भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 152

श्रीभगवान् बोले—गरुड! तुम डरो मत। तुमने मन और इन्द्रियोंको जीत लिया है। अब तुम पुनः इन्द्र आदि देवताओंके सहित अपने घरमें जाकर पुत्रों और भाई-बन्धुओंको देखोगे॥

सुपर्ण उवाच

ततस्तस्मिन् क्षणेनैव सहसैव महाद्युतिः॥
प्रत्यदृश्यत तेजस्वी पुरस्तात् स ममान्तिके।
गरुडजी कहते हैं—मुनियो! तदनन्तर उसी क्षण वे परम कान्तिमान् तेजस्वी नारायण सहसा मेरे सामने अत्यन्त निकट दिखायी दिये॥
समागम्य ततस्तेन शिवेन परमात्मना॥
अपश्यं चाहमायान्तं नरनारायणाश्रमे।
चतुर्द्विगुणविन्यासं तं च देवं सनातनम्॥
तब उन मंगलमय परमात्मासे मिलकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर मैंने देखा, वे आठ भुजाओंवाले सनातनदेव पुनः नर-नारायणके आश्रमकी ओर आ रहे हैं॥
यजतस्तान्ऋषीन् देवान् वदतो ध्यायतो मुनीन्।
युक्तान् सिद्धान् नैष्ठिकांश्च जपतो यजतो गृहीन्॥
वहाँ मैंने देखा, ऋषि यज्ञ कर रहे हैं, देवता बातें कर रहे हैं, मुनिलोग ध्यानमें मग्न हैं, योगयुक्त सिद्ध और नैष्ठिक ब्रह्मचारी जप करते हैं तथा गृहस्थलोग यज्ञोंके अनुष्ठानमें संलग्न हैं॥
पुष्पपूरपरिक्षिप्तं धूपितं दीपितं हितम्।
वन्दितं सिक्तसम्मूष्टं नरनारायणाश्रमम्॥
नर-नारायणका आश्रम धूपसे सुगन्धित और दीपसे प्रकाशित हो रहा था। वहाँ चारों ओर ढेर-के-ढेर फूल बिखरे हुए थे। वह आश्रम सबके लिये हितकर एवं सत्पुरुषोंद्वारा वन्दित था। झाड़-बुहारकर स्वच्छ बनाया और सींचा गया था॥
तदद्भुतमहं दृष्ट्वा विस्मितोऽस्मि तदानघाः।
जगाम शिरसा देवं प्रयतेनान्तरात्मना॥
निष्पाप मुनियो! उस अद्भुत दृश्यको देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ और मैंने पवित्र एवं एकाग्र हृदयसे मस्तक झुकाकर उन भगवान्‌की शरण ली॥
तदत्यद्भुतसंकाशं किमेतदिति चिन्तयन्।
नाध्यगच्छं परं दिव्यं तस्य सर्वभवात्मनः॥
वह सब अद्भुत-सा दृश्य क्या था, यह बहुत सोचनेपर भी मेरी समझमें नहीं आया। सबकी उत्पत्तिके कारणभूत उन परमात्माके परम दिव्य भावको मैं नहीं समझ सका॥
प्रणिपत्य सुदुर्धर्षं पुनः पुनरुदीक्ष्य च।