महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
जो बुद्धिके लिये परम गुह्य रहस्य है, जो किसी आकृतिसे गृहीत नहीं होता—अनुभवमें नहीं आता उस सूक्ष्म परब्रह्मका तत्त्वदर्शी यति ब्राह्मण साक्षात्कार कर लेते हैं।।
न वायुः पवते तत्र न तस्मिन् ज्योतिषां गतिः।।
न चापः पृथिवी नैव नाकाशं न मनोगतिः।
वहाँ यह वायु नहीं चलती, ग्रहों और नक्षत्रोंकी पहुँच नहीं होती तथा जल, पृथ्वी, आकाश और मनकी भी गति नहीं हो पाती है।।
तस्माच्चैतानि सर्वाणि प्रजायन्ते विहङ्गम।।
सर्वेभ्यश्च स तेभ्यश्च प्रभवत्यमलो विभुः।
विहंगम! उसी ब्रह्मसे ये सारी वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं। वह निर्मल एवं सर्वव्यापी परमात्मा उन सबके द्वारा ही सबको उत्पन्न करनेमें समर्थ है।।
स्थूलदर्शनमेतन्मे यद् दृष्टं भवतानघ।।
एतत् सूक्ष्मस्य च द्वारं कार्याणां कारणं त्वहम्।
अनघ! तुमने जो मेरा यह स्थूल रूप देखा है, यही मेरे सूक्ष्म स्वरूपमें प्रवेश करनेका द्वार है। समस्त कार्योंका कारण मैं ही हूँ।।
दृष्टो वै भवता तस्मात् सरस्यमितविक्रम।।
अमित पराक्रमी गरुड! इसीलिये तुमने उस सरोवरमें मेरा दर्शन किया है।।
मां यज्ञमाहुर्यज्ञज्ञा वेदं वेदविदो जनाः।
मुनयश्चापि मामेव जपयज्ञं प्रचक्षते।।
यज्ञके ज्ञाता मुझे यज्ञ कहते हैं। वेदोंके विद्वान् मुझे ही वेद बताते हैं और मुनि भी मुझे ही जप-यज्ञ कहते हैं।।
वक्ता मन्ता रसयिता घ्राता द्रष्टा प्रदर्शकः।
बोद्धा बोद्धयिता चाहं गन्ता श्रोता चिदात्मकः।।
मैं ही वक्ता, मनन करनेवाला, रस लेनेवाला, सूँघनेवाला, देखने और दिखानेवाला, समझने और समझानेवाला तथा जाने और सुननेवाला चेतन आत्मा हूँ।।
मामिष्ट्वा स्वर्गमायान्ति तथा चाप्नुवते महत्।
ज्ञात्वा मामेव चैवं ते निःसङ्गेनान्तरात्मना।।
मेरा ही यजन करके यजमान स्वर्गमें आते और महान् पद पाते हैं। इसी प्रकार जो अनासक्त हृदयसे मुझे ही जान लेते हैं, वे मुझ परमात्माको ही प्राप्त होते हैं।।
अहं तेजो द्विजातीनां मम तेजो द्विजातयः।
मम यस्तेजसा देहः सोऽग्निरित्यवगम्यताम्।।
मैं ब्राह्मणोंका तेज हूँ और ब्राह्मण मेरे तेज हैं। मेरे तेजसे जो शरीर प्रकट हुआ है, उसीको तुम अग्नि समझो।।
प्राणपालः शरीरेऽहं योगिनामहमीश्वरः।
सांख्यानामिदमेवाग्रे मयि सर्वमिदं जगत् ।।
मैं ही शरीरमें प्राणोंका रक्षक हूँ। मैं ही योगियोंका ईश्वर हूँ। सांख्योंका जो यह प्रधान तत्त्व है, वह भी मैं ही हूँ। मुझमें ही यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है ।।
धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं चैवार्जवं जपम् ।
तमः सत्त्वं रजश्चैव कर्मजं च भवाप्ययम् ।।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, सरलता, जप, सत्त्वगुण, तमोगुण, रजोगुण तथा कर्मजनित जन्म-मरण—सब मेरे ही स्वरूप हैं ।।
स तदाहं तथारूपस्त्वया दृष्टः सनातनः ।
ततस्त्वहं परतरः शक्यः कालेन वेदितुम् ।।
मम यत् परमं गुह्यो शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् ।
तदेवं परमो गुह्यो देवो नारायणो हरिः ।।
उस समय तुमने मुझ सनातन पुरुषका उस रूपमें दर्शन किया था। उससे भी उत्कृष्ट जो मेरा स्वरूप है, उसे तुम समयानुसार जान सकते हो। मेरा जो परम गोपनीय, शाश्वत, ध्रुव एवं अव्यय पद है, उसका ज्ञान भी तुम्हें समयानुसार हो सकता है। इस प्रकार मैं नारायणदेव एवं हरिनामसे प्रसिद्ध परमेश्वर परम गोपनीय माना गया हूँ ।।
