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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

मत्सखित्वमनुप्राप्तो दुर्धर्षश्च भविष्यसि ॥ पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड! मैं तुम्हें यह उत्तम वर देता हूँ कि देवता हो या दानव, कोई भी इस संसारमें तुम्हारे समान पराक्रमी न होगा। तुम मेरे अच्छे वाहन हो जाओ, मेरे सखाभावको प्राप्त होनेके कारण तुम सदा दुर्जय बने रहोगे' ।।

तमब्रुवं देवदेवं मामेवं वादिनं परम् ।
प्रयतः प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रणम्य शिरसा विभुम् ॥
तब मैंने हाथ जोड़ पवित्र हो उपर्युक्त बात कहनेवाले सर्वव्यापी देवाधिदेव भगवान् परम पुरुषको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— ।।

एवमेतन्महाबाहो सर्वमेतद् भविष्यति ।
वाहनं ते भविष्यामि यथा वदसि मां भवान् ॥
ध्वजस्तेऽहं भविष्यामि रथस्थस्य न संशयः ।
'महाबाहो! आपका यह कथन ठीक है। यह सब कुछ आपकी आज्ञाके अनुसार ही होगा। आप मुझे जैसा आदेश दे रहे हैं, उसके अनुसार मैं आपका वाहन अवश्य होऊँगा। आप रथपर विराजमान होंगे, उस समय मैं आपकी ध्वजापर स्थित रहूँगा, इसमें संशय नहीं है' ।।

तथास्त्विति स मामुक्त्वा यथाभिप्रायतो गतः ॥
तब भगवान्‌ने मुझसे 'तथास्तु' कहकर वे अपनी इच्छाके अनुसार चले गये ।।

ततोऽहं कृतसंवादस्तेन केनापि सत्तमाः ।
कौतूहलसमाविष्टः पितरं काश्यपं गतः ॥
साधुशिरोमणियो! तदनन्तर उन अनिर्वचनीय देवतासे वार्तालाप करके मैं कौतूहलवश अपने पिता कश्यपजीके पास गया ।।

सोऽहं पितरमासाद्य प्रणिपत्याभिवाद्य च ।
सर्वमेतद् यथातथ्यमुक्तवान् पितुरन्तिके ॥
पिताके पास पहुँचकर मैंने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और यह सारा वृत्तान्त उनसे यथावत्रूपसे कह सुनाया ।।

श्रुत्वा तु भगवान् मह्यं ध्यानमेवान्वपद्यत ।
स मुहूर्तंमिव ध्यात्वा मामाह वदतां वरः ॥
यह सुनकर मेरे पूज्यपाद पिताने ध्यान लगाया। दो घड़ीतक ध्यान करके वे वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनि मुझसे बोले— ।।

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यत् त्वं तेन महात्मना ।
संवादं कृतवांस्तात गुह्येन परमात्मना ॥
'तात! मैं धन्य हूँ, भगवान्‌की कृपाका पात्र हूँ, जिसके पुत्र होकर तुमने उन महामनस्वी गुह्य परमात्मासे वार्तालाप कर लिया ।।

मया हि स महातेजा नान्ययोगसमाधिना ।
तपसोग्रेण तेजस्वी तोषितस्तपसां निधिः ॥
मैंने अनन्यभावसे मनको एकाग्र करके उग्र तपस्याद्वारा उन महातेजस्वी तपस्याकी निधिरूप (प्रतापी) श्रीहरिको संतुष्ट किया था ॥
ततो मे दर्शयामास तोषयन्निव पुत्रक ।
श्वेतपीतारुणनिभः कद्रूकपिलपिङ्गलः ॥
बेटा! तब मुझे संतुष्ट करते हुए-से भगवान् श्रीहरिने मुझे दर्शन दिया। उनके विभिन्न अंगोंकी कान्ति श्वेत, पीत, अरुण, भूरी, कपिश और पिंगल वर्णकी थी ॥
रक्तनीलासितनिभः सहस्रोदरपाणिमान् ।
द्विसहस्रमहावक्त्र एकाक्षः शतलोचनः ॥
वे लाल, नीले और काले-जैसे भी दीखते थे। उनके सहस्रों उदर और हाथ थे। उनके महान् मुख दो सहस्रकी संख्यामें दिखायी देते थे। वे एक नेत्र तथा सौ नेत्रोंसे युक्त थे ॥
समासाद्य तु तं विश्वमहं मूर्ध्ना प्रणम्य च ।
ऋग्यजुःसामभिः स्तुत्वा शरण्यं शरणं गतः ॥
उन विश्वात्माको निकट पाकर मैंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और ऋक्, यजुः तथा साम-मन्त्रोंसे उनकी स्तुति करके मैं उन शरणागतवत्सल देवकी शरणमें गया ॥
तेन त्वं कृतसंवादः स्वतः सर्वहितैषिणा ।
विश्वरूपेण देवेन पुरुषेण महात्मना ॥
तमेवाराधय क्षिप्रं तमाराध्य न सीदसि ।
बेटा गरुड! सबका हित चाहनेवाले उन विश्वरूपधारी अन्तर्यामी परमात्मदेवसे तुमने वार्तालाप किया है; अतः शीघ्र उन्हींकी आराधना करो। उनकी आराधना करके तुम कभी कष्टमें नहीं पड़ोगे' ॥
सोऽहमेवं भगवता पित्रा ब्रह्मर्षिसत्तमाः ॥
अनुनीतो यथान्यायं स्वमेव भवनं गतः ।
सोऽहमामन्त्र्य पितरं तद्भावगतमानसः ॥
स्वमेवालयमासाद्य तमेवार्थमचिन्तयम् ।
ब्रह्मर्षिशिरोमणियो! इस प्रकार अपने पूज्य पिताके यथोचितरूपसे समझानेपर मैं अपने घरको गया। पितासे विदा ले अपने घर आकर मैं उन्हीं परमात्माके ध्यानमें मन लगाकर उन्हींका चिन्तन करने लगा ॥
तद्भावगतभावात्मा तद्भूतगतमानसः ॥
गोविन्दं चिन्तयन्नास्से शाश्वतं परमव्ययम् ।
मेरा भावभक्तिसे युक्त मन उन्हींकी भावनामें लगा हुआ था। मेरा चित्त उनका चिन्तन करते-करते तदाकार हो गया था। इस प्रकार मैं उन सनातन अविनाशी परम पुरुष

गोविन्दके चिन्तनमें तत्पर हो बैठा रहा ॥ धृतं बभूव हृदयं नारायणदिदृक्षया ॥ सोऽहं वेगं समास्थाय मनोमारुतवेगवान् । रम्यां विशालां बदरीं गतो नारायणाश्रमम् ॥ ऐसा करनेसे मेरा हृदय नारायणके दर्शनकी इच्छासे स्थिर हो गया और मैं मन एवं वायुके समान वेगशाली हो महान् वेगका आश्रय ले रमणीय बदरीविशाल तीर्थमें भगवान् नारायणके आश्रमपर जा पहुँचा ॥ ततस्तत्र हरिं दृष्ट्वा जगतः प्रभवं विभुम् । गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं प्रणतः शिरसा हरिम् ॥ ऋग्यजुःसामभिश्चैनं तुष्टाव परया मुदा । तदनन्तर वहाँ जगत्की उत्पत्तिके कारणभूत सर्वव्यापी कमलनयन श्रीगोविन्द हरिका दर्शन करके मैं उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और बड़ी प्रसन्नताके साथ ऋक्, यजुः एवं साममन्त्रोंके द्वारा उनका स्तवन किया ॥ सोऽहं प्रपन्नः शरणं देवदेवं सनातनम् । प्राञ्जलिर्मनसा भूत्वा वाक्यमेतत् तदोक्तवान् ॥ तब मैं मन-ही-मन उन सनातन देवदेवकी शरणमें गया और हाथ जोड़कर इस प्रकार बोला— ॥ भगवन् भूतभव्येश भवद्भूतकृदव्यय । शरणं सम्प्रपन्नं मां त्रातुमर्हस्यरिंदम ॥ ‘भगवन्! भूत और भविष्यके स्वामी, वर्तमान भूतोंके निर्माता, शत्रुदमन, अविनाशी! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप मेरी रक्षा करें’ ॥ अहं तु तत्त्वजिज्ञासुः कोऽसि कस्यासि कुत्र वा । सम्प्राप्तः पदवीं देव स मां संत्रातुमर्हसि ॥ ‘मैं तो ‘आप कौन हैं, किसके हैं और कहाँ रहते हैं?’ इस बातको तत्त्वसे जाननेकी इच्छा रखकर आपके चरणोंकी शरणमें आया हूँ। देव! आप मेरी रक्षा करें’ ॥

