भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 151

है ।। हिरण्यगर्भाय नमः सौम्याय वृषरूपिणे । नारायणाग्रवपुषे पुरुहूताय वज्रिणे ।। धर्मिणे वृषसेनाय धर्मसेनाय रोधसे । ‘जो हिरण्यगर्भ, सौम्य, वृषरूपधारी, नारायण, श्रेष्ठ शरीरधारी, पुरुहूत (इन्द्र) तथा वज्र धारण करनेवाले हैं, जो धर्मात्मा, वृषसेन, धर्मसेन तथा तटरूप हैं, उन भगवान् श्रीहरिको नमस्कार है ।। मुनये ज्वरमुक्ताय ज्वराधिपतये नमः ।। अनेत्राय त्रिनेत्राय पिङ्गलाय विडूर्म्मिणे । ‘जो मननशील मुनि, ज्वर आदि रोगोंसे मुक्त तथा ज्वरके अधिपति हैं, जिनके नेत्र नहीं हैं अथवा जिनके तीन नेत्र हैं, जो पिंगलवर्णवाले तथा प्रजारूपी लहरोंकी उत्पत्तिके लिये महासागरके समान हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ।। तपोब्रह्मनिधानाय युगपर्यायिणे नमः ।। शरणाय शरण्याय शक्तेष्टशरणाय च । नमः सर्वभवेशाय भूतभव्यभवाय च ।। ‘जो तप और वेदकी निधि हैं, बारी-बारीसे युगोंका परिवर्तन करनेवाले हैं, सबके शरणदाता, शरणागतवत्सल और शक्तिशाली पुरुषके लिये अभीष्ट आश्रय हैं, सम्पूर्ण संसारके अधीश्वर एवं भूत, वर्तमान और भविष्यरूप हैं, उन भगवान् नारायणको नमस्कार है ।। पाहि मां देवदेवेश कोऽप्यजोऽसि सनातन । एवं गतोऽसि शरणं शरण्यं ब्रह्मयोनिनाम् ।। ‘देवदेवेश्वर! आप मेरी रक्षा करें। सनातन परमात्मन्! आप कोई अनिर्वचनीय अजन्मा पुरुष हैं, ब्राह्मणोंके शरणदाता हैं; मैं इस संकटमें पड़कर आपकी ही शरण लेता हूँ’ ।। स्तव्यं स्तवं स्तुतवतस्तत् तमो मे प्रणश्यत । शृणोमि च गिरं दिव्यामान्तर्धानगतां शिवाम् । इस प्रकार स्तवनीय परमेश्वरकी स्तुति करते ही मेरा वह सारा दुःख नष्ट हो गया। तत्पश्चात् मुझे किसी अदृश्य शक्तिके द्वारा कही हुई यह मंगलमयी दिव्य वाणी सुनायी दी ।।

श्रीभगवानुवाच

मा भैर्गरुत्मन् दान्तोऽसि पुनः सेन्द्रान् दिवौकसः ।। स्वं चैव भवनं गत्वा द्रक्ष्यसे पुत्रबान्धवान् ।