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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 161

सुपर्ण उवाच

एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ।।
पश्यतो मे महायोगी जगामात्मगतिर्गतिम् ।
गरुड कहते हैं—ऋषियो! ऐसा कहकर वे भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। वे महायोगी तथा आत्मगतिरूप परमेश्वर मेरे देखते-देखते अदृश्य हो गये ।।
एतदेवंविधं तस्य महिमानं महात्मनः ।।
अच्युतस्याप्रमेयस्य दृष्टवानस्मि यत् पुरा ।
इस प्रकार मैंने पूर्वकालमें अप्रमेय महात्मा अच्युतकी महिमाका साक्षात्कार किया था।
एतद् वः सर्वमाख्यातं चेष्टितं तस्य धीमतः ।।
मयानुभूतं प्रत्यक्षं दृष्ट्वा चाद्भुतकर्मणः ।
अद्भुतकर्मा परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीहरिकी यह सारी लीला जो मैंने प्रत्यक्ष देखकर अनुभव की है, आपको बता दी ।।

ऋषय ऊचुः

अहो श्रावितमाख्यानं भवतात्यद्भुतं महत् ।।
पुण्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् ।
ऋषियोंने कहा—अहो! आपने यह बड़ा अद्भुत एवं महत्त्वपूर्ण आख्यान सुनाया। यह परम पवित्र प्रसंग यश, आयु एवं स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला तथा महान् मंगलकारी है ।।
एतत् पवित्रं देवानामेतद् गुह्यं परंतप ।।
एतज्ज्ञानवतां ज्ञेयमेषा गतिरनुत्तमा ।
परंतप गरुडजी! यह पवित्र विषय देवताओंके लिये भी गुह्य रहस्य है। यही ज्ञानियोंका ज्ञेय है और यही सर्वोत्तम गति है ।।
य इमां श्रावयेद् विद्वान् कथां पर्वसु पर्वसु ।।
स लोकान् प्राप्नुयात् पुण्यान् देवर्षिभिरभिष्टुतान् ।
जो विद्वान् प्रत्येक पर्वके अवसरपर इस कथाको सुनायेगा वह देवर्षियोंद्वारा प्रशंसित पुण्य-लोकोंको प्राप्त होगा ।।
श्राद्धकाले च विप्राणां य इमां श्रावयेच्छुचिः ।।
न तत्र रक्षसां भागो नासुराणां च विद्यते ।
जो श्राद्धके समय पवित्रभावसे ब्राह्मणोंको यह प्रसंग सुनायेगा, उस श्राद्धमें राक्षसों और असुरोंको भाग नहीं मिलेगा ।।
अनसूयुर्जितक्रोधः सर्वसत्त्वहिते रतः ।।
यः पठेत् सततं युक्तः स व्रजेत् तत्सलोकताम् ।

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