न तच्छक्यं भुजङ्गारे वेत्तुमभ्युयान्वितैः ।
निरारम्भनमस्कारा निराशीर्बन्धनास्तथा ।।
गच्छन्ति तं महात्मानं परं ब्रह्म सनातनम् ।
गरुड! जो लौकिक अभ्युदयमें आसक्त हैं, वे मेरे उस स्वरूपको नहीं जान सकते। जो कर्मोंके आरम्भका मार्ग छोड़ चुके हैं, नमस्कारसे दूर हो गये हैं और कामनाओंके बन्धनसे मुक्त हैं, वे यतिजन उन सनातन परमात्मा परब्रह्मको प्राप्त होते हैं ।।
स्थूलोऽहमेवं विहग त्वया दृष्टस्तथानघ ।।
एतच्चापि न वेत्त्यन्यस्त्वामृते पन्नगाशन ।
निष्पाप पक्षिराज गरुड! इस प्रकार तुमने मेरे स्थूल स्वरूपका दर्शन किया है। परंतु तुम्हारे सिवा दूसरा कोई इस स्वरूपको भी नहीं जानता ।।
मा मतिस्तव गान्नाशमेषा गतिरनुत्तमा ।।
मद्भक्तो भव नित्यं त्वं ततो वेत्स्यसि मे पदम् ।
तुम्हारी बुद्धिका नाश न हो—यही सर्वोत्तम गति है। तुम नित्य-निरन्तर मेरी भक्तिमें लगे रहो। इससे तुम्हें मेरे स्वरूपका यथार्थ बोध हो जायगा ।।
एतत् ते सर्वमाख्यातं रहस्यं दिव्यमानुषम् ।।
एतच्छ्रेयः परं चैतत् पन्थानं विद्धि मोक्षिणाम् ।
यह सब तुम्हें बताया गया। यह देवताओं और मनुष्योंके लिये भी रहस्यकी बात है। यही परम कल्याण है। तुम इसे मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंका मार्ग समझो ।।
सुपर्ण उवाच
एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ।।
पश्यतो मे महायोगी जगामात्मगतिर्गतिम् ।
गरुड कहते हैं—ऋषियो! ऐसा कहकर वे भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। वे महायोगी तथा आत्मगतिरूप परमेश्वर मेरे देखते-देखते अदृश्य हो गये ।।
एतदेवंविधं तस्य महिमानं महात्मनः ।।
अच्युतस्याप्रमेयस्य दृष्टवानस्मि यत् पुरा ।
इस प्रकार मैंने पूर्वकालमें अप्रमेय महात्मा अच्युतकी महिमाका साक्षात्कार किया था।
एतद् वः सर्वमाख्यातं चेष्टितं तस्य धीमतः ।।
मयानुभूतं प्रत्यक्षं दृष्ट्वा चाद्भुतकर्मणः ।
अद्भुतकर्मा परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीहरिकी यह सारी लीला जो मैंने प्रत्यक्ष देखकर अनुभव की है, आपको बता दी ।।
ऋषय ऊचुः
अहो श्रावितमाख्यानं भवतात्यद्भुतं महत् ।।
पुण्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् ।
ऋषियोंने कहा—अहो! आपने यह बड़ा अद्भुत एवं महत्त्वपूर्ण आख्यान सुनाया। यह परम पवित्र प्रसंग यश, आयु एवं स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला तथा महान् मंगलकारी है ।।
एतत् पवित्रं देवानामेतद् गुह्यं परंतप ।।
एतज्ज्ञानवतां ज्ञेयमेषा गतिरनुत्तमा ।
परंतप गरुडजी! यह पवित्र विषय देवताओंके लिये भी गुह्य रहस्य है। यही ज्ञानियोंका ज्ञेय है और यही सर्वोत्तम गति है ।।
य इमां श्रावयेद् विद्वान् कथां पर्वसु पर्वसु ।।
स लोकान् प्राप्नुयात् पुण्यान् देवर्षिभिरभिष्टुतान् ।
जो विद्वान् प्रत्येक पर्वके अवसरपर इस कथाको सुनायेगा वह देवर्षियोंद्वारा प्रशंसित पुण्य-लोकोंको प्राप्त होगा ।।
श्राद्धकाले च विप्राणां य इमां श्रावयेच्छुचिः ।।
न तत्र रक्षसां भागो नासुराणां च विद्यते ।
जो श्राद्धके समय पवित्रभावसे ब्राह्मणोंको यह प्रसंग सुनायेगा, उस श्राद्धमें राक्षसों और असुरोंको भाग नहीं मिलेगा ।।
अनसूयुर्जितक्रोधः सर्वसत्त्वहिते रतः ।।
यः पठेत् सततं युक्तः स व्रजेत् तत्सलोकताम् ।