श्रीभगवानुवाच

मम त्वं विदितः सौम्य यथावत् तत्त्वदर्शने । ज्ञापितश्चापि यत् पित्रा तच्चापि विदितं महत् ॥ श्रीभगवान्ने कहा— सौम्य! तुम यथावत्रूपसे मेरे तत्त्वका साक्षात्कार करनेके लिये सचेष्ट होओ। यह बात मुझे पहलेसे ही विदित है। तुम्हारे पिताने तुम्हें मेरे विषयमें जो कुछ ज्ञान दिया है वह सब कुछ मुझे ज्ञात है ॥ वैनतेय न कस्यापि अहं वैद्यः कथंचन ।

मां हि विन्दन्ति विद्वांसो ये ज्ञाने परिनिष्ठिताः ।।
विनतानन्दन! किसीको भी किसी तरह मेरे स्वरूपका पूर्णतः ज्ञान नहीं हो सकता। ज्ञाननिष्ठ विद्वान् ही मेरे विषयमें कुछ जान पाते हैं ।।
निर्ममा निरहङ्कारा निराशीर्बन्धनायुताः ।
भवांस्तु सततं भक्तो मन्मनाः पक्षिसत्तम ।।
स्थूलं मां वेत्स्यसे तस्माज्जगतः कारणे स्थितम् ।
जो ममता और अहंकारसे रहित तथा कामनाओंके बन्धनसे मुक्त हैं, वे ही मुझे जान पाते हैं। पक्षिप्रवर! तुम मेरे भक्त हो और सदा ही मुझमें मन लगाये रखते हो। इसलिये जगत्के कारणरूपमें स्थित मेरे स्थूलस्वरूपका बोध प्राप्त करोगे ।।

सुपर्ण उवाच

एवं दत्ताभयस्तेन ततोऽहमृषिसत्तमाः ।
नष्टखेदश्रमभयः क्षणेन ह्यभवं तदा ।।
गरुड कहते हैं—ऋषिशिरोमणियो! इस प्रकार भगवान्‌के अभय देनेपर क्षणभरमें मेरे खेद, श्रम और भय सब नष्ट हो गये ।।
स शनैर्याति भगवान् गत्या लघुपराक्रमः ।
अहं तु सुमहावेगमास्थायानुव्रजामि तम् ।।
उस समय शीघ्रगामी भगवान् अपनी गतिसे धीरे-धीरे चल रहे थे और मैं महान् वेगका आश्रय लेकर उनका अनुसरण करता था ।।
स गत्वा दीर्घमध्वानमाकाशममितद्युतिः ।
मनसाप्यगमं देशमाससादात्मतत्त्ववित् ।।
वे अमित तेजस्वी एवं आत्मतत्त्वके ज्ञाता भगवान् श्रीहरि आकाशमें बहुत दूरतकका मार्ग तै करके ऐसे देशमें जा पहुँचे जो मनके लिये भी अगम्य था ।।
अथ देवः समासाद्य मनसः सदृशं जवम् ।
मोहयित्वा च मां तत्र क्षणेनान्तरधीयत ।।
तदनन्तर भगवान् मनके समान वेगको अपनाकर मुझे मोहित करके वहीं क्षणभरमें अदृश्य हो गये ।।
तत्राम्बुधरधीरेण भोःशब्देनानुनादिना ।
अयं भोऽहमिति प्राह वाक्यं वाक्यविशारदः ।।
वहाँ मेघके समान धीर-गम्भीर स्वरमें उच्चारित ‘भो’ शब्दके द्वारा बोलनेमें कुशल भगवान् इस प्रकार बोले—‘हे गरुड! यह मैं हूँ’ ।।
शब्दानुसारी तु ततस्तं देशमहमाव्रजम् ।
तत्रापश्यं ततश्चाहं श्रीमद्धंसयुतं सरः ।।

मैं उसी शब्दका अनुसरण करता हुआ उस स्थानपर जा पहुँचा। वहाँ मैंने एक सुन्दर सरोवर देखा जिसमें बहुत-से हंस शोभा पा रहे थे ॥ स तत्सरः समासाद्य भगवानात्मवित्त्तमः । भोःशब्दप्रतिसृष्टेन स्वरेणाप्रतिवादिना ॥ विवेश देवः स्वां योनिं मामिदं चाभ्यभाषत । आत्मतत्त्वके ज्ञाताओंमें सर्वोत्तम भगवान् नारायण उस सरोवरके पास पहुँचकर 'भो' शब्दसे युक्त अनुपम गम्भीर स्वरसे मुझे पुकारते हुए अपने शयन-स्थान जलमें प्रविष्ट हो गये और मुझसे इस प्रकार बोले— ॥

श्रीभगवानुवाच विशस्व सलिलं सौम्य सुखमत्र वसामहे । **श्रीभगवान्ने कहा—**सौम्य! तुम भी जलमें प्रवेश करो। हम दोनों यहाँ सुखसे रहेंगे ॥

सुपर्ण उवाच ततश्च प्राविशं तत्र सह तेन महात्मना । दृष्टवानद्भुततरं तस्मिन् सरसि भास्वताम् ॥ अग्नीनां सुप्रणीतानामिद्धानामिन्धनैर्विना । दीप्तानामाज्यसिक्तानां स्थानेष्वार्चिष्मतां सदा ॥ **गरुड कहते हैं—**ऋषियो! तब मैं उन महात्मा श्रीहरिके साथ उस सरोवरमें घुसा। वहाँ मैंने अत्यन्त अद्भुत दृश्य देखा। भिन्न-भिन्न स्थानोंपर विधिपूर्वक स्थापित की हुई प्रज्वलित अग्नयाँ बिना ईंधनके ही जल रही थीं और घीकी आहुति पाकर उद्दीप्त हो उठी थीं ॥

दीप्तिस्तेषामनाज्यनां प्राप्ताज्यानामिवाभवत् । अनिद्धानामिव सतामिद्धानामिव भास्वताम् ॥ घी न मिलनेपर भी उन अग्नियोंकी दीप्ति घीकी आहुति पायी हुई अग्नियोंके समान थी और बिना ईंधनके भी ईंधनयुक्त आगके तुल्य उनकी प्रभा प्रकाशित होती रहती थी ॥

अथाहं वरदं देवं नापश्यं तत्र सङ्गतम् । वहाँ जानेपर भी उन वरदायक देवता नारायण-देवका मुझे दर्शन न हो सका ॥

तेषां तत्राग्निहोत्राणामीडितानां सहस्रशः ॥ समीपे त्वद्भुततममपश्यमहमव्ययम् ॥ सहस्रों स्थानोंमें प्रशंसित होनेवाले उन अग्निहोत्रोंके समीप मैंने उन अद्भुत एवं अविनाशी श्रीहरिको ढूँढ़ना आरम्भ किया ॥

एषु चाग्निसमीपेषु शुश्राव सुपदाक्षराः ॥ प्रभावान्तरितानां तु प्रस्पष्टाक्षरभाषिणाम् ।

