महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 160, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसांख्यानामिदमेवाग्रे मयि सर्वमिदं जगत् ।।
मैं ही शरीरमें प्राणोंका रक्षक हूँ। मैं ही योगियोंका ईश्वर हूँ। सांख्योंका जो यह प्रधान तत्त्व है, वह भी मैं ही हूँ। मुझमें ही यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है ।।
धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं चैवार्जवं जपम् ।
तमः सत्त्वं रजश्चैव कर्मजं च भवाप्ययम् ।।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, सरलता, जप, सत्त्वगुण, तमोगुण, रजोगुण तथा कर्मजनित जन्म-मरण—सब मेरे ही स्वरूप हैं ।।
स तदाहं तथारूपस्त्वया दृष्टः सनातनः ।
ततस्त्वहं परतरः शक्यः कालेन वेदितुम् ।।
मम यत् परमं गुह्यो शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् ।
तदेवं परमो गुह्यो देवो नारायणो हरिः ।।
उस समय तुमने मुझ सनातन पुरुषका उस रूपमें दर्शन किया था। उससे भी उत्कृष्ट जो मेरा स्वरूप है, उसे तुम समयानुसार जान सकते हो। मेरा जो परम गोपनीय, शाश्वत, ध्रुव एवं अव्यय पद है, उसका ज्ञान भी तुम्हें समयानुसार हो सकता है। इस प्रकार मैं नारायणदेव एवं हरिनामसे प्रसिद्ध परमेश्वर परम गोपनीय माना गया हूँ ।।
न तच्छक्यं भुजङ्गारे वेत्तुमभ्युयान्वितैः ।
निरारम्भनमस्कारा निराशीर्बन्धनास्तथा ।।
गच्छन्ति तं महात्मानं परं ब्रह्म सनातनम् ।
गरुड! जो लौकिक अभ्युदयमें आसक्त हैं, वे मेरे उस स्वरूपको नहीं जान सकते। जो कर्मोंके आरम्भका मार्ग छोड़ चुके हैं, नमस्कारसे दूर हो गये हैं और कामनाओंके बन्धनसे मुक्त हैं, वे यतिजन उन सनातन परमात्मा परब्रह्मको प्राप्त होते हैं ।।
स्थूलोऽहमेवं विहग त्वया दृष्टस्तथानघ ।।
एतच्चापि न वेत्त्यन्यस्त्वामृते पन्नगाशन ।
निष्पाप पक्षिराज गरुड! इस प्रकार तुमने मेरे स्थूल स्वरूपका दर्शन किया है। परंतु तुम्हारे सिवा दूसरा कोई इस स्वरूपको भी नहीं जानता ।।
मा मतिस्तव गान्नाशमेषा गतिरनुत्तमा ।।
मद्भक्तो भव नित्यं त्वं ततो वेत्स्यसि मे पदम् ।
तुम्हारी बुद्धिका नाश न हो—यही सर्वोत्तम गति है। तुम नित्य-निरन्तर मेरी भक्तिमें लगे रहो। इससे तुम्हें मेरे स्वरूपका यथार्थ बोध हो जायगा ।।
एतत् ते सर्वमाख्यातं रहस्यं दिव्यमानुषम् ।।
एतच्छ्रेयः परं चैतत् पन्थानं विद्धि मोक्षिणाम् ।
यह सब तुम्हें बताया गया। यह देवताओं और मनुष्योंके लिये भी रहस्यकी बात है। यही परम कल्याण है। तुम इसे मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंका मार्ग समझो ।।