महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमां हि विन्दन्ति विद्वांसो ये ज्ञाने परिनिष्ठिताः ।।
विनतानन्दन! किसीको भी किसी तरह मेरे स्वरूपका पूर्णतः ज्ञान नहीं हो सकता। ज्ञाननिष्ठ विद्वान् ही मेरे विषयमें कुछ जान पाते हैं ।।
निर्ममा निरहङ्कारा निराशीर्बन्धनायुताः ।
भवांस्तु सततं भक्तो मन्मनाः पक्षिसत्तम ।।
स्थूलं मां वेत्स्यसे तस्माज्जगतः कारणे स्थितम् ।
जो ममता और अहंकारसे रहित तथा कामनाओंके बन्धनसे मुक्त हैं, वे ही मुझे जान पाते हैं। पक्षिप्रवर! तुम मेरे भक्त हो और सदा ही मुझमें मन लगाये रखते हो। इसलिये जगत्के कारणरूपमें स्थित मेरे स्थूलस्वरूपका बोध प्राप्त करोगे ।।
सुपर्ण उवाच
एवं दत्ताभयस्तेन ततोऽहमृषिसत्तमाः ।
नष्टखेदश्रमभयः क्षणेन ह्यभवं तदा ।।
गरुड कहते हैं—ऋषिशिरोमणियो! इस प्रकार भगवान्के अभय देनेपर क्षणभरमें मेरे खेद, श्रम और भय सब नष्ट हो गये ।।
स शनैर्याति भगवान् गत्या लघुपराक्रमः ।
अहं तु सुमहावेगमास्थायानुव्रजामि तम् ।।
उस समय शीघ्रगामी भगवान् अपनी गतिसे धीरे-धीरे चल रहे थे और मैं महान् वेगका आश्रय लेकर उनका अनुसरण करता था ।।
स गत्वा दीर्घमध्वानमाकाशममितद्युतिः ।
मनसाप्यगमं देशमाससादात्मतत्त्ववित् ।।
वे अमित तेजस्वी एवं आत्मतत्त्वके ज्ञाता भगवान् श्रीहरि आकाशमें बहुत दूरतकका मार्ग तै करके ऐसे देशमें जा पहुँचे जो मनके लिये भी अगम्य था ।।
अथ देवः समासाद्य मनसः सदृशं जवम् ।
मोहयित्वा च मां तत्र क्षणेनान्तरधीयत ।।
तदनन्तर भगवान् मनके समान वेगको अपनाकर मुझे मोहित करके वहीं क्षणभरमें अदृश्य हो गये ।।
तत्राम्बुधरधीरेण भोःशब्देनानुनादिना ।
अयं भोऽहमिति प्राह वाक्यं वाक्यविशारदः ।।
वहाँ मेघके समान धीर-गम्भीर स्वरमें उच्चारित ‘भो’ शब्दके द्वारा बोलनेमें कुशल भगवान् इस प्रकार बोले—‘हे गरुड! यह मैं हूँ’ ।।
शब्दानुसारी तु ततस्तं देशमहमाव्रजम् ।
तत्रापश्यं ततश्चाहं श्रीमद्धंसयुतं सरः ।।