ऋग्यजुःसामगानां च मधुराः सुस्वरा गिरः । इन अग्नियोंके समीप अक्षरोंका स्पष्ट उच्चारण करनेवाले तथा अपने प्रभावसे अदृश्य रहनेवाले, ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके विद्वानोंकी सुस्वर मधुर वाणी मैंने सुनी। उनके पद और अक्षर बहुत सुन्दर ढंगसे उच्चारित हो रहे थे ॥ तान्यनेकसहस्राणि परीयंस्तु महाजवात् । अपश्यमानस्तं देवं ततोऽहं व्यथितोऽभवम् ॥ मैं बड़े वेगसे वहाँके हजारों घरोंमें घूम आया; परंतु कहीं भी अपने उन आराध्यदेवको न देख सका, इससे मुझे बड़ी व्यथा हुई ॥ ततस्तेष्वग्निहोत्रेषु ज्वलत्सु विमलार्चिषु । भानुमत्सु न पश्यामि देवदेवं सनातनम् ॥ ततोऽहं तानि दीप्तानि परीय व्यथितेन्द्रियः । नान्तं तेषां प्रपश्यामि येनाहमिह चोदितः ॥ निर्मल ज्वालाओंसे युक्त वे अग्निहोत्र पूर्ववत् प्रकाशित हो रहे थे। उनके समीप भी मुझे कहीं सनातन देवाधिदेव श्रीहरि नहीं दिखायी दिये। तब मैं उन प्रदीप्त अग्निहोत्रोंकी परिक्रमा करते-करते थक गया। मेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं; परंतु उनका कहीं अन्त नहीं दिखायी दिया। जिन भगवान्ने मुझे यहाँ आनेके लिये प्रेरित किया था, उनका दर्शन नहीं हो सका ॥ एवं चिन्तासमापन्नः प्रध्यातुमुपचक्रमे । विनयावनतो भूत्वा नमश्चक्रे महात्मने ॥ अनादिनिधनायैभिर्नामभिः परमात्मने । इस तरह चिन्तामें पड़कर मैं भगवान्का ध्यान करने लगा; एवं विनयसे नतमस्तक होकर मैंने निम्नांकित नामोंद्वारा आदि-अन्तसे रहित परमात्मा महामनस्वी नारायणकी वन्दना आरम्भ की— ॥ नारायणाय शुद्धाय शाश्वताय ध्रुवाय च ॥ भूतभव्यभवैशाय शिवाय शिवमूर्तये । शिवयोनेः शिवायाद्य शिवपूज्यतमाय च ॥ 'जो शुद्ध, सनातन, ध्रुव, भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी, शिवस्वरूप और मंगलमूर्ति हैं, कल्याणके उत्पत्तिस्थान हैं, शिवके भी आदिकारण तथा भगवान् शिवके भी परम पूजनीय हैं, उन नारायणदेवको नमस्कार है ॥ घोररूपाय महते युगान्तकरणाय च । विश्वाय विश्वदेवाय विश्वेशाय महात्मने ॥ 'जो कल्पका अन्त करनेके लिये अत्यन्त घोर रूप धारण करते हैं, जो विश्वरूप, विश्वदेव, विश्वेश्वर एवं परमात्मा हैं, उन श्रीहरिको नमस्कार है ॥

सहस्रोदारपादाय सहस्रनयनाय च । सहस्रबाहवे चैव सहस्रवदनाय च ॥ 'जिनके सहस्रों उदर, सहस्रों पैर और सहस्रों नेत्र हैं, जो सहस्रों भुजाओं और सहस्रों मुखोंसे सुशोभित हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ।।

शुचिश्रवाय महते ऋतुसंवत्सराय च । ऋग्यजुःसामवक्त्राय अथर्वशिरसे नमः ॥ 'जिनका यश पवित्र है, जो महान् तथा ऋतु एवं संवत्सररूप हैं, ऋक्, यजुः और सामवेद जिनके मुख हैं तथा अथर्ववेद जिनका सिर है, उन नारायण-देवको नमस्कार है ।।

हृषीकेशाय कृष्णाय द्रुहिणोरुक्रमाय च । ब्रह्मेन्द्रकाय तार्क्ष्याय वराहायैकशृङ्गिणे ॥ 'जो हृषीकेश (सम्पूर्ण इन्द्रियोंके नियन्ता), कृष्ण (सच्चिदानन्दस्वरूप), द्रुहिण (ब्रह्मा), उरुक्रम (बहुत बड़े डग भरनेवाले त्रिविक्रम), ब्रह्मा एवं इन्द्ररूप, गरुडस्वरूप तथा एक सींगवाले वराहरूपधारी हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ।।

शिपिविष्टाय सत्याय हरयेऽथ शिखण्डिने । हुतायोर्ध्वाय वक्त्राय रौद्रानीकाय साधवे ॥ सिन्धवे सिन्धुवर्षघ्ने देवानां सिन्धवे नमः । 'जो शिपिविष्ट (तेजसे व्याप्त), सत्य, हरि और शिखण्डी (मोरपंखधारी श्रीकृष्ण) आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं, जो हुत (हविष्यको ग्रहण करनेवाले अग्निरूप), ऊर्ध्वमुख, रुद्रकी सेना, साधु, सिन्धु, समुद्रमें वर्षाका हनन करनेवाले तथा देवसिन्धु (गंगास्वरूप) हैं, उन भगवान् विष्णुको प्रणाम है ।।

गरुत्मते त्रिनेत्राय सुधामाय वृषावृषे ॥ सम्राडुग्रे संकृतये विरजे सम्भवे भवे । 'जो गरुडरूपधारी, तीन नेत्रोंसे युक्त (रुद्ररूप), उत्तम धामवाले, वृषावृष, धर्मपालक, सबके सम्राट्, उग्ररूपधारी, उत्तम कृतिवाले, रजोगुणरहित, सबकी उत्पत्तिके कारण तथा भवरूप हैं, उन श्रीहरिको नमस्कार है ।।

वृषाय वृषरूपाय विभवे भूर्भुवाय च ॥ दीप्तसृष्टाय यज्ञाय स्थिराय स्थविराय च । 'जो वृष (अभीष्ट वस्तुओंकी वर्षा करनेवाले), वृषरूप (धर्मस्वरूप), विभु (व्यापक) तथा भूर्लोक और भुवर्लोकमय हैं, जो तेजस्वी पुरुषोंद्वारा सम्पादित यज्ञरूप हैं, स्थिर हैं और स्थविरूप (वृद्ध) हैं, उन भगवान्को नमस्कार है ।।

अच्युताय तुषाराय वीराय च समाय च ॥ जिष्णवे पुरुहूताय वशिष्ठाय वराय च ।

‘जो अपनी महिमासे कभी च्युत नहीं होते, हिमके समान शीतल हैं, जिनमें वीरत्व है, जो सर्वत्र समभावसे स्थित हैं, विजयशील हैं, जिन्हें बहुत लोग पुकारते हैं अथवा जो इन्द्ररूप हैं तथा जो सर्वश्रेष्ठ वसिष्ठ हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है ।। सत्येशाय सुरेशाय हरयेऽथ शिखण्डिने ।। बर्हिषाय वरेण्याय वसवे विश्ववेधसे । ‘जो सत्य और देवताओंके स्वामी हैं, हरि (श्यामसन्दर) और शिखण्डी (मोरमुकुटधारी) हैं, जो कुशापर बैठनेवाले सर्वश्रेष्ठ वसुरूप हैं, उन विश्वस्रष्टा भगवान् विष्णुको नमस्कार है ।। किरीटिने सुकेशाय वासुदेवाय शुष्मिणे ।। बृहदुक्थसुषेणाय युग्ये दुन्दुभये तथा । ‘जो किरीटधारी, सुन्दर केशोंसे सुशोभित तथा पराक्रमी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णरूप हैं, बृहदुक्थ साम जिनका स्वरूप है, जो सुन्दर सेनासे युक्त हैं, जुएका भार सँभालनेवाले वृषभरूप हैं तथा दुन्दुभि नामक वाद्यविशेष हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है ।। भवेसखाय विभवे भरद्वाजाभयाय च ।। भास्कराय वरेन्द्राय पद्मनाभाय भूरिणे । ‘जो इस जगत्‌में जीवमात्रके सखा हैं, व्यापकरूप हैं, भरद्वाजको अभय देनेवाले हैं, सूर्यरूपसे प्रभाका विस्तार करनेवाले हैं, श्रेष्ठ पुरुषोंके स्वामी हैं, जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है और जो महान् हैं, उन भगवान् नारायणको नमस्कार है ।। पुनर्वसुभृतत्वाय जीवप्रभविषाय च ।। वषट्काराय स्वाहायै स्वधायै निधनाय च । ऋचे च यजुषे साम्ने त्रैलोक्यपतये नमः ।। ‘जो पुनर्वसु नामक नक्षत्रसे पालित और जीवमात्रकी उत्पत्तिके स्थान हैं, वषट्कार, स्वाहा, स्वधा और निधन—ये जिनके ही नाम और रूप हैं तथा जो ऋक्‌, यजुष्‌, सामवेद-स्वरूप हैं और त्रिलोकीके अधिपति हैं, उन भगवान् विष्णुको मेरा प्रणाम है ।। श्रीपद्मायात्मसदृशे धरणे धारणे परे । सौम्याय सौम्यरूपाय सौम्ये सुमनसे नमः ।। ‘जो शोभाशाली कमलको हाथमें लिये रहते हैं, जो अपने समान स्वयं ही हैं, जो धारण करने और करानेवाले परम पुरुष हैं, जो सौम्य, सौम्यरूपधारी तथा सौम्य एवं सुन्दर मनवाले हैं, उन श्रीहरिको नमस्कार है ।। विश्वाय च सुविश्वाय विश्वरूपधराय च । केशवाय सुकेशाय रश्मिकेशाय भूरिणे ।। ‘जो विश्वरूप, सुन्दर विश्वके निर्माता तथा विश्वरूपधारी हैं, जो केशव, सुन्दर केशोंसे युक्त किरणरूपी केशवाले और अधिक बलशाली हैं, उन भगवान् विष्णुको मेरा प्रणाम

