महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 144, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमया हि स महातेजा नान्ययोगसमाधिना ।
तपसोग्रेण तेजस्वी तोषितस्तपसां निधिः ॥
मैंने अनन्यभावसे मनको एकाग्र करके उग्र तपस्याद्वारा उन महातेजस्वी तपस्याकी निधिरूप (प्रतापी) श्रीहरिको संतुष्ट किया था ॥
ततो मे दर्शयामास तोषयन्निव पुत्रक ।
श्वेतपीतारुणनिभः कद्रूकपिलपिङ्गलः ॥
बेटा! तब मुझे संतुष्ट करते हुए-से भगवान् श्रीहरिने मुझे दर्शन दिया। उनके विभिन्न अंगोंकी कान्ति श्वेत, पीत, अरुण, भूरी, कपिश और पिंगल वर्णकी थी ॥
रक्तनीलासितनिभः सहस्रोदरपाणिमान् ।
द्विसहस्रमहावक्त्र एकाक्षः शतलोचनः ॥
वे लाल, नीले और काले-जैसे भी दीखते थे। उनके सहस्रों उदर और हाथ थे। उनके महान् मुख दो सहस्रकी संख्यामें दिखायी देते थे। वे एक नेत्र तथा सौ नेत्रोंसे युक्त थे ॥
समासाद्य तु तं विश्वमहं मूर्ध्ना प्रणम्य च ।
ऋग्यजुःसामभिः स्तुत्वा शरण्यं शरणं गतः ॥
उन विश्वात्माको निकट पाकर मैंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और ऋक्, यजुः तथा साम-मन्त्रोंसे उनकी स्तुति करके मैं उन शरणागतवत्सल देवकी शरणमें गया ॥
तेन त्वं कृतसंवादः स्वतः सर्वहितैषिणा ।
विश्वरूपेण देवेन पुरुषेण महात्मना ॥
तमेवाराधय क्षिप्रं तमाराध्य न सीदसि ।
बेटा गरुड! सबका हित चाहनेवाले उन विश्वरूपधारी अन्तर्यामी परमात्मदेवसे तुमने वार्तालाप किया है; अतः शीघ्र उन्हींकी आराधना करो। उनकी आराधना करके तुम कभी कष्टमें नहीं पड़ोगे' ॥
सोऽहमेवं भगवता पित्रा ब्रह्मर्षिसत्तमाः ॥
अनुनीतो यथान्यायं स्वमेव भवनं गतः ।
सोऽहमामन्त्र्य पितरं तद्भावगतमानसः ॥
स्वमेवालयमासाद्य तमेवार्थमचिन्तयम् ।
ब्रह्मर्षिशिरोमणियो! इस प्रकार अपने पूज्य पिताके यथोचितरूपसे समझानेपर मैं अपने घरको गया। पितासे विदा ले अपने घर आकर मैं उन्हीं परमात्माके ध्यानमें मन लगाकर उन्हींका चिन्तन करने लगा ॥
तद्भावगतभावात्मा तद्भूतगतमानसः ॥
गोविन्दं चिन्तयन्नास्से शाश्वतं परमव्ययम् ।
मेरा भावभक्तिसे युक्त मन उन्हींकी भावनामें लगा हुआ था। मेरा चित्त उनका चिन्तन करते-करते तदाकार हो गया था। इस प्रकार मैं उन सनातन अविनाशी परम पुरुष