महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 156, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें(भोग) और कामनाओंका त्याग कर देते हैं, विषयोंकी उपलब्धिके लिये जिनकी कोई प्रवृत्ति नहीं होती, जो सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त एवं ज्ञानदृष्टिसे सम्पन्न हैं, वे स्वभावतः नियमपरायण एवं अनन्यचित्तसे मेरा चिन्तन करनेवाले धीर पुरुष मुझे ही प्राप्त होते हैं।।
यत् तद् वियति दृष्टं तत् सरः पद्मोत्पलायुतम् ।
तत्राग्नयः संनिहिता दीप्यन्ते स्म निरिन्धनाः ।।
तुमने जो आकाशमें कमल और उत्पलसे भरा हुआ सुन्दर सरोवर देखा था, उसके समीप स्थापित हुई अग्नियाँ बिना ईंधनके ही प्रज्वलित होती हैं।।
ज्ञानामलाशयास्तस्मिन् ये च चंद्रांशुनिर्मलाः ।
उपासीना गृणन्तोऽग्निं प्रस्पष्टाक्षरभाषिणः ।।
आकाङ्क्षमाणाः शुचयस्तेष्वग्निषु विहङ्गम ।
जिनके अन्तःकरण ज्ञानके प्रकाशसे निर्मल हो गये हैं, जो चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल हैं, वे ही वहाँ स्पष्ट अक्षरका उच्चारण करते हुए वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक अग्निकी उपासना करते हैं। विहंगम! वे पवित्रभावसे रहकर उन अग्नियोंकी परिचर्याकी ही इच्छा रखते हैं।।
ये मया भावितात्मानो मय्येभिरताः सदा ।।
उपासते च मामेव ज्योतिर्भूता निरामयाः ।
तैर्हि तत्रैव वस्तव्यं नीरागात्मभिरच्युतैः ।।
मेरा चिन्तन करनेके कारण जिनका अन्तःकरण पवित्र हो गया है, जो सदा मेरी ही उपासनामें रत हैं, वे ही वहाँ रोग-शोकसे रहित एवं ज्योतिःस्वरूप होकर मेरी ही उपासना किया करते हैं। वे अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होकर वीतराग हृदयसे सदा वहीं निवास करेंगे ।।
निराहारा ह्यनिष्यन्दाश्चन्द्रांशुसदृशप्रभाः ।
निर्मला निरहंकारा निरालम्बा निराशिषः ।।
मद्भक्ताः सततं ते वै भक्तस्तानपि चाप्यहम् ।
उनकी अंगकान्ति चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल है। वे निराहार, श्रमविन्दुओंसे रहित, निर्मल, अहंकारशून्य, आलम्बनरहित और निष्काम हैं। उनकी सदा मुझमें भक्ति बनी रहती है तथा मैं भी उनका भक्त (प्रेमी) बना रहता हूँ ।।
चतुर्धाहं विभक्तात्मा चरामि जगतो हितः ।।
लोकानां धारणार्थाय विधानं विदधामि च ।
यथावत्तदशेषेण श्रोतुमर्हसि मे भवान् ।।
मैं अपनेको चार स्वरूपोंमें विभक्त करके जगत्के हितसाधनमें तत्पर हो विचरता रहता हूँ। सम्पूर्ण लोक जीवित एवं सुरक्षित रहें—इसके लिये मैं विधान बनाता हूँ। वह सब तुम यथार्थरूपसे सुननेके अधिकारी हो ।।