महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोविन्दके चिन्तनमें तत्पर हो बैठा रहा ॥ धृतं बभूव हृदयं नारायणदिदृक्षया ॥ सोऽहं वेगं समास्थाय मनोमारुतवेगवान् । रम्यां विशालां बदरीं गतो नारायणाश्रमम् ॥ ऐसा करनेसे मेरा हृदय नारायणके दर्शनकी इच्छासे स्थिर हो गया और मैं मन एवं वायुके समान वेगशाली हो महान् वेगका आश्रय ले रमणीय बदरीविशाल तीर्थमें भगवान् नारायणके आश्रमपर जा पहुँचा ॥ ततस्तत्र हरिं दृष्ट्वा जगतः प्रभवं विभुम् । गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं प्रणतः शिरसा हरिम् ॥ ऋग्यजुःसामभिश्चैनं तुष्टाव परया मुदा । तदनन्तर वहाँ जगत्की उत्पत्तिके कारणभूत सर्वव्यापी कमलनयन श्रीगोविन्द हरिका दर्शन करके मैं उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और बड़ी प्रसन्नताके साथ ऋक्, यजुः एवं साममन्त्रोंके द्वारा उनका स्तवन किया ॥ सोऽहं प्रपन्नः शरणं देवदेवं सनातनम् । प्राञ्जलिर्मनसा भूत्वा वाक्यमेतत् तदोक्तवान् ॥ तब मैं मन-ही-मन उन सनातन देवदेवकी शरणमें गया और हाथ जोड़कर इस प्रकार बोला— ॥ भगवन् भूतभव्येश भवद्भूतकृदव्यय । शरणं सम्प्रपन्नं मां त्रातुमर्हस्यरिंदम ॥ ‘भगवन्! भूत और भविष्यके स्वामी, वर्तमान भूतोंके निर्माता, शत्रुदमन, अविनाशी! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप मेरी रक्षा करें’ ॥ अहं तु तत्त्वजिज्ञासुः कोऽसि कस्यासि कुत्र वा । सम्प्राप्तः पदवीं देव स मां संत्रातुमर्हसि ॥ ‘मैं तो ‘आप कौन हैं, किसके हैं और कहाँ रहते हैं?’ इस बातको तत्त्वसे जाननेकी इच्छा रखकर आपके चरणोंकी शरणमें आया हूँ। देव! आप मेरी रक्षा करें’ ॥
श्रीभगवानुवाच
मम त्वं विदितः सौम्य यथावत् तत्त्वदर्शने । ज्ञापितश्चापि यत् पित्रा तच्चापि विदितं महत् ॥ श्रीभगवान्ने कहा— सौम्य! तुम यथावत्रूपसे मेरे तत्त्वका साक्षात्कार करनेके लिये सचेष्ट होओ। यह बात मुझे पहलेसे ही विदित है। तुम्हारे पिताने तुम्हें मेरे विषयमें जो कुछ ज्ञान दिया है वह सब कुछ मुझे ज्ञात है ॥ वैनतेय न कस्यापि अहं वैद्यः कथंचन ।