महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमैं उसी शब्दका अनुसरण करता हुआ उस स्थानपर जा पहुँचा। वहाँ मैंने एक सुन्दर सरोवर देखा जिसमें बहुत-से हंस शोभा पा रहे थे ॥ स तत्सरः समासाद्य भगवानात्मवित्त्तमः । भोःशब्दप्रतिसृष्टेन स्वरेणाप्रतिवादिना ॥ विवेश देवः स्वां योनिं मामिदं चाभ्यभाषत । आत्मतत्त्वके ज्ञाताओंमें सर्वोत्तम भगवान् नारायण उस सरोवरके पास पहुँचकर 'भो' शब्दसे युक्त अनुपम गम्भीर स्वरसे मुझे पुकारते हुए अपने शयन-स्थान जलमें प्रविष्ट हो गये और मुझसे इस प्रकार बोले— ॥
श्रीभगवानुवाच विशस्व सलिलं सौम्य सुखमत्र वसामहे । **श्रीभगवान्ने कहा—**सौम्य! तुम भी जलमें प्रवेश करो। हम दोनों यहाँ सुखसे रहेंगे ॥
सुपर्ण उवाच ततश्च प्राविशं तत्र सह तेन महात्मना । दृष्टवानद्भुततरं तस्मिन् सरसि भास्वताम् ॥ अग्नीनां सुप्रणीतानामिद्धानामिन्धनैर्विना । दीप्तानामाज्यसिक्तानां स्थानेष्वार्चिष्मतां सदा ॥ **गरुड कहते हैं—**ऋषियो! तब मैं उन महात्मा श्रीहरिके साथ उस सरोवरमें घुसा। वहाँ मैंने अत्यन्त अद्भुत दृश्य देखा। भिन्न-भिन्न स्थानोंपर विधिपूर्वक स्थापित की हुई प्रज्वलित अग्नयाँ बिना ईंधनके ही जल रही थीं और घीकी आहुति पाकर उद्दीप्त हो उठी थीं ॥
दीप्तिस्तेषामनाज्यनां प्राप्ताज्यानामिवाभवत् । अनिद्धानामिव सतामिद्धानामिव भास्वताम् ॥ घी न मिलनेपर भी उन अग्नियोंकी दीप्ति घीकी आहुति पायी हुई अग्नियोंके समान थी और बिना ईंधनके भी ईंधनयुक्त आगके तुल्य उनकी प्रभा प्रकाशित होती रहती थी ॥
अथाहं वरदं देवं नापश्यं तत्र सङ्गतम् । वहाँ जानेपर भी उन वरदायक देवता नारायण-देवका मुझे दर्शन न हो सका ॥
तेषां तत्राग्निहोत्राणामीडितानां सहस्रशः ॥ समीपे त्वद्भुततममपश्यमहमव्ययम् ॥ सहस्रों स्थानोंमें प्रशंसित होनेवाले उन अग्निहोत्रोंके समीप मैंने उन अद्भुत एवं अविनाशी श्रीहरिको ढूँढ़ना आरम्भ किया ॥
एषु चाग्निसमीपेषु शुश्राव सुपदाक्षराः ॥ प्रभावान्तरितानां तु प्रस्पष्टाक्षरभाषिणाम् ।