महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 157, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंएका मूर्तिर्निर्गुणाख्या योगं परममास्थिता । द्वितीया सृजते तात भूतग्रामं चराचरम् ॥ तात! मेरी एक निर्गुण मूर्ति है जो परम योगका आश्रय लेकर रहती है। दूसरी वह मूर्ति है जो चराचर प्राणिसमुदायकी सृष्टि करती है ॥
सृष्टं संहरते चैका जगत् स्थावरजङ्गमम् । जातात्मनिष्ठा क्षपयन् मोहयन्निव मायया ॥ तीसरी मूर्ति स्थावर-जङ्गम जगत्का संहार करती है और चौथी मूर्ति आत्मनिष्ठ है, जो आसुरी शक्तियोंको मायासे मोहित-सी करके उन्हें नष्ट कर देती है ॥
क्षिपन्ती मोहयन्ती च ह्यात्मनिष्ठा स्वमायया । चतुर्थी मे महामूर्तिर्जगद्वृद्धिं ददाति सा ॥ रक्षते चापि नियता सोऽहमस्मि नभश्चर । अपनी मायासे दुष्टोंको मोहित और नष्ट करनेवाली जो मेरी चौथी आत्मनिष्ठ महामूर्ति है, वह नियम-पूर्वक रहकर जगत्की वृद्धि और रक्षा करती है। गरुड! वही मैं हूँ ॥
मया सर्वमिदं व्याप्तं मयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ अहं सर्वजगद्बीजं सर्वत्रगतिरव्ययः । मैंने इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है। सारा जगत् मुझमें ही प्रतिष्ठित है। मैं ही सम्पूर्ण जगत्का बीज हूँ। मेरी सर्वत्र गति है और मैं अविनाशी हूँ ॥
यानि तान्यग्निहोत्राणि ये च चन्द्रांशुराशयः । गृणन्ति वेदं सततं तेष्वग्निषु विहङ्गम ॥ क्रमेण मां समायान्ति सुखिनो ज्ञानसंयुताः । तेषामहं तपो दीप्तं तेजः सम्यक् समाहितम् । नित्यं ते मयि वर्तन्ते तेषु चाहमतन्द्रितः ॥ विहंगम! वे जो अग्निहोत्र थे तथा जो चन्द्रमाकी किरणोंके पुंज-जैसी कान्तिवाले पुरुष निरन्तर उन अग्नियोंके समीप बैठकर वेदोंका पाठ करते थे, वे ज्ञानसम्पन्न एवं सुखी होकर क्रमशः मुझे प्राप्त होते हैं। मैं ही उनका उद्दीप्त तप और सम्यक् रूपसे संचित तेज हूँ। वे सदा मुझमें विद्यमान हैं और मैं उनमें सावधान हुआ रहता हूँ ॥
सर्वतो मुक्तसङ्गेन मय्यनन्यसमाधिना । शक्यः समासादयितुमहं वै ज्ञानचक्षुषा ॥ जो सब ओरसे आसक्तिशून्य है, वह मुझमें अनन्यभावसे चित्तको एकाग्र करके ज्ञानदृष्टिसे मेरा साक्षात्कार कर सकता है ॥
एकान्तिनो ध्यानपरा यतिभावाद् व्रजन्ति माम् । जो संन्यासका आश्रय लेकर अनन्यभावसे मेरे ध्यानमें तत्पर रहते हैं, वे मुझे ही प्राप्त होते हैं ॥