महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 155, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमत्तो जातानि भूतानि मया धार्यन्त्यहर्निशम् । मय्येव विलयं यान्ति प्रलये पन्नगाशन ॥ गरुड! सम्पूर्ण भूत प्राणी मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं, मेरे ही द्वारा वे अहर्निश जीवन धारण करते हैं और प्रलयके समय सब-के-सब मुझमें ही लीन हो जाते हैं।
यो मां यथा वेदयति तस्य तस्यास्मि काश्यप । मनोबुद्धिगतः श्रेयो विदधामि विहङ्गम ॥ काश्यप! जो मुझे जैसा जानता है, उसके लिये मैं वैसा ही हूँ। विहंगम! मैं सभीके मन और बुद्धिमें रहकर सबका कल्याण करता हूँ ॥
मां तु ज्ञातुं कृता बुद्धिर्भवता पक्षिसत्तम । शृणु योऽहं यतश्चाहं यदर्थं चाहमुद्यतः ॥ पक्षिप्रवर! तुमने मेरे तत्त्वको जाननेका विचार किया था; अतः मैं कौन हूँ? कहाँसे आया हूँ? और किस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये उद्यत हुआ हूँ? यह सब बताता हूँ, सुनो ॥
ये केचिन्नियतात्मानस्त्रेताग्निपरमा द्विजाः । अग्निकार्यपरा नित्यं जपहोमपरायणाः ॥ आत्मन्यग्नीन् समाधाय नियता नियतेन्द्रियाः । अनन्यमनसस्ते मां सर्वे वै समुपासते ॥ यजन्तो जपयज्ञैर्मां मानसैश्च सुसंयताः । अग्नीनभ्युद्ययुः शश्वदग्निष्वेवाभिसंस्थिताः ॥ अनन्यकार्याः शुचयो नित्यमग्निपरायणाः । य एवं बुद्धयो धीरास्ते मां गच्छन्ति तादृशाः ॥ जो कोई ब्राह्मण अपने मनको वशमें करके त्रिविध अग्नियोंकी उपासना करते हैं, नित्य अग्निहोत्रमें तत्पर और जप-होममें संलग्न हैं, जो नियमपूर्वक रहकर अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अपने-आपमें ही अग्नियोंका आधान कर लेते हैं तथा सब-के-सब अनन्यचित्त होकर मेरी ही उपासना करते हैं, जो अपनेको पूर्ण संयममें रखकर जप, यज्ञ और मानसयज्ञोंद्वारा मेरी आराधना करते हैं, जो सदा अग्निहोत्रमें ही तत्पर रहकर अग्नियोंका स्वागत करते हैं तथा अन्य कार्यमें रत न होकर शुद्धभावसे सदा अग्निकी परिचर्या करते हैं; ऐसी बुद्धिवाले धीर पुरुष वैसे भक्तिभावसे सम्पन्न होते हैं, वे मुझे प्राप्त कर लेते हैं ॥
अकामहतसंकल्पा ज्ञाने नित्यं समाहिताः । आत्मन्यग्नीन् समाधाय निराहारा निराशिषः ॥ विषयेषु निरारम्भा विमुक्ता ज्ञानचक्षुषः । अनन्यमनसो धीराः स्वाभावनियमान्विताः ॥ जिन्होंने निष्कामभावके द्वारा अपने सारे संकल्पोंको नष्ट कर दिया है, जो सदा ज्ञानमें ही चित्तको एकाग्र किये रहते हैं और अग्नियोंको अपने आत्मामें ही स्थापित करके आहार