जो दोषदृष्टिसे रहित हो क्रोधको जीतकर समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर हो सदा योगयुक्त रहकर इसका पाठ करेगा वह भगवान् विष्णुके लोकमें जायगा ।।
वेदान् पारयते विप्रो राजा विजयवान् भवेत् ।।
वैश्यस्तु धनधान्याढ्यः शूद्रः सुखमवाप्नुयात् ।
इसका पाठ करनेवाला ब्राह्मण वेदोंका पारंगत विद्वान् होगा। क्षत्रियको इसका पाठ करनेसे युद्धमें विजयकी प्राप्ति होगी। वैश्य धन-धान्यसे सम्पन्न और शूद्र सुखी होगा ।।
भीष्म उवाच
ततस्ते मुनयः सर्वे सम्पूज्य विनतासुतम् ।
स्वानेव चाश्रमान् जग्मुर्बभूवुः शान्तितत्पराः ।।
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर वे सम्पूर्ण महर्षि विनतानन्दन गरुडकी पूजा करके अपने-अपने आश्रमको चले गये और वहाँ शम-दमके साधनमें तत्पर हो गये ।।
स्थूलदर्शिभिराकृष्टो दुर्ज्ञेयो ह्यकृतात्मभिः ।
एषा श्रुतिर्महाराज धर्म्या धर्मभृतां वर ।।
सुराणां ब्रह्मणा प्रोक्ता विस्मितानां परंतप ।
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज युधिष्ठिर! जिनका मन अपने वशमें नहीं है, उन स्थूलदर्शी पुरुषोंके लिये भगवान् श्रीहरिके तत्त्वका ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है। यह धर्मसम्मत श्रुति है। परंतप! इसे ब्रह्माजीने आश्चर्यचकित हुए देवताओंको सुनाया था ।।
ममाप्येषा कथा तात कथिता मातुरन्तिके ।।
वसुभिः सत्त्वसम्पन्नैः तवाप्येषा मयोच्यते ।
तात! तत्त्वज्ञानी वसुओंने मेरी माता गंगाजीके निकट मुझसे यह कथा कही थी और अब तुमसे मैंने कही है ।।
तदग्निहोत्रपरमा जपयज्ञपरायणाः ।।
निराशीर्बन्धनाः सन्तः प्रयान्त्यक्षरसात्मताम् ।
जो अग्निहोत्रमें तत्पर, जप-यज्ञमें संलग्न तथा कामनाओंके बन्धनसे मुक्त होते हैं, वे अविनाशी परमात्माके स्वरूपको प्राप्त हो जाते हैं ।।
आरम्भयज्ञानुत्सृज्य जपहोमपरायणाः ।
ध्यायन्तो मनसा विष्णुं गच्छन्ति परमां गतिम् ।।
जो क्रियात्मक यज्ञोंका परित्याग करके जप और होममें तत्पर हो मन-ही-मन भगवान् विष्णुका ध्यान करते हैं वे परम गतिको प्राप्त होते हैं ।।
तदेव परमो मोक्षो मोक्षद्वारं च भारत ।
यदा विनिश्चितात्मानो गच्छन्ति परमां गतिम् ।।
भरतनन्दन! जब निश्चित बुद्धिवाले पुरुष परमात्म-तत्त्वको जानकर परम गतिको प्राप्त हो जाते हैं, वही परम मोक्ष या मोक्षद्वार कहलाता है ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि लोकयात्रकथने त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें लोकयात्राके निर्वाहकी विधिका वर्णनविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २०४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल २१० १/३ श्लोक हैं)
चतुर्दशोऽध्यायः
भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन
युधिष्ठिर उवाच
त्वयाऽऽपगेन नामानि श्रुतानीह जगत्पतेः ।
पितामहेशाय विभो नामान्याचक्ष्व शम्भवे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा—गंगानन्दन! आपने ब्रह्माजीके भी ईश्वर कल्याणकारी जगदीश्वर भगवान् शिवके जो नाम सुने हों, उन्हें यहाँ बताइये ॥ १ ॥
बभ्रवे विश्वरूपाय महाभाग्यं च तत्त्वतः ।
सुरासुरगुरौ देवे शंकरेऽव्यक्तयोनये ॥ २ ॥
जो विराट् विश्वरूपधारी हैं, अव्यक्तके भी कारण हैं, उन सुरासुरगुरु भगवान् शंकरके माहात्म्यका यथार्थरूपसे वर्णन कीजिये ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
