महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 158, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्त्वयुक्ता मतिर्येषां केवलात्मविनिश्चिता ।।
ते पश्यन्ति स्वमात्मानं परमात्मानमव्ययम् ।
जिनकी बुद्धि सत्त्वगुणसे युक्त है और केवल आत्मतत्त्वका निश्चय करके उसीके चिन्तनमें लगी हुई है, वे अपने आत्मरूप अविनाशी परमात्माका दर्शन करते हैं ।।
अहिंसा सर्वभूतेषु तेष्ववस्थितमार्जवम् ।।
तेष्वेव च समाधाय सम्यगेति स मामजम् ।
उन्हींका समस्त प्राणियोंके प्रति अहिंसाभाव होता है, उन्हींमें 'सरलता' नामक सद्गुणकी स्थिति होती है और उन्हीं गुणोंमें स्थित हुआ जो चित्तको मुझ परमात्मामें भलीभाँति समाहित कर देता है वह मुझ अजन्मा परमेश्वरको प्राप्त होता है ।।
यदेतत् परमं गुह्यमाख्यानं परमाद्भुतम् ।।
यत्नेन तदशेषेण यथावच्छ्रोतुमर्हसि ।
यह जो परम गोपनीय एवं अत्यन्त अद्भुत आख्यान है, इसे पूर्णतः यत्नपूर्वक यथावत् रूपसे श्रवण करो ।।
ये त्वग्निहोत्रनियता जपयज्ञपरायणाः ।।
ये मामुपासते शश्वदेतांस्त्वं दृष्टवानसि ।
जो अग्निहोत्रमें संलग्न और जप-यज्ञपरायण होते हैं, जो निरन्तर मेरी उपासना करते रहते हैं; उन्हींका तुमने प्रत्यक्ष दर्शन किया है ।।
शास्त्रदृष्टविधानज्ञा असक्ताः क्वचिदन्यथा ।।
शक्योऽहं वेदितुं तैस्तु यन्मे परममव्ययम् ।
जो शास्त्रोक्त विधिके ज्ञाता होकर अनासक्त-भावसे सत्कर्म करते हैं, कभी शास्त्रविपरीत—असत् कर्ममें नहीं लगते, उनके द्वारा ही मैं जाना जा सकता हूँ। मेरा जो अविनाशी परम तत्त्व है, उसे भी वे ही जान सकते हैं ।।
तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन प्रसन्नात्मात्मविच्छुचिः ।।
आसादयति तद् ब्रह्म यत्र गत्वा न शोचति ।
इसलिये विशुद्ध ज्ञानके द्वारा जिसका चित्त प्रसन्न (निर्मल) है, जो आत्मतत्त्वका ज्ञाता और पवित्र है, वह ज्ञानी पुरुष ही उस ब्रह्मको प्राप्त होता है, जहाँ जाकर कोई शोकमें नहीं पड़ता ।।
शुद्धाभिजनसम्पन्नाः श्रद्धायुक्तेन चेतसा ।।
मद्भक्त्या च द्विजश्रेष्ठा गच्छन्ति परमां गतिम् ।
जो शुद्ध कुलमें उत्पन्न हैं, जो श्रेष्ठ द्विज श्रद्धायुक्त चित्तसे मेरा भजन करते हैं, वे मेरी भक्तिद्वारा परम गतिको प्राप्त होते हैं ।।
यद गुह्यं परमं बुद्धेर्लिङ्गग्रहणं च यत् ।।
तत् सूक्ष्मं गृह्यते विप्रैर्यतिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।