भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 154

मां न देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः । विदुस्तत्त्वेन तत्त्वस्थं सूक्ष्मात्मानमवस्थितम् ॥ श्रीभगवान् बोले— गरुड! मुझे न तो देवता, न गन्धर्व, न पिशाच और न राक्षस ही तत्त्वसे जानते हैं। मैं सम्पूर्ण तत्त्वोंमें उनके सूक्ष्म आत्मारूपसे अवस्थित हूँ।।

चतुर्धांहं विभक्तात्मा लोकानां हितकाम्यया । भूतभव्यभविष्यादिर्नादिर्विश्वकृत्तमः ॥ लोकोंके हितकी कामनासे मैंने अपने आपको चार स्वरूपोंमें विभक्त कर रखा है। मैं भूत, वर्तमान और भविष्यका आदि हूँ। मेरा आदि कोई नहीं है। मैं ही सबसे बड़ा विश्वस्रष्टा हूँ।।

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । मनो बुद्धिश्च तेजश्च तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ प्रकृतिर्विकृतिश्चेति विद्याविद्ये शुभाशुभे । मत्त एतानि जायन्ते नाहमेभ्यः कथंचन ॥ पृथ्‍वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, मन, बुद्धि, तेज (अहंकार), सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण, प्रकृति, विकृति, विद्या, अविद्या तथा शुभ और अशुभ—ये सब मुझसे ही उत्पन्न होते हैं। मैं इनसे किसी प्रकार उत्पन्न नहीं होता ।।

यत् किंचिच्छ्रेयसा युक्तः श्रेष्ठभावं व्यवस्यति । धर्मयुक्तं च पुण्यं च सोऽहमस्मि निरामयः ॥ मनुष्य कल्याणभावनासे युक्त हो जिस किसी पवित्र, धर्मयुक्त एवं श्रेष्ठ भावका निश्चय करता है वह सब मैं निरामय परमेश्वर ही हूँ।।

यः स्वभावात्मतत्त्वज्ञैः कारणैरुपलक्ष्यते । अनादिमध्यनिधनः सोऽन्तरात्मास्मि शाश्वतः ॥ स्वभाव एवं आत्माके तत्त्वको जाननेवाले पुरुष विभिन्न हेतुओंद्वारा जिसका साक्षात्कार करते हैं, वह आदि, मध्य और अन्तसे रहित सर्वान्तरात्मा सनातन पुरुष मैं ही हूँ।।

यत् तु मे परमं गुह्यं रूपं सूक्ष्मार्थदर्शिभिः । गृह्यते सूक्ष्मभावज्ञैः स विभाव्योऽस्मि शाश्वतः ॥ सूक्ष्म अर्थको देखने और समझनेवाले तथा सूक्ष्मभावको जाननेवाले ज्ञानी पुरुष मेरे जिस परम गुह्य रूपको ग्रहण करते हैं, वह चिन्तनीय सनातन परमात्मा मैं ही हूँ।।

यत् तु मे परमं गुह्यं येन व्याप्तमिदं जगत् । सोऽहं गतः सर्वसत्त्वः सर्वस्य प्रभवोऽप्ययः ॥ जो मेरा परम गुह्य रूप है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, वह सर्वसत्त्वरूप परमात्मा मैं ही हूँ, मैं ही सबका अविनाशी कारण हूँ।।