है ।। हिरण्यगर्भाय नमः सौम्याय वृषरूपिणे । नारायणाग्रवपुषे पुरुहूताय वज्रिणे ।। धर्मिणे वृषसेनाय धर्मसेनाय रोधसे । ‘जो हिरण्यगर्भ, सौम्य, वृषरूपधारी, नारायण, श्रेष्ठ शरीरधारी, पुरुहूत (इन्द्र) तथा वज्र धारण करनेवाले हैं, जो धर्मात्मा, वृषसेन, धर्मसेन तथा तटरूप हैं, उन भगवान् श्रीहरिको नमस्कार है ।। मुनये ज्वरमुक्ताय ज्वराधिपतये नमः ।। अनेत्राय त्रिनेत्राय पिङ्गलाय विडूर्म्मिणे । ‘जो मननशील मुनि, ज्वर आदि रोगोंसे मुक्त तथा ज्वरके अधिपति हैं, जिनके नेत्र नहीं हैं अथवा जिनके तीन नेत्र हैं, जो पिंगलवर्णवाले तथा प्रजारूपी लहरोंकी उत्पत्तिके लिये महासागरके समान हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ।। तपोब्रह्मनिधानाय युगपर्यायिणे नमः ।। शरणाय शरण्याय शक्तेष्टशरणाय च । नमः सर्वभवेशाय भूतभव्यभवाय च ।। ‘जो तप और वेदकी निधि हैं, बारी-बारीसे युगोंका परिवर्तन करनेवाले हैं, सबके शरणदाता, शरणागतवत्सल और शक्तिशाली पुरुषके लिये अभीष्ट आश्रय हैं, सम्पूर्ण संसारके अधीश्वर एवं भूत, वर्तमान और भविष्यरूप हैं, उन भगवान् नारायणको नमस्कार है ।। पाहि मां देवदेवेश कोऽप्यजोऽसि सनातन । एवं गतोऽसि शरणं शरण्यं ब्रह्मयोनिनाम् ।। ‘देवदेवेश्वर! आप मेरी रक्षा करें। सनातन परमात्मन्! आप कोई अनिर्वचनीय अजन्मा पुरुष हैं, ब्राह्मणोंके शरणदाता हैं; मैं इस संकटमें पड़कर आपकी ही शरण लेता हूँ’ ।। स्तव्यं स्तवं स्तुतवतस्तत् तमो मे प्रणश्यत । शृणोमि च गिरं दिव्यामान्तर्धानगतां शिवाम् । इस प्रकार स्तवनीय परमेश्वरकी स्तुति करते ही मेरा वह सारा दुःख नष्ट हो गया। तत्पश्चात् मुझे किसी अदृश्य शक्तिके द्वारा कही हुई यह मंगलमयी दिव्य वाणी सुनायी दी ।।

श्रीभगवानुवाच

मा भैर्गरुत्मन् दान्तोऽसि पुनः सेन्द्रान् दिवौकसः ।। स्वं चैव भवनं गत्वा द्रक्ष्यसे पुत्रबान्धवान् ।

श्रीभगवान् बोले—गरुड! तुम डरो मत। तुमने मन और इन्द्रियोंको जीत लिया है। अब तुम पुनः इन्द्र आदि देवताओंके सहित अपने घरमें जाकर पुत्रों और भाई-बन्धुओंको देखोगे॥

सुपर्ण उवाच

ततस्तस्मिन् क्षणेनैव सहसैव महाद्युतिः॥
प्रत्यदृश्यत तेजस्वी पुरस्तात् स ममान्तिके।
गरुडजी कहते हैं—मुनियो! तदनन्तर उसी क्षण वे परम कान्तिमान् तेजस्वी नारायण सहसा मेरे सामने अत्यन्त निकट दिखायी दिये॥
समागम्य ततस्तेन शिवेन परमात्मना॥
अपश्यं चाहमायान्तं नरनारायणाश्रमे।
चतुर्द्विगुणविन्यासं तं च देवं सनातनम्॥
तब उन मंगलमय परमात्मासे मिलकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर मैंने देखा, वे आठ भुजाओंवाले सनातनदेव पुनः नर-नारायणके आश्रमकी ओर आ रहे हैं॥
यजतस्तान्ऋषीन् देवान् वदतो ध्यायतो मुनीन्।
युक्तान् सिद्धान् नैष्ठिकांश्च जपतो यजतो गृहीन्॥
वहाँ मैंने देखा, ऋषि यज्ञ कर रहे हैं, देवता बातें कर रहे हैं, मुनिलोग ध्यानमें मग्न हैं, योगयुक्त सिद्ध और नैष्ठिक ब्रह्मचारी जप करते हैं तथा गृहस्थलोग यज्ञोंके अनुष्ठानमें संलग्न हैं॥
पुष्पपूरपरिक्षिप्तं धूपितं दीपितं हितम्।
वन्दितं सिक्तसम्मूष्टं नरनारायणाश्रमम्॥
नर-नारायणका आश्रम धूपसे सुगन्धित और दीपसे प्रकाशित हो रहा था। वहाँ चारों ओर ढेर-के-ढेर फूल बिखरे हुए थे। वह आश्रम सबके लिये हितकर एवं सत्पुरुषोंद्वारा वन्दित था। झाड़-बुहारकर स्वच्छ बनाया और सींचा गया था॥
तदद्भुतमहं दृष्ट्वा विस्मितोऽस्मि तदानघाः।
जगाम शिरसा देवं प्रयतेनान्तरात्मना॥
निष्पाप मुनियो! उस अद्भुत दृश्यको देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ और मैंने पवित्र एवं एकाग्र हृदयसे मस्तक झुकाकर उन भगवान्‌की शरण ली॥
तदत्यद्भुतसंकाशं किमेतदिति चिन्तयन्।
नाध्यगच्छं परं दिव्यं तस्य सर्वभवात्मनः॥
वह सब अद्भुत-सा दृश्य क्या था, यह बहुत सोचनेपर भी मेरी समझमें नहीं आया। सबकी उत्पत्तिके कारणभूत उन परमात्माके परम दिव्य भावको मैं नहीं समझ सका॥
प्रणिपत्य सुदुर्धर्षं पुनः पुनरुदीक्ष्य च।

शिरस्यञ्जलिमाधाय विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥ अवोचं तमदीनार्थं श्रेष्ठानां श्रेष्ठमुत्तमम् । उन दुर्जय परमात्माको बारंबार प्रणाम करके उनकी ओर देखकर मेरे नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे और मैंने मस्तकपर अंजलि बाँधे उन श्रेष्ठ पुरुषोंमें भी सर्वश्रेष्ठ एवं उदार पुरुषोत्तमसे कहा— ॥