अशक्तोऽहं गुणान् वक्तुं महादेवस्य धीमतः ।
यो हि सर्वगतो देवो न च सर्वत्र दृश्यते ॥ ३ ॥
ब्रह्मविष्णुसुरेशानां स्रष्टा च प्रभुरेव च ।
ब्रह्मादयः पिशाचान्ता यं हि देवा उपासते ॥ ४ ॥
प्रकृतीनां परत्वेन पुरुषस्य च यः परः ।
चिन्त्यते यो योगविद्भिर्ऋषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।
अक्षरं परमं ब्रह्म असच्च सदसच्च यः ॥ ५ ॥
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षोभयित्वा स्वतेजसा ।
ब्रह्माणमसृजत् तस्माद् देवदेवः प्रजापतिः ॥ ६ ॥
को हि शक्तो गुणान् वक्तुं देवदेवस्य धीमतः ।
गर्भजन्मजरायुक्तो मर्त्यो मृत्युसमन्वितः ॥ ७ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! मैं परम बुद्धिमान् महादेवजीके गुणोंका वर्णन करनेमें असमर्थ हूँ। जो भगवान् सर्वत्र व्यापक हैं, किन्तु (सबके आत्मा होनेके कारण) सर्वत्र देखनेमें नहीं आते हैं, ब्रह्मा, विष्णु और देवराज इन्द्रके भी स्रष्टा तथा प्रभु हैं, ब्रह्मा आदि
देवताओंसे लेकर पिशाचतक जिनकी उपासना करते हैं, जो प्रकृतिसे भी परे और पुरुषसे भी विलक्षण हैं, योगवेत्ता तत्त्वदर्शी ऋषि जिनका चिन्तन करते हैं, जो अविनाशी परम ब्रह्म एवं सदसत्स्वरूप हैं, जिन देवाधिदेव प्रजापति शिवने अपने तेजसे प्रकृति और पुरुषको क्षुब्ध करके ब्रह्माजीकी सृष्टि की, उन्हीं देवदेव बुद्धिमान् महादेवजीके गुणोंका वर्णन करनेमें गर्भ, जन्म, जरा और मृत्युसे युक्त कौन मनुष्य समर्थ हो सकता है? ।। को हि शक्तो भवं ज्ञातुं मद्विधः परमेश्वरम् । ऋते नारायणात् पुत्र शङ्खचक्रगदाधरात् ॥ ८ ॥ बेटा! शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् नारायणको छोड़कर मेरे-जैसा कौन पुरुष परमेश्वर शिवके तत्त्वको जान सकता है? ॥ ८ ॥ एष विद्वान् गुणश्रेष्ठो विष्णुः परमदुर्जयः । दिव्यचक्षुर्महातेजा वीक्षते योगचक्षुषा ॥ ९ ॥ ये भगवान् विष्णु सर्वज्ञ, गुणोंमें सबसे श्रेष्ठ, अत्यन्त दुर्जय, दिव्य नेत्रधारी तथा महातेजस्वी हैं। ये योगदृष्टिसे सब कुछ देखते हैं ॥ ९ ॥ रुद्रभक्त्या तु कृष्णेन जगद् व्याप्तं महात्मना । तं प्रसाद्य तदा देवं बदर्यां किल भारत ॥ १० ॥ अर्थात् प्रियतरत्वं च सर्वलोकेषु वै तदा । प्राप्तवानेव राजेन्द्र सुवर्णाक्षान्महेश्वरात् ॥ ११ ॥ भरतनन्दन! रुद्रदेवके प्रति भक्तिके कारण ही महात्मा श्रीकृष्णने सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है। राजन्! कहते हैं कि पूर्वकालमें महादेवजीको बदरिकाश्रममें प्रसन्न करके उन दिव्यदृष्टि महेश्वरसे श्रीकृष्णने सब पदार्थोंकी अपेक्षा प्रियतर भावको प्राप्त कर लिया; अर्थात् वे सम्पूर्ण लोकोंके प्रियतम बन गये ॥ १०-११ ॥ पूर्णं वर्षसहस्रं तु तप्तवानेष माधवः । प्रसाद्य वरदं देवं चराचरगुरुं शिवम् ॥ १२ ॥ इन माधवने वरदायक देवता चराचरगुरु भगवान् शिवको प्रसन्न करते हुए पूर्वकालमें पूरे एक हजार वर्षतक तपस्या की थी ॥ १२ ॥ युगे युगे तु कृष्णेन तोषितो वै महेश्वरः । भक्त्या परमया चैव प्रीतश्चैव महात्मनः ॥ १३ ॥ श्रीकृष्णने प्रत्येक युगमें महेश्वरको संतुष्ट किया है। महात्मा श्रीकृष्णकी परम भक्तिसे वे सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ १३ ॥ ऐश्वर्यं यादृशं तस्य जगद्योनेर्महात्मनः । तदयं दृष्टवान् साक्षात् पुत्रार्थे हरिरच्युतः ॥ १४ ॥ जगत्के कारणभूत परमात्मा शिवका ऐश्वर्य जैसा है, उसे पुत्रके लिये तपस्या करते हुए इन अच्युत श्रीहरिने प्रत्यक्ष देखा है ॥ १४ ॥
