भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 159

जो बुद्धिके लिये परम गुह्य रहस्य है, जो किसी आकृतिसे गृहीत नहीं होता—अनुभवमें नहीं आता उस सूक्ष्म परब्रह्मका तत्त्वदर्शी यति ब्राह्मण साक्षात्कार कर लेते हैं।।

न वायुः पवते तत्र न तस्मिन् ज्योतिषां गतिः।।
न चापः पृथिवी नैव नाकाशं न मनोगतिः।
वहाँ यह वायु नहीं चलती, ग्रहों और नक्षत्रोंकी पहुँच नहीं होती तथा जल, पृथ्वी, आकाश और मनकी भी गति नहीं हो पाती है।।

तस्माच्चैतानि सर्वाणि प्रजायन्ते विहङ्गम।।
सर्वेभ्यश्च स तेभ्यश्च प्रभवत्यमलो विभुः।
विहंगम! उसी ब्रह्मसे ये सारी वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं। वह निर्मल एवं सर्वव्यापी परमात्मा उन सबके द्वारा ही सबको उत्पन्न करनेमें समर्थ है।।

स्थूलदर्शनमेतन्मे यद् दृष्टं भवतानघ।।
एतत् सूक्ष्मस्य च द्वारं कार्याणां कारणं त्वहम्।
अनघ! तुमने जो मेरा यह स्थूल रूप देखा है, यही मेरे सूक्ष्म स्वरूपमें प्रवेश करनेका द्वार है। समस्त कार्योंका कारण मैं ही हूँ।।

दृष्टो वै भवता तस्मात् सरस्यमितविक्रम।।
अमित पराक्रमी गरुड! इसीलिये तुमने उस सरोवरमें मेरा दर्शन किया है।।

मां यज्ञमाहुर्यज्ञज्ञा वेदं वेदविदो जनाः।
मुनयश्चापि मामेव जपयज्ञं प्रचक्षते।।
यज्ञके ज्ञाता मुझे यज्ञ कहते हैं। वेदोंके विद्वान् मुझे ही वेद बताते हैं और मुनि भी मुझे ही जप-यज्ञ कहते हैं।।

वक्ता मन्ता रसयिता घ्राता द्रष्टा प्रदर्शकः।
बोद्धा बोद्धयिता चाहं गन्ता श्रोता चिदात्मकः।।
मैं ही वक्ता, मनन करनेवाला, रस लेनेवाला, सूँघनेवाला, देखने और दिखानेवाला, समझने और समझानेवाला तथा जाने और सुननेवाला चेतन आत्मा हूँ।।

मामिष्ट्वा स्वर्गमायान्ति तथा चाप्नुवते महत्।
ज्ञात्वा मामेव चैवं ते निःसङ्गेनान्तरात्मना।।
मेरा ही यजन करके यजमान स्वर्गमें आते और महान् पद पाते हैं। इसी प्रकार जो अनासक्त हृदयसे मुझे ही जान लेते हैं, वे मुझ परमात्माको ही प्राप्त होते हैं।।

अहं तेजो द्विजातीनां मम तेजो द्विजातयः।
मम यस्तेजसा देहः सोऽग्निरित्यवगम्यताम्।।
मैं ब्राह्मणोंका तेज हूँ और ब्राह्मण मेरे तेज हैं। मेरे तेजसे जो शरीर प्रकट हुआ है, उसीको तुम अग्नि समझो।।

प्राणपालः शरीरेऽहं योगिनामहमीश्वरः।