नमस्ते भगवन् देव भूतभव्यभवत्प्रभो ॥ यदेतदद्भुतं देव मया दृष्टं त्वदाश्रयम् । अनादिमध्यपर्यन्तं किं तच्छंसितुमर्हसि ॥ ‘भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी भगवान् नारायणदेव! आपको नमस्कार है। देव! मैंने आपके आश्रित जो यह अद्भुत दृश्य देखा है, इसका कहीं आदि, मध्य और अन्त नहीं है। वह सब क्या है, यह बतानेकी कृपा करें’ ॥

यदि जानासि मां भक्तं यदि वानुग्रहो मयि । शंस सर्वमशेषेण श्रोतव्यं यदि चेन्मया ॥ ‘यदि आप मुझे अपना भक्त समझते हैं अथवा यदि आपका मुझपर अनुग्रह है तो यह सब यदि मेरे सुननेयोग्य हो तो पूर्णरूपसे बताइये’ ॥

स्वभावस्तव दुर्ज्ञेयः प्रादुर्भावोऽभवस्य च । भवद्भूतभविष्येश सर्वथा गहनो भवान् ॥ ‘आपका स्वभाव दुर्ज्ञेय है। आप अजन्मा परमेश्वरका प्रादुर्भाव भी समझमें आना कठिन है। भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी नारायण! आप सर्वथा गहन (अगम्य) हैं’ ॥

ब्रूहि सर्वमशेषेण तदाश्चर्यं महामुने । किं तदत्यद्भुतं वृत्तं तेष्वग्निषु समन्ततः ॥ ‘महामुने! वह सारा आश्चर्यजनक एवं अद्भुत वृत्तान्त जो उन अग्नियोंके चारों ओर देखा गया, क्या था? यह पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा करें’ ॥

कानि तान्यग्निहोत्राणि केषां शब्दः श्रुतो मया । शृण्वतां ब्रह्म सततमदृश्यानां महात्मनाम् ॥ ‘वे अग्निहोत्र कौन थे? निरन्तर वेदोंका श्रवण और पाठ करनेवाले वे अदृश्य महात्मा कौन थे, जिनका शब्दमात्र मैंने सुना था?’ ॥

एतन्मे भगवन् कृष्ण ब्रूहि सर्वमशेषतः । गृणन्त्यग्निसमीपेषु के च ते ब्रह्मराशयः ॥ ‘भगवान् श्रीकृष्ण! यह सब आप पूर्णरूपसे मुझे बताइये। जो लोग अग्निके समीप वेदोंका पारायण कर रहे थे, वे ब्राह्मणसमूह महात्मा कौन थे?’ ॥

श्रीभगवानुवाच

मां न देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः । विदुस्तत्त्वेन तत्त्वस्थं सूक्ष्मात्मानमवस्थितम् ॥ श्रीभगवान् बोले— गरुड! मुझे न तो देवता, न गन्धर्व, न पिशाच और न राक्षस ही तत्त्वसे जानते हैं। मैं सम्पूर्ण तत्त्वोंमें उनके सूक्ष्म आत्मारूपसे अवस्थित हूँ।।

चतुर्धांहं विभक्तात्मा लोकानां हितकाम्यया । भूतभव्यभविष्यादिर्नादिर्विश्वकृत्तमः ॥ लोकोंके हितकी कामनासे मैंने अपने आपको चार स्वरूपोंमें विभक्त कर रखा है। मैं भूत, वर्तमान और भविष्यका आदि हूँ। मेरा आदि कोई नहीं है। मैं ही सबसे बड़ा विश्वस्रष्टा हूँ।।

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । मनो बुद्धिश्च तेजश्च तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ प्रकृतिर्विकृतिश्चेति विद्याविद्ये शुभाशुभे । मत्त एतानि जायन्ते नाहमेभ्यः कथंचन ॥ पृथ्‍वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, मन, बुद्धि, तेज (अहंकार), सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण, प्रकृति, विकृति, विद्या, अविद्या तथा शुभ और अशुभ—ये सब मुझसे ही उत्पन्न होते हैं। मैं इनसे किसी प्रकार उत्पन्न नहीं होता ।।

यत् किंचिच्छ्रेयसा युक्तः श्रेष्ठभावं व्यवस्यति । धर्मयुक्तं च पुण्यं च सोऽहमस्मि निरामयः ॥ मनुष्य कल्याणभावनासे युक्त हो जिस किसी पवित्र, धर्मयुक्त एवं श्रेष्ठ भावका निश्चय करता है वह सब मैं निरामय परमेश्वर ही हूँ।।

यः स्वभावात्मतत्त्वज्ञैः कारणैरुपलक्ष्यते । अनादिमध्यनिधनः सोऽन्तरात्मास्मि शाश्वतः ॥ स्वभाव एवं आत्माके तत्त्वको जाननेवाले पुरुष विभिन्न हेतुओंद्वारा जिसका साक्षात्कार करते हैं, वह आदि, मध्य और अन्तसे रहित सर्वान्तरात्मा सनातन पुरुष मैं ही हूँ।।

यत् तु मे परमं गुह्यं रूपं सूक्ष्मार्थदर्शिभिः । गृह्यते सूक्ष्मभावज्ञैः स विभाव्योऽस्मि शाश्वतः ॥ सूक्ष्म अर्थको देखने और समझनेवाले तथा सूक्ष्मभावको जाननेवाले ज्ञानी पुरुष मेरे जिस परम गुह्य रूपको ग्रहण करते हैं, वह चिन्तनीय सनातन परमात्मा मैं ही हूँ।।

यत् तु मे परमं गुह्यं येन व्याप्तमिदं जगत् । सोऽहं गतः सर्वसत्त्वः सर्वस्य प्रभवोऽप्ययः ॥ जो मेरा परम गुह्य रूप है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, वह सर्वसत्त्वरूप परमात्मा मैं ही हूँ, मैं ही सबका अविनाशी कारण हूँ।।

मत्तो जातानि भूतानि मया धार्यन्त्यहर्निशम् । मय्येव विलयं यान्ति प्रलये पन्नगाशन ॥ गरुड! सम्पूर्ण भूत प्राणी मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं, मेरे ही द्वारा वे अहर्निश जीवन धारण करते हैं और प्रलयके समय सब-के-सब मुझमें ही लीन हो जाते हैं।

यो मां यथा वेदयति तस्य तस्यास्मि काश्यप । मनोबुद्धिगतः श्रेयो विदधामि विहङ्गम ॥ काश्यप! जो मुझे जैसा जानता है, उसके लिये मैं वैसा ही हूँ। विहंगम! मैं सभीके मन और बुद्धिमें रहकर सबका कल्याण करता हूँ ॥

मां तु ज्ञातुं कृता बुद्धिर्भवता पक्षिसत्तम । शृणु योऽहं यतश्चाहं यदर्थं चाहमुद्यतः ॥ पक्षिप्रवर! तुमने मेरे तत्त्वको जाननेका विचार किया था; अतः मैं कौन हूँ? कहाँसे आया हूँ? और किस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये उद्यत हुआ हूँ? यह सब बताता हूँ, सुनो ॥

ये केचिन्नियतात्मानस्त्रेताग्निपरमा द्विजाः । अग्निकार्यपरा नित्यं जपहोमपरायणाः ॥ आत्मन्यग्नीन् समाधाय नियता नियतेन्द्रियाः । अनन्यमनसस्ते मां सर्वे वै समुपासते ॥ यजन्तो जपयज्ञैर्मां मानसैश्च सुसंयताः । अग्नीनभ्युद्ययुः शश्वदग्निष्वेवाभिसंस्थिताः ॥ अनन्यकार्याः शुचयो नित्यमग्निपरायणाः । य एवं बुद्धयो धीरास्ते मां गच्छन्ति तादृशाः ॥ जो कोई ब्राह्मण अपने मनको वशमें करके त्रिविध अग्नियोंकी उपासना करते हैं, नित्य अग्निहोत्रमें तत्पर और जप-होममें संलग्न हैं, जो नियमपूर्वक रहकर अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अपने-आपमें ही अग्नियोंका आधान कर लेते हैं तथा सब-के-सब अनन्यचित्त होकर मेरी ही उपासना करते हैं, जो अपनेको पूर्ण संयममें रखकर जप, यज्ञ और मानसयज्ञोंद्वारा मेरी आराधना करते हैं, जो सदा अग्निहोत्रमें ही तत्पर रहकर अग्नियोंका स्वागत करते हैं तथा अन्य कार्यमें रत न होकर शुद्धभावसे सदा अग्निकी परिचर्या करते हैं; ऐसी बुद्धिवाले धीर पुरुष वैसे भक्तिभावसे सम्पन्न होते हैं, वे मुझे प्राप्त कर लेते हैं ॥