यस्मात् परतरं चैव नान्यं पश्यामि भारत । व्याख्यातुं देवदेवस्य शक्तो नामान्यशेषतः ॥ १५ ॥ भारत! उसी ऐश्वर्यके कारण मैं परात्पर श्रीकृष्णके सिवा किसी दूसरेको ऐसा नहीं देखता जो देवाधिदेव महादेवजीके नामोंकी पूर्णरूपसे व्याख्या कर सके ॥ १५ ॥
एष शक्तो महाबाहुर्वक्तुं भगवतो गुणान् । विभूतिं चैव कार्त्स्न्येन सत्यां माहेश्वरीं नृप ॥ १६ ॥ नरेश्वर! ये महाबाहु श्रीकृष्ण ही भगवान् महेश्वरके गुणों तथा उनके यथार्थ ऐश्वर्यका पूर्णतः वर्णन करनेमें समर्थ हैं ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तदा भीष्मो वासुदेवं महायशाः । भवमाहात्म्यसंयुक्तमिदमाह पितामहः ॥ १७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! महायशस्वी पितामह भीष्मने युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर भगवान् वासुदेवके प्रति शंकरजीकी महिमासे युक्त यह बात कही ॥ १७ ॥
भीष्म उवाच
सुरासुरगुरो देव विष्णो त्वं वक्तुमर्हसि । शिवाय विश्वरूपाय यन्मां पृच्छद् युधिष्ठिरः ॥ १८ ॥ भीष्मजी बोले— देवासुरगुरो! विष्णुदेव! राजा युधिष्ठिरने मुझसे जो पूछा है, उस विश्वरूप शिवके माहात्म्यको बतानेके योग्य आप ही हैं ॥ १८ ॥
नाम्नां सहस्रं देवस्य तण्डिना ब्रह्मयोनिना । निवेदितं ब्रह्मलोके ब्रह्मणो यत् पुराभवत् ॥ १९ ॥ द्वैपायनप्रभृतयस्तथा चेमे तपोधनाः । ऋषयः सुव्रता दान्ताः शृण्वन्तु गदतस्तव ॥ २० ॥ पूर्वकालमें ब्रह्मपुत्र तण्डीमुनिके द्वारा ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके समक्ष जिस शिव-सहस्रनामका निरूपण किया गया था, उसीका आप वर्णन करें और ये उत्तम व्रतका पालन करनेवाले व्यास आदि तपोधन एवं जितेन्द्रिय महर्षि आपके मुखसे इसका श्रवण करें ॥
ध्रुवाय नन्दिने होत्रे गोप्त्रे विश्वसृजेऽग्नये । महाभाग्यं विभोर्ब्रूहि मुण्डिनेऽथ कपर्दिने ॥ २१ ॥ जो ध्रुव (कूटस्थ), नन्दी (आनन्दमय), होता, गोप्ता (रक्षक), विश्वस्रष्टा, गार्हपत्य आदि अग्नि, मुण्डी (चूड़ारहित) और कपर्दी (जटाजूटधारी) हैं, उन भगवान् शंकरके महान् सौभाग्यका आप वर्णन कीजिये ॥
वासुदेव उवाच
न गतिः कर्मणां शक्या वेत्तुमीशस्य तत्त्वतः । हिरण्यगर्भप्रमुखा देवाः सेन्द्रा महर्षयः ॥ २२ ॥ न विदुर्यस्य भवनमादित्याः सूक्ष्मदर्शिनः । स कथं नरमात्रेण शक्यो ज्ञातुं सतां गतिः ॥ २३ ॥ **भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**भगवान् शंकरके कर्मोंकी गतिका यथार्थरूपसे ज्ञान होना अशक्य है। ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवता, महर्षि तथा सूक्ष्मदर्शी आदित्य भी जिनके निवासस्थानको नहीं जानते, सत्पुरुषोंके आश्रयभूत उन भगवान् शिवके तत्त्वका ज्ञान मनुष्यमात्रको कैसे हो सकता है? ॥ २२-२३ ॥ तस्याहमसुरघ्नस्य कांश्चिद् भगवतो गुणान् । भवतां कीर्तयिष्यामि व्रतेशाय यथातथम् ॥ २४ ॥ अतः मैं उन असुरविनाशक व्रतेश्वर भगवान् शंकरके कुछ गुणोंका आपलोगोंके समक्ष यथार्थरूपसे वर्णन करूँगा ॥ २४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु भगवान् गुणांस्तस्य महात्मनः । उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा कथयामास धीमतः ॥ २५ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण आचमन करके पवित्र हो बुद्धिमान् परमात्मा शिवके गुणोंका वर्णन करने लगे ॥ २५ ॥
