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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 162

जो दोषदृष्टिसे रहित हो क्रोधको जीतकर समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर हो सदा योगयुक्त रहकर इसका पाठ करेगा वह भगवान् विष्णुके लोकमें जायगा ।।

वेदान् पारयते विप्रो राजा विजयवान् भवेत् ।।
वैश्यस्तु धनधान्याढ्यः शूद्रः सुखमवाप्नुयात् ।
इसका पाठ करनेवाला ब्राह्मण वेदोंका पारंगत विद्वान् होगा। क्षत्रियको इसका पाठ करनेसे युद्धमें विजयकी प्राप्ति होगी। वैश्य धन-धान्यसे सम्पन्न और शूद्र सुखी होगा ।।

भीष्म उवाच

ततस्ते मुनयः सर्वे सम्पूज्य विनतासुतम् ।
स्वानेव चाश्रमान् जग्मुर्बभूवुः शान्तितत्पराः ।।
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर वे सम्पूर्ण महर्षि विनतानन्दन गरुडकी पूजा करके अपने-अपने आश्रमको चले गये और वहाँ शम-दमके साधनमें तत्पर हो गये ।।

स्थूलदर्शिभिराकृष्टो दुर्ज्ञेयो ह्यकृतात्मभिः ।
एषा श्रुतिर्महाराज धर्म्या धर्मभृतां वर ।।
सुराणां ब्रह्मणा प्रोक्ता विस्मितानां परंतप ।
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज युधिष्ठिर! जिनका मन अपने वशमें नहीं है, उन स्थूलदर्शी पुरुषोंके लिये भगवान् श्रीहरिके तत्त्वका ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है। यह धर्मसम्मत श्रुति है। परंतप! इसे ब्रह्माजीने आश्चर्यचकित हुए देवताओंको सुनाया था ।।

ममाप्येषा कथा तात कथिता मातुरन्तिके ।।
वसुभिः सत्त्वसम्पन्नैः तवाप्येषा मयोच्यते ।
तात! तत्त्वज्ञानी वसुओंने मेरी माता गंगाजीके निकट मुझसे यह कथा कही थी और अब तुमसे मैंने कही है ।।

तदग्निहोत्रपरमा जपयज्ञपरायणाः ।।
निराशीर्बन्धनाः सन्तः प्रयान्त्यक्षरसात्मताम् ।
जो अग्निहोत्रमें तत्पर, जप-यज्ञमें संलग्न तथा कामनाओंके बन्धनसे मुक्त होते हैं, वे अविनाशी परमात्माके स्वरूपको प्राप्त हो जाते हैं ।।

आरम्भयज्ञानुत्सृज्य जपहोमपरायणाः ।
ध्यायन्तो मनसा विष्णुं गच्छन्ति परमां गतिम् ।।
जो क्रियात्मक यज्ञोंका परित्याग करके जप और होममें तत्पर हो मन-ही-मन भगवान् विष्णुका ध्यान करते हैं वे परम गतिको प्राप्त होते हैं ।।

तदेव परमो मोक्षो मोक्षद्वारं च भारत ।
यदा विनिश्चितात्मानो गच्छन्ति परमां गतिम् ।।