अकामहतसंकल्पा ज्ञाने नित्यं समाहिताः । आत्मन्यग्नीन् समाधाय निराहारा निराशिषः ॥ विषयेषु निरारम्भा विमुक्ता ज्ञानचक्षुषः । अनन्यमनसो धीराः स्वाभावनियमान्विताः ॥ जिन्होंने निष्कामभावके द्वारा अपने सारे संकल्पोंको नष्ट कर दिया है, जो सदा ज्ञानमें ही चित्तको एकाग्र किये रहते हैं और अग्नियोंको अपने आत्मामें ही स्थापित करके आहार

(भोग) और कामनाओंका त्याग कर देते हैं, विषयोंकी उपलब्धिके लिये जिनकी कोई प्रवृत्ति नहीं होती, जो सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त एवं ज्ञानदृष्टिसे सम्पन्न हैं, वे स्वभावतः नियमपरायण एवं अनन्यचित्तसे मेरा चिन्तन करनेवाले धीर पुरुष मुझे ही प्राप्त होते हैं।।

यत् तद् वियति दृष्टं तत् सरः पद्मोत्पलायुतम् ।
तत्राग्नयः संनिहिता दीप्यन्ते स्म निरिन्धनाः ।।
तुमने जो आकाशमें कमल और उत्पलसे भरा हुआ सुन्दर सरोवर देखा था, उसके समीप स्थापित हुई अग्नियाँ बिना ईंधनके ही प्रज्वलित होती हैं।।

ज्ञानामलाशयास्तस्मिन् ये च चंद्रांशुनिर्मलाः ।
उपासीना गृणन्तोऽग्निं प्रस्पष्टाक्षरभाषिणः ।।
आकाङ्क्षमाणाः शुचयस्तेष्वग्निषु विहङ्गम ।
जिनके अन्तःकरण ज्ञानके प्रकाशसे निर्मल हो गये हैं, जो चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल हैं, वे ही वहाँ स्पष्ट अक्षरका उच्चारण करते हुए वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक अग्निकी उपासना करते हैं। विहंगम! वे पवित्रभावसे रहकर उन अग्नियोंकी परिचर्याकी ही इच्छा रखते हैं।।

ये मया भावितात्मानो मय्येभिरताः सदा ।।
उपासते च मामेव ज्योतिर्भूता निरामयाः ।
तैर्हि तत्रैव वस्तव्यं नीरागात्मभिरच्युतैः ।।
मेरा चिन्तन करनेके कारण जिनका अन्तःकरण पवित्र हो गया है, जो सदा मेरी ही उपासनामें रत हैं, वे ही वहाँ रोग-शोकसे रहित एवं ज्योतिःस्वरूप होकर मेरी ही उपासना किया करते हैं। वे अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होकर वीतराग हृदयसे सदा वहीं निवास करेंगे ।।

निराहारा ह्यनिष्यन्दाश्चन्द्रांशुसदृशप्रभाः ।
निर्मला निरहंकारा निरालम्बा निराशिषः ।।
मद्भक्ताः सततं ते वै भक्तस्तानपि चाप्यहम् ।
उनकी अंगकान्ति चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल है। वे निराहार, श्रमविन्दुओंसे रहित, निर्मल, अहंकारशून्य, आलम्बनरहित और निष्काम हैं। उनकी सदा मुझमें भक्ति बनी रहती है तथा मैं भी उनका भक्त (प्रेमी) बना रहता हूँ ।।

चतुर्धाहं विभक्तात्मा चरामि जगतो हितः ।।
लोकानां धारणार्थाय विधानं विदधामि च ।
यथावत्तदशेषेण श्रोतुमर्हसि मे भवान् ।।
मैं अपनेको चार स्वरूपोंमें विभक्त करके जगत्के हितसाधनमें तत्पर हो विचरता रहता हूँ। सम्पूर्ण लोक जीवित एवं सुरक्षित रहें—इसके लिये मैं विधान बनाता हूँ। वह सब तुम यथार्थरूपसे सुननेके अधिकारी हो ।।

एका मूर्तिर्निर्गुणाख्या योगं परममास्थिता । द्वितीया सृजते तात भूतग्रामं चराचरम् ॥ तात! मेरी एक निर्गुण मूर्ति है जो परम योगका आश्रय लेकर रहती है। दूसरी वह मूर्ति है जो चराचर प्राणिसमुदायकी सृष्टि करती है ॥

सृष्टं संहरते चैका जगत् स्थावरजङ्गमम् । जातात्मनिष्ठा क्षपयन् मोहयन्निव मायया ॥ तीसरी मूर्ति स्थावर-जङ्गम जगत्‌का संहार करती है और चौथी मूर्ति आत्मनिष्ठ है, जो आसुरी शक्तियोंको मायासे मोहित-सी करके उन्हें नष्ट कर देती है ॥

क्षिपन्ती मोहयन्ती च ह्यात्मनिष्ठा स्वमायया । चतुर्थी मे महामूर्तिर्जगद्वृद्धिं ददाति सा ॥ रक्षते चापि नियता सोऽहमस्मि नभश्चर । अपनी मायासे दुष्टोंको मोहित और नष्ट करनेवाली जो मेरी चौथी आत्मनिष्ठ महामूर्ति है, वह नियम-पूर्वक रहकर जगत्‌की वृद्धि और रक्षा करती है। गरुड! वही मैं हूँ ॥

मया सर्वमिदं व्याप्तं मयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ अहं सर्वजगद्बीजं सर्वत्रगतिरव्ययः । मैंने इस सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रखा है। सारा जगत् मुझमें ही प्रतिष्ठित है। मैं ही सम्पूर्ण जगत्‌का बीज हूँ। मेरी सर्वत्र गति है और मैं अविनाशी हूँ ॥

यानि तान्यग्निहोत्राणि ये च चन्द्रांशुराशयः । गृणन्ति वेदं सततं तेष्वग्निषु विहङ्गम ॥ क्रमेण मां समायान्ति सुखिनो ज्ञानसंयुताः । तेषामहं तपो दीप्तं तेजः सम्यक् समाहितम् । नित्यं ते मयि वर्तन्ते तेषु चाहमतन्द्रितः ॥ विहंगम! वे जो अग्निहोत्र थे तथा जो चन्द्रमाकी किरणोंके पुंज-जैसी कान्तिवाले पुरुष निरन्तर उन अग्नियोंके समीप बैठकर वेदोंका पाठ करते थे, वे ज्ञानसम्पन्न एवं सुखी होकर क्रमशः मुझे प्राप्त होते हैं। मैं ही उनका उद्दीप्त तप और सम्यक् रूपसे संचित तेज हूँ। वे सदा मुझमें विद्यमान हैं और मैं उनमें सावधान हुआ रहता हूँ ॥

सर्वतो मुक्तसङ्गेन मय्यनन्यसमाधिना । शक्यः समासादयितुमहं वै ज्ञानचक्षुषा ॥ जो सब ओरसे आसक्तिशून्य है, वह मुझमें अनन्यभावसे चित्तको एकाग्र करके ज्ञानदृष्टिसे मेरा साक्षात्कार कर सकता है ॥

एकान्तिनो ध्यानपरा यतिभावाद् व्रजन्ति माम् । जो संन्यासका आश्रय लेकर अनन्यभावसे मेरे ध्यानमें तत्पर रहते हैं, वे मुझे ही प्राप्त होते हैं ॥