वासुदेव उवाच
शुश्रूषध्वं ब्राह्मणेन्द्रास्त्वं च तात युधिष्ठिर । त्वं चापगेय नामानि शृणुष्वेह कपर्दिने ॥ २६ ॥ **भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**यहाँ बैठे हुए ब्राह्मण-शिरोमणियो! सुनो, तात युधिष्ठिर! और गंगानन्दन भीष्म! आपलोग भी यहाँ भगवान् शंकरके नामोंका श्रवण करें ॥ २६ ॥ यदवाप्तं च मे पूर्वं साम्बहेतोः सुदुष्करम् । यथावद् भगवान् दृष्टो मया पूर्वं समाधिना ॥ २७ ॥ पूर्वकालमें साम्बकी उत्पत्तिके लिये अत्यन्त दुष्कर तप करके मैंने जिस दुर्लभ नामसमूहका ज्ञान प्राप्त किया था और समाधिके द्वारा भगवान् शंकरका जिस प्रकार यथावत्रूपसे साक्षात्कार किया था, वह सब प्रसंग सुना रहा हूँ ॥ २७ ॥ शम्बरे निहते पूर्वं रौक्मिणेयेन धीमता । अतीते द्वादशे वर्षे जाम्बवत्यब्रवीद्धि माम् ॥ २८ ॥ प्रद्युम्नचारुदेष्णादीन् रुक्मिण्या वीक्ष्य पुत्रकान् । पुत्रार्थिनी मामुपेत्य वाक्यमाह युधिष्ठिर ॥ २९ ॥
युधिष्ठिर! बुद्धिमान् रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नके द्वारा पूर्वकालमें जब शम्बरासुर मारा गया और वे द्वारकामें आये, तबसे बारह वर्ष व्यतीत होनेके पश्चात् रुक्मिणीके प्रद्युम्न, चारुदेष्ण आदि पुत्रोंको देखकर पुत्रकी इच्छा रखनेवाली जाम्बवती मेरे पास आकर इस प्रकार बोली— ॥ २८-२९ ॥
शूरं बलवतां श्रेष्ठं कान्तरूपमकल्मषम् ।
आत्मतुल्यं मम सुतं प्रयच्छाच्युत माचिरम् ॥ ३० ॥
‘अच्युत! आप मुझे अपने ही समान शूरवीर, बलवानोंमें श्रेष्ठ तथा कमनीय रूप-सौन्दर्यसे युक्त निष्पाप पुत्र प्रदान कीजिये। इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये ॥ ३० ॥
न हि तेऽप्राप्यमस्तीह त्रिषु लोकेषु किंचन ।
लोकान् सृजेस्त्वमपरानिच्छन् यदुकुलोद्वह ॥ ३१ ॥
‘यदुकुलधुरन्धर! आपके लिये तीनों लोकोंमें कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं है। आप चाहें तो दूसरे-दूसरे लोकोंकी सृष्टि कर सकते हैं ॥ ३१ ॥
त्वया द्वादशवर्षाणि व्रतीभूतेन शुष्यता ।
आराध्य पशुभर्तारं रुक्मिण्यां जनिताः सुताः ॥ ३२ ॥
‘आपने बारह वर्षोंतक व्रतपरायण हो अपने शरीरको सुखाकर भगवान् पशुपतिकी आराधना की और रुक्मिणीदेवीके गर्भसे अनेक पुत्र उत्पन्न किये ॥ ३२ ॥
चारुदेष्णः सुचारुश्च चारुवेशो यशोधरः ।
चारुश्रवाश्चारुयशाः प्रद्युम्नः शम्भुरेव च ॥ ३३ ॥
यथा ते जनिताः पुत्रा रुक्मिण्यां चारुविक्रमाः ।
तथा ममापि तनयं प्रयच्छ मधुसूदन ॥ ३४ ॥
‘मधुसूदन! चारुदेष्ण, सुचारु, चारुवेश, यशोधर, चारुश्रवा, चारुयशा, प्रद्युम्न और शम्भु—इन सुन्दर पराक्रमी पुत्रोंको जिस प्रकार आपने रुक्मिणीदेवीके गर्भसे उत्पन्न किया है उसी प्रकार मुझे भी पुत्र प्रदान कीजिये’ ॥ ३३-३४ ॥
इत्येवं चोदितो देव्या तामवोचं सुमध्यमाम् ।
अनुजानीहि मां राज्ञि करिष्ये वचनं तव ॥ ३५ ॥
देवी जाम्बवतीके इस प्रकार प्रेरणा देनेपर मैंने उस सुन्दरीसे कहा—‘रानी! मुझे जानेकी अनुमति दो। मैं तुम्हारी प्रार्थना सफल करूँगा’ ॥ ३५ ॥
सा च मामब्रवीद् गच्छ शिवाय विजयाय च ।
ब्रह्मा शिवः काश्यपश्च नद्यो देवा मनोऽनुगाः ॥ ३६ ॥
क्षेत्रौषध्यो यज्ञवाहाश्छन्दांस्यृषिगणाध्वराः ।
समुद्रा दक्षिणास्तोभा ऋक्षाणि पितरो ग्रहाः ॥ ३७ ॥
देवपत्न्यो देवकन्या देवमातर एव च ।
मन्वन्तराणि गावश्च चन्द्रमाः सविता हरिः ॥ ३८ ॥
