महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 143, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमत्सखित्वमनुप्राप्तो दुर्धर्षश्च भविष्यसि ॥ पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड! मैं तुम्हें यह उत्तम वर देता हूँ कि देवता हो या दानव, कोई भी इस संसारमें तुम्हारे समान पराक्रमी न होगा। तुम मेरे अच्छे वाहन हो जाओ, मेरे सखाभावको प्राप्त होनेके कारण तुम सदा दुर्जय बने रहोगे' ।।
तमब्रुवं देवदेवं मामेवं वादिनं परम् ।
प्रयतः प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रणम्य शिरसा विभुम् ॥
तब मैंने हाथ जोड़ पवित्र हो उपर्युक्त बात कहनेवाले सर्वव्यापी देवाधिदेव भगवान् परम पुरुषको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— ।।
एवमेतन्महाबाहो सर्वमेतद् भविष्यति ।
वाहनं ते भविष्यामि यथा वदसि मां भवान् ॥
ध्वजस्तेऽहं भविष्यामि रथस्थस्य न संशयः ।
'महाबाहो! आपका यह कथन ठीक है। यह सब कुछ आपकी आज्ञाके अनुसार ही होगा। आप मुझे जैसा आदेश दे रहे हैं, उसके अनुसार मैं आपका वाहन अवश्य होऊँगा। आप रथपर विराजमान होंगे, उस समय मैं आपकी ध्वजापर स्थित रहूँगा, इसमें संशय नहीं है' ।।
तथास्त्विति स मामुक्त्वा यथाभिप्रायतो गतः ॥
तब भगवान्ने मुझसे 'तथास्तु' कहकर वे अपनी इच्छाके अनुसार चले गये ।।
ततोऽहं कृतसंवादस्तेन केनापि सत्तमाः ।
कौतूहलसमाविष्टः पितरं काश्यपं गतः ॥
साधुशिरोमणियो! तदनन्तर उन अनिर्वचनीय देवतासे वार्तालाप करके मैं कौतूहलवश अपने पिता कश्यपजीके पास गया ।।
सोऽहं पितरमासाद्य प्रणिपत्याभिवाद्य च ।
सर्वमेतद् यथातथ्यमुक्तवान् पितुरन्तिके ॥
पिताके पास पहुँचकर मैंने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और यह सारा वृत्तान्त उनसे यथावत्रूपसे कह सुनाया ।।
श्रुत्वा तु भगवान् मह्यं ध्यानमेवान्वपद्यत ।
स मुहूर्तंमिव ध्यात्वा मामाह वदतां वरः ॥
यह सुनकर मेरे पूज्यपाद पिताने ध्यान लगाया। दो घड़ीतक ध्यान करके वे वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनि मुझसे बोले— ।।
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यत् त्वं तेन महात्मना ।
संवादं कृतवांस्तात गुह्येन परमात्मना ॥
'तात! मैं धन्य हूँ, भगवान्की कृपाका पात्र हूँ, जिसके पुत्र होकर तुमने उन महामनस्वी गुह्य परमात्मासे वार्तालाप कर लिया ।।