देवं ततोऽहं व्यथितोऽभवम् ॥ मैं बड़े वेगसे वहाँके हजारों घरोंमें घूम आया; परंतु कहीं भी अपने उन आराध्यदेवको न देख सका, इससे मुझे बड़ी व्यथा हुई ॥ ततस्तेष्वग्निहोत्रेषु ज्वलत्सु विमलार्चिषु । भानुमत्सु न पश्यामि देवदेवं सनातनम् ॥ ततोऽहं तानि दीप्तानि परीय व्यथितेन्द्रियः । नान्तं तेषां प्रपश्यामि येनाहमिह चोदितः ॥ निर्मल ज्वालाओंसे युक्त वे अग्निहोत्र पूर्ववत् प्रकाशित हो रहे थे। उनके समीप भी मुझे कहीं सनातन देवाधिदेव श्रीहरि नहीं दिखायी दिये। तब मैं उन प्रदीप्त अग्निहोत्रोंकी परिक्रमा करते-करते थक गया। मेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं; परंतु उनका कहीं अन्त नहीं दिखायी दिया। जिन भगवान्ने मुझे यहाँ आनेके लिये प्रेरित किया था, उनका दर्शन नहीं हो सका ॥ एवं चिन्तासमापन्नः प्रध्यातुमुपचक्रमे । विनयावनतो भूत्वा नमश्चक्रे महात्मने ॥ अनादिनिधनायैभिर्नामभिः परमात्मने । इस तरह चिन्तामें पड़कर मैं भगवान्का ध्यान करने लगा; एवं विनयसे नतमस्तक होकर मैंने निम्नांकित नामोंद्वारा आदि-अन्तसे रहित परमात्मा महामनस्वी नारायणकी वन्दना आरम्भ की— ॥ नारायणाय शुद्धाय शाश्वताय ध्रुवाय च ॥ भूतभव्यभवैशाय शिवाय शिवमूर्तये । शिवयोनेः शिवायाद्य शिवपूज्यतमाय च ॥ 'जो शुद्ध, सनातन, ध्रुव, भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी, शिवस्वरूप और मंगलमूर्ति हैं, कल्याणके उत्पत्तिस्थान हैं, शिवके भी आदिकारण तथा भगवान् शिवके भी परम पूजनीय हैं, उन नारायणदेवको नमस्कार है ॥ घोररूपाय महते युगान्तकरणाय च । विश्वाय विश्वदेवाय विश्वेशाय महात्मने ॥ 'जो कल्पका अन्त करनेके लिये अत्यन्त घोर रूप धारण करते हैं, जो विश्वरूप, विश्वदेव, विश्वेश्वर एवं परमात्मा हैं, उन श्रीहरिको नमस्कार है ॥