महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशिरस्यञ्जलिमाधाय विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥ अवोचं तमदीनार्थं श्रेष्ठानां श्रेष्ठमुत्तमम् । उन दुर्जय परमात्माको बारंबार प्रणाम करके उनकी ओर देखकर मेरे नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे और मैंने मस्तकपर अंजलि बाँधे उन श्रेष्ठ पुरुषोंमें भी सर्वश्रेष्ठ एवं उदार पुरुषोत्तमसे कहा— ॥
नमस्ते भगवन् देव भूतभव्यभवत्प्रभो ॥ यदेतदद्भुतं देव मया दृष्टं त्वदाश्रयम् । अनादिमध्यपर्यन्तं किं तच्छंसितुमर्हसि ॥ ‘भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी भगवान् नारायणदेव! आपको नमस्कार है। देव! मैंने आपके आश्रित जो यह अद्भुत दृश्य देखा है, इसका कहीं आदि, मध्य और अन्त नहीं है। वह सब क्या है, यह बतानेकी कृपा करें’ ॥
यदि जानासि मां भक्तं यदि वानुग्रहो मयि । शंस सर्वमशेषेण श्रोतव्यं यदि चेन्मया ॥ ‘यदि आप मुझे अपना भक्त समझते हैं अथवा यदि आपका मुझपर अनुग्रह है तो यह सब यदि मेरे सुननेयोग्य हो तो पूर्णरूपसे बताइये’ ॥
स्वभावस्तव दुर्ज्ञेयः प्रादुर्भावोऽभवस्य च । भवद्भूतभविष्येश सर्वथा गहनो भवान् ॥ ‘आपका स्वभाव दुर्ज्ञेय है। आप अजन्मा परमेश्वरका प्रादुर्भाव भी समझमें आना कठिन है। भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी नारायण! आप सर्वथा गहन (अगम्य) हैं’ ॥
ब्रूहि सर्वमशेषेण तदाश्चर्यं महामुने । किं तदत्यद्भुतं वृत्तं तेष्वग्निषु समन्ततः ॥ ‘महामुने! वह सारा आश्चर्यजनक एवं अद्भुत वृत्तान्त जो उन अग्नियोंके चारों ओर देखा गया, क्या था? यह पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा करें’ ॥
कानि तान्यग्निहोत्राणि केषां शब्दः श्रुतो मया । शृण्वतां ब्रह्म सततमदृश्यानां महात्मनाम् ॥ ‘वे अग्निहोत्र कौन थे? निरन्तर वेदोंका श्रवण और पाठ करनेवाले वे अदृश्य महात्मा कौन थे, जिनका शब्दमात्र मैंने सुना था?’ ॥
एतन्मे भगवन् कृष्ण ब्रूहि सर्वमशेषतः । गृणन्त्यग्निसमीपेषु के च ते ब्रह्मराशयः ॥ ‘भगवान् श्रीकृष्ण! यह सब आप पूर्णरूपसे मुझे बताइये। जो लोग अग्निके समीप वेदोंका पारायण कर रहे थे, वे ब्राह्मणसमूह महात्मा कौन थे?’ ॥
श्रीभगवानुवाच