सत्त्वयुक्ता मतिर्येषां केवलात्मविनिश्चिता ।।
ते पश्यन्ति स्वमात्मानं परमात्मानमव्ययम् ।
जिनकी बुद्धि सत्त्वगुणसे युक्त है और केवल आत्मतत्त्वका निश्चय करके उसीके चिन्तनमें लगी हुई है, वे अपने आत्मरूप अविनाशी परमात्माका दर्शन करते हैं ।।

अहिंसा सर्वभूतेषु तेष्ववस्थितमार्जवम् ।।
तेष्वेव च समाधाय सम्यगेति स मामजम् ।
उन्हींका समस्त प्राणियोंके प्रति अहिंसाभाव होता है, उन्हींमें 'सरलता' नामक सद्गुणकी स्थिति होती है और उन्हीं गुणोंमें स्थित हुआ जो चित्तको मुझ परमात्मामें भलीभाँति समाहित कर देता है वह मुझ अजन्मा परमेश्वरको प्राप्त होता है ।।

यदेतत् परमं गुह्यमाख्यानं परमाद्भुतम् ।।
यत्नेन तदशेषेण यथावच्छ्रोतुमर्हसि ।
यह जो परम गोपनीय एवं अत्यन्त अद्भुत आख्यान है, इसे पूर्णतः यत्नपूर्वक यथावत् रूपसे श्रवण करो ।।

ये त्वग्निहोत्रनियता जपयज्ञपरायणाः ।।
ये मामुपासते शश्वदेतांस्त्वं दृष्टवानसि ।
जो अग्निहोत्रमें संलग्न और जप-यज्ञपरायण होते हैं, जो निरन्तर मेरी उपासना करते रहते हैं; उन्हींका तुमने प्रत्यक्ष दर्शन किया है ।।

शास्त्रदृष्टविधानज्ञा असक्ताः क्वचिदन्यथा ।।
शक्योऽहं वेदितुं तैस्तु यन्मे परममव्ययम् ।
जो शास्त्रोक्त विधिके ज्ञाता होकर अनासक्त-भावसे सत्कर्म करते हैं, कभी शास्त्रविपरीत—असत् कर्ममें नहीं लगते, उनके द्वारा ही मैं जाना जा सकता हूँ। मेरा जो अविनाशी परम तत्त्व है, उसे भी वे ही जान सकते हैं ।।

तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन प्रसन्नात्मात्मविच्छुचिः ।।
आसादयति तद् ब्रह्म यत्र गत्वा न शोचति ।
इसलिये विशुद्ध ज्ञानके द्वारा जिसका चित्त प्रसन्न (निर्मल) है, जो आत्मतत्त्वका ज्ञाता और पवित्र है, वह ज्ञानी पुरुष ही उस ब्रह्मको प्राप्त होता है, जहाँ जाकर कोई शोकमें नहीं पड़ता ।।

शुद्धाभिजनसम्पन्नाः श्रद्धायुक्तेन चेतसा ।।
मद्भक्त्या च द्विजश्रेष्ठा गच्छन्ति परमां गतिम् ।
जो शुद्ध कुलमें उत्पन्न हैं, जो श्रेष्ठ द्विज श्रद्धायुक्त चित्तसे मेरा भजन करते हैं, वे मेरी भक्तिद्वारा परम गतिको प्राप्त होते हैं ।।

यद गुह्यं परमं बुद्धेर्लिङ्गग्रहणं च यत् ।।
तत् सूक्ष्मं गृह्यते विप्रैर्यतिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।

जो बुद्धिके लिये परम गुह्य रहस्य है, जो किसी आकृतिसे गृहीत नहीं होता—अनुभवमें नहीं आता उस सूक्ष्म परब्रह्मका तत्त्वदर्शी यति ब्राह्मण साक्षात्कार कर लेते हैं।।

न वायुः पवते तत्र न तस्मिन् ज्योतिषां गतिः।।
न चापः पृथिवी नैव नाकाशं न मनोगतिः।
वहाँ यह वायु नहीं चलती, ग्रहों और नक्षत्रोंकी पहुँच नहीं होती तथा जल, पृथ्वी, आकाश और मनकी भी गति नहीं हो पाती है।।

तस्माच्चैतानि सर्वाणि प्रजायन्ते विहङ्गम।।
सर्वेभ्यश्च स तेभ्यश्च प्रभवत्यमलो विभुः।
विहंगम! उसी ब्रह्मसे ये सारी वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं। वह निर्मल एवं सर्वव्यापी परमात्मा उन सबके द्वारा ही सबको उत्पन्न करनेमें समर्थ है।।

स्थूलदर्शनमेतन्मे यद् दृष्टं भवतानघ।।
एतत् सूक्ष्मस्य च द्वारं कार्याणां कारणं त्वहम्।
अनघ! तुमने जो मेरा यह स्थूल रूप देखा है, यही मेरे सूक्ष्म स्वरूपमें प्रवेश करनेका द्वार है। समस्त कार्योंका कारण मैं ही हूँ।।

दृष्टो वै भवता तस्मात् सरस्यमितविक्रम।।
अमित पराक्रमी गरुड! इसीलिये तुमने उस सरोवरमें मेरा दर्शन किया है।।

मां यज्ञमाहुर्यज्ञज्ञा वेदं वेदविदो जनाः।
मुनयश्चापि मामेव जपयज्ञं प्रचक्षते।।
यज्ञके ज्ञाता मुझे यज्ञ कहते हैं। वेदोंके विद्वान् मुझे ही वेद बताते हैं और मुनि भी मुझे ही जप-यज्ञ कहते हैं।।

वक्ता मन्ता रसयिता घ्राता द्रष्टा प्रदर्शकः।
बोद्धा बोद्धयिता चाहं गन्ता श्रोता चिदात्मकः।।
मैं ही वक्ता, मनन करनेवाला, रस लेनेवाला, सूँघनेवाला, देखने और दिखानेवाला, समझने और समझानेवाला तथा जाने और सुननेवाला चेतन आत्मा हूँ।।

मामिष्ट्वा स्वर्गमायान्ति तथा चाप्नुवते महत्।
ज्ञात्वा मामेव चैवं ते निःसङ्गेनान्तरात्मना।।
मेरा ही यजन करके यजमान स्वर्गमें आते और महान् पद पाते हैं। इसी प्रकार जो अनासक्त हृदयसे मुझे ही जान लेते हैं, वे मुझ परमात्माको ही प्राप्त होते हैं।।

अहं तेजो द्विजातीनां मम तेजो द्विजातयः।
मम यस्तेजसा देहः सोऽग्निरित्यवगम्यताम्।।
मैं ब्राह्मणोंका तेज हूँ और ब्राह्मण मेरे तेज हैं। मेरे तेजसे जो शरीर प्रकट हुआ है, उसीको तुम अग्नि समझो।।