सावित्री ब्रह्मविद्या च ऋतवो वत्सरास्तथा । क्षणा लवा मुहूर्ताश्च निमेषा युगपर्ययाः ॥ ३९ ॥ रक्षन्तु सर्वत्र गतं त्वां यादव सुखाय च । अरिष्टं गच्छ पन्थानमप्रमत्तो भवानघ ॥ ४० ॥ उसने कहा—‘प्राणनाथ! आप कल्याण और विजय पानेके लिये जाइये। यदुनन्दन! ब्रह्मा, शिव, काश्यप, नदियाँ, मनोऽनुकूल देवगण, क्षेत्र, ओषधियाँ, यज्ञवाह (मन्त्र), छन्द, ऋषिगण, यज्ञ, समुद्र, दक्षिणा, स्तोभ (सामगानपूरक ‘हावु’ ‘हायि’ आदि शब्द), नक्षत्र, पितर, ग्रह, देवपत्नियाँ, देवकन्याएँ और देवमाताएँ, मन्वन्तर, गौ, चन्द्रमा, सूर्य, इन्द्र, सावित्री, ब्रह्मविद्या, ऋतु, वर्ष, क्षण, लव, मुहूर्त, निमेष और युग—ये सर्वत्र आपकी रक्षा करें। आप अपने मार्गपर निर्विघ्न यात्रा करें और अनघ! आप सतत सावधान रहें’ ॥ ३६—४० ॥
एवं कृतस्वस्त्ययनस्तयाहं ततोऽभ्यनुज्ञाय नरेन्द्रपुत्रीम् । पितुः समीपं नरसत्तमस्य मातुश्च राज्ञश्च तथाऽऽहुकस्य ॥ ४१ ॥ गत्वा समावेद्य यदब्रवीन्मां विद्याधरेन्द्रस्य सुता भृशार्ता । तानभ्यनुज्ञाय तदातिदुःखाद् गदं तथैवातिबलं च रामम् । अथोचतुः प्रीतियुतौ तदानीं तपःसमृद्धिर्भवतोऽस्त्वविघ्नम् ॥ ४२ ॥ इस तरह जाम्बवतीके द्वारा स्वस्तिवाचनके पश्चात् मैं उस राजकुमारीकी अनुमति ले नरश्रेष्ठ पिता वसुदेव, माता देवकी तथा राजा उग्रसेनके समीप गया। वहाँ जाकर विद्याधरराजकुमारी जाम्बवतीने अत्यन्त आर्त होकर मुझसे जो प्रार्थना की थी वह सब मैंने बताया और उन सबसे तपके लिये जानेकी आज्ञा ली। गद और अत्यन्त बलवान् बलरामजीसे विदा माँगी। उन दोनोंने बड़े दुःखसे अत्यन्त प्रेमपूर्वक उस समय मुझसे कहा—‘भाई! तुम्हारी तपस्या निर्विघ्न पूर्ण हो’ ॥ ४१-४२ ॥
प्राप्यानुज्ञां गुरुजनादहं तार्क्ष्यमचिन्तयम् । सोऽवहद्धिमवन्तं मां प्राप्य चैनं व्यसर्जयम् ॥ ४३ ॥ गुरुजनोंकी आज्ञा पाकर मैंने गरुडका चिन्तन किया। उसने (आकर) मुझे हिमालयपर पहुँचा दिया। वहाँ पहुँचकर मैंने गरुडको विदा कर दिया ॥ ४३ ॥
तत्राहमद्भुतान् भावानपश्यं गिरिसत्तमे । क्षेत्रं च तपसां श्रेष्ठं पश्याम्यद्भुतमुत्तमम् ॥ ४४ ॥
मैंने उस श्रेष्ठ पर्वतपर वहाँ अद्भुत भाव देखे। मुझे वहाँका स्थान तपस्याके लिये अद्भुत, उत्तम और श्रेष्ठ क्षेत्र दिखायी दिया।। ४४ ।। दिव्यं वैयाघ्रपद्यस्य उपमन्योर्महात्मनः। पूजितं देवगन्धर्वैर्ब्राह्म्या लक्ष्म्या समावृतम् ॥ ४५ ॥ वह व्याघ्रपादके पुत्र महात्मा उपमन्युका दिव्य आश्रम था, जो ब्राह्मी शोभासे सम्पन्न तथा देवताओं और गन्धर्वोंद्वारा सम्मानित था।। ४५ ।। धवककुभकदम्बनारिकेलैः कुरबककेतकजम्बुपाटलाभिः। वटवरुणकवत्सनाभबिल्वैः सरलकपित्थप्रियालसालतालैः ॥ ४६ ॥ बदरीकुन्दपुन्नागैरशोकाम्रातिमुक्तकैः। मधूकैः कोविदारैश्च चम्पकैः पनसैस्तथा ॥ ४७ ॥ वन्यैर्बहुविधैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युतम्। पुष्पगुल्मलताकीर्णं कदलीषण्डशोभितम् ॥ ४८ ॥ धव, ककुभ (अर्जुन), कदम्ब, नारियल, कुरबक, केतक, जामुन, पाटल, बड़, वरुणक, वत्सनाभ, बिल्व, सरल, कपित्थ, प्रियाल, साल, ताल, बेर, कुन्द, पुन्नाग, अशोक, आम्र, अतिमुक्त, महुआ, कोविदार, चम्पा तथा कटहल आदि बहुत-से फल-फूल देनेवाले विविध वन्य वृक्ष उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे। फूलों, गुल्मों और लताओंसे वह व्याप्त था। केलेके कुंज उसकी शोभाको और भी बढ़ा रहे थे।। ४६-४८ ।। नानाशकुनिसम्भोज्यैः फलैर्वृक्षैरलंकृतम्। यथास्थानविनिक्षिप्तैर्भूषितं भस्मराशिभिः ॥ ४९ ॥ नाना प्रकारके पक्षियोंके खाने योग्य फल और वृक्ष उस आश्रमके अलंकार थे। यथास्थान रखी हुई भस्मराशिसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी।। ४९ ।। रुरुवानरशार्दूलसिंहद्वीपिसमाकुलम्। कुरङ्गबर्हिणाकीर्णं मार्जारभुजगावृतम्। पूगैश्च मृगजातीनां महिषर्क्षनिषेवितम् ॥ ५० ॥ रुरु, वानर, शार्दूल, सिंह, चीते, मृग, मयूर, बिल्ली, सर्प, विभिन्न जातिके मृगोंके झुंड, भैंस तथा रीछोंसे उस आश्रमका निकटवर्ती वन भरा हुआ था।। ५० ।। सकृत्प्रभिन्नैश्च गजैर्विभूषितं प्रहृष्टनानाविधपक्षिसंवितम्। सुपुष्पितैरम्बुधरप्रकाशै- र्महीरुहाणां च वनैर्विचित्रैः ॥ ५१ ॥
जिनके मस्तकसे पहली बार मदकी धारा फूटकर बही थी, ऐसे हाथी वहाँके उपवनकी शोभा बढ़ाते थे। हर्षमें भरे हुए नाना प्रकारके विहंगम वहाँके वृक्षोंपर बसेरे लेते थे। अनेकानेक वृक्षोंके विचित्र वन सुन्दर फूलोंसे सुशोभित हो मेघोंके समान प्रतीत होते थे और उन सबके द्वारा उस आश्रमकी अनुपम शोभा हो रही थी ।। ५१ ।।
नानापुष्परजोमिश्रो गजदानाधिवासितः ।
दिव्यस्त्रीगीतबहुलो मारुतोऽभिमुखो ववौ ।। ५२ ।।
सामनेसे नाना प्रकारके पुष्पोंके परागपुंजसे पूरित तथा हाथियोंके मदकी सुगन्धसे सुवासित मन्द-मन्द अनुकूल वायु आ रही थी; जिसमें दिव्य रमणियोंके मधुर गीतोंकी मनोरम ध्वनि विशेषरूपसे व्याप्त थी ।। ५२ ।।
धारानिनादैर्विहगप्रणादैः
शुभैस्तथा बृंहितैः कुञ्जराणाम् ।
गीतैस्तथा किन्नराणामुदारैः
शुभैः स्वनैः सामगानां च वीर ।। ५३ ।।
वीर! पर्वतशिखरोंसे झरते हुए झरनोंकी झर-झर ध्वनि, विहंगमोंके सुन्दर कलरव, हाथियोंकी गर्जना, किन्नरोंके उदार (मनोहर) गीत तथा सामगान करनेवाले सामवेदी विद्वानोंके मंगलमय शब्द उस वन-प्रान्तको संगीतमय बना रहे थे ।। ५३ ।।
अचिन्त्यं मनसाप्यन्यैः सरोभिः समलंकृतम् ।
विशालैश्चाग्निशरणैर्भूषितं कुसुमावृतैः ।। ५४ ।।
जिसके विषयमें दूसरे लोग मनसे सोच भी नहीं सकते, ऐसी अचिन्त्य शोभासे सम्पन्न वह पर्वतीय भाग अनेकानेक सरोवरोंसे अलंकृत तथा फूलोंसे आच्छादित विशाल अग्निशालाओंद्वारा विभूषित था ।। ५४ ।।
विभूषितं पुण्यपवित्रतोया
सदा च जुष्टं नृप जह्नुकन्यया ।
विभूषितं धर्मभृतां वरिष्ठै-
र्महात्मभिर्वह्निसमानकल्पैः ।। ५५ ।।
नरेश्वर! पुण्यसलिला जाह्नवी सदा उस क्षेत्रकी शोभा बढ़ाती हुई मानो उसका सेवन करती थीं। अग्निके समान तेजस्वी तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ अनेकानेक महात्माओंसे वह स्थान विभूषित था ।। ५५ ।।
वाय्वाहारैरम्बुपैर्जप्यनित्यैः
सम्प्रक्षालैर्योगिभिर्ध्याननित्यैः ।
धूमप्राशैरूष्मपैः क्षीरपैश्च
संजुष्टं च ब्राह्मणेन्द्रैः समन्तात् ।। ५६ ।।
वहाँ चारों ओर श्रेष्ठ ब्राह्मण निवास करते थे। उनमेंसे कुछ लोग केवल वायु पीकर रहते थे। कुछ लोग जल पीकर जीवन धारण करते थे। कुछ लोग निरन्तर जपमें संलग्न रहते थे। कुछ साधक मैत्री-मुदिता आदि साधनाओंद्वारा अपने चित्तका शोधन करते थे। कुछ योगी निरन्तर ध्यानमग्न रहते थे। कोई अग्निहोत्रका धूआँ, कोई गरम-गरम सूर्यकी किरणें और कोई दूध पीकर रहते थे ।। ५६ ।।
गोचारिणोऽथाश्मकुट्टा दन्तोलूखलिकास्तथा ।
मरीचिपाः फेनपाश्च तथैव मृगचारिणः ॥ ५७ ॥
कुछ लोग गोसेवाका व्रत लेकर गौओंके ही साथ रहते और विचरते थे। कुछ लोग खाद्य वस्तुओंको पत्थरसे पीसकर खाते थे और कुछ लोग दाँतोंसे ही ओखली