प्राणपालः शरीरेऽहं योगिनामहमीश्वरः।

सांख्यानामिदमेवाग्रे मयि सर्वमिदं जगत् ।।
मैं ही शरीरमें प्राणोंका रक्षक हूँ। मैं ही योगियोंका ईश्वर हूँ। सांख्योंका जो यह प्रधान तत्त्व है, वह भी मैं ही हूँ। मुझमें ही यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है ।।
धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं चैवार्जवं जपम् ।
तमः सत्त्वं रजश्चैव कर्मजं च भवाप्ययम् ।।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, सरलता, जप, सत्त्वगुण, तमोगुण, रजोगुण तथा कर्मजनित जन्म-मरण—सब मेरे ही स्वरूप हैं ।।
स तदाहं तथारूपस्त्वया दृष्टः सनातनः ।
ततस्त्वहं परतरः शक्यः कालेन वेदितुम् ।।
मम यत् परमं गुह्यो शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् ।
तदेवं परमो गुह्यो देवो नारायणो हरिः ।।
उस समय तुमने मुझ सनातन पुरुषका उस रूपमें दर्शन किया था। उससे भी उत्कृष्ट जो मेरा स्वरूप है, उसे तुम समयानुसार जान सकते हो। मेरा जो परम गोपनीय, शाश्वत, ध्रुव एवं अव्यय पद है, उसका ज्ञान भी तुम्हें समयानुसार हो सकता है। इस प्रकार मैं नारायणदेव एवं हरिनामसे प्रसिद्ध परमेश्वर परम गोपनीय माना गया हूँ ।।
न तच्छक्यं भुजङ्गारे वेत्तुमभ्युयान्वितैः ।
निरारम्भनमस्कारा निराशीर्बन्धनास्तथा ।।
गच्छन्ति तं महात्मानं परं ब्रह्म सनातनम् ।
गरुड! जो लौकिक अभ्युदयमें आसक्त हैं, वे मेरे उस स्वरूपको नहीं जान सकते। जो कर्मोंके आरम्भका मार्ग छोड़ चुके हैं, नमस्कारसे दूर हो गये हैं और कामनाओंके बन्धनसे मुक्त हैं, वे यतिजन उन सनातन परमात्मा परब्रह्मको प्राप्त होते हैं ।।
स्थूलोऽहमेवं विहग त्वया दृष्टस्तथानघ ।।
एतच्चापि न वेत्त्यन्यस्त्वामृते पन्नगाशन ।
निष्पाप पक्षिराज गरुड! इस प्रकार तुमने मेरे स्थूल स्वरूपका दर्शन किया है। परंतु तुम्हारे सिवा दूसरा कोई इस स्वरूपको भी नहीं जानता ।।
मा मतिस्तव गान्नाशमेषा गतिरनुत्तमा ।।
मद्भक्तो भव नित्यं त्वं ततो वेत्स्यसि मे पदम् ।
तुम्हारी बुद्धिका नाश न हो—यही सर्वोत्तम गति है। तुम नित्य-निरन्तर मेरी भक्तिमें लगे रहो। इससे तुम्हें मेरे स्वरूपका यथार्थ बोध हो जायगा ।।
एतत् ते सर्वमाख्यातं रहस्यं दिव्यमानुषम् ।।
एतच्छ्रेयः परं चैतत् पन्थानं विद्धि मोक्षिणाम् ।
यह सब तुम्हें बताया गया। यह देवताओं और मनुष्योंके लिये भी रहस्यकी बात है। यही परम कल्याण है। तुम इसे मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंका मार्ग समझो ।।

सुपर्ण उवाच

एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ।।
पश्यतो मे महायोगी जगामात्मगतिर्गतिम् ।
गरुड कहते हैं—ऋषियो! ऐसा कहकर वे भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। वे महायोगी तथा आत्मगतिरूप परमेश्वर मेरे देखते-देखते अदृश्य हो गये ।।
एतदेवंविधं तस्य महिमानं महात्मनः ।।
अच्युतस्याप्रमेयस्य दृष्टवानस्मि यत् पुरा ।
इस प्रकार मैंने पूर्वकालमें अप्रमेय महात्मा अच्युतकी महिमाका साक्षात्कार किया था।
एतद् वः सर्वमाख्यातं चेष्टितं तस्य धीमतः ।।
मयानुभूतं प्रत्यक्षं दृष्ट्वा चाद्भुतकर्मणः ।
अद्भुतकर्मा परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीहरिकी यह सारी लीला जो मैंने प्रत्यक्ष देखकर अनुभव की है, आपको बता दी ।।

ऋषय ऊचुः

अहो श्रावितमाख्यानं भवतात्यद्भुतं महत् ।।
पुण्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् ।
ऋषियोंने कहा—अहो! आपने यह बड़ा अद्भुत एवं महत्त्वपूर्ण आख्यान सुनाया। यह परम पवित्र प्रसंग यश, आयु एवं स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला तथा महान् मंगलकारी है ।।
एतत् पवित्रं देवानामेतद् गुह्यं परंतप ।।
एतज्ज्ञानवतां ज्ञेयमेषा गतिरनुत्तमा ।
परंतप गरुडजी! यह पवित्र विषय देवताओंके लिये भी गुह्य रहस्य है। यही ज्ञानियोंका ज्ञेय है और यही सर्वोत्तम गति है ।।
य इमां श्रावयेद् विद्वान् कथां पर्वसु पर्वसु ।।
स लोकान् प्राप्नुयात् पुण्यान् देवर्षिभिरभिष्टुतान् ।
जो विद्वान् प्रत्येक पर्वके अवसरपर इस कथाको सुनायेगा वह देवर्षियोंद्वारा प्रशंसित पुण्य-लोकोंको प्राप्त होगा ।।
श्राद्धकाले च विप्राणां य इमां श्रावयेच्छुचिः ।।
न तत्र रक्षसां भागो नासुराणां च विद्यते ।
जो श्राद्धके समय पवित्रभावसे ब्राह्मणोंको यह प्रसंग सुनायेगा, उस श्राद्धमें राक्षसों और असुरोंको भाग नहीं मिलेगा ।।
अनसूयुर्जितक्रोधः सर्वसत्त्वहिते रतः ।।
यः पठेत् सततं युक्तः स व्रजेत् तत्सलोकताम् ।

जो दोषदृष्टिसे रहित हो क्रोधको जीतकर समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर हो सदा योगयुक्त रहकर इसका पाठ करेगा वह भगवान् विष्णुके लोकमें जायगा ।।

वेदान् पारयते विप्रो राजा विजयवान् भवेत् ।।
वैश्यस्तु धनधान्याढ्यः शूद्रः सुखमवाप्नुयात् ।
इसका पाठ करनेवाला ब्राह्मण वेदोंका पारंगत विद्वान् होगा। क्षत्रियको इसका पाठ करनेसे युद्धमें विजयकी प्राप्ति होगी। वैश्य धन-धान्यसे सम्पन्न और शूद्र सुखी होगा ।।

भीष्म उवाच

ततस्ते मुनयः सर्वे सम्पूज्य विनतासुतम् ।
स्वानेव चाश्रमान् जग्मुर्बभूवुः शान्तितत्पराः ।।
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर वे सम्पूर्ण महर्षि विनतानन्दन गरुडकी पूजा करके अपने-अपने आश्रमको चले गये और वहाँ शम-दमके साधनमें तत्पर हो गये ।।

स्थूलदर्शिभिराकृष्टो दुर्ज्ञेयो ह्यकृतात्मभिः ।
एषा श्रुतिर्महाराज धर्म्या धर्मभृतां वर ।।
सुराणां ब्रह्मणा प्रोक्ता विस्मितानां परंतप ।
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज युधिष्ठिर! जिनका मन अपने वशमें नहीं है, उन स्थूलदर्शी पुरुषोंके लिये भगवान् श्रीहरिके तत्त्वका ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है। यह धर्मसम्मत श्रुति है। परंतप! इसे ब्रह्माजीने आश्चर्यचकित हुए देवताओंको सुनाया था ।।

ममाप्येषा कथा तात कथिता मातुरन्तिके ।।
वसुभिः सत्त्वसम्पन्नैः तवाप्येषा मयोच्यते ।
तात! तत्त्वज्ञानी वसुओंने मेरी माता गंगाजीके निकट मुझसे यह कथा कही थी और अब तुमसे मैंने कही है ।।

तदग्निहोत्रपरमा जपयज्ञपरायणाः ।।
निराशीर्बन्धनाः सन्तः प्रयान्त्यक्षरसात्मताम् ।
जो अग्निहोत्रमें तत्पर, जप-यज्ञमें संलग्न तथा कामनाओंके बन्धनसे मुक्त होते हैं, वे अविनाशी परमात्माके स्वरूपको प्राप्त हो जाते हैं ।।

आरम्भयज्ञानुत्सृज्य जपहोमपरायणाः ।
ध्यायन्तो मनसा विष्णुं गच्छन्ति परमां गतिम् ।।
जो क्रियात्मक यज्ञोंका परित्याग करके जप और होममें तत्पर हो मन-ही-मन भगवान् विष्णुका ध्यान करते हैं वे परम गतिको प्राप्त होते हैं ।।

तदेव परमो मोक्षो मोक्षद्वारं च भारत ।
यदा विनिश्चितात्मानो गच्छन्ति परमां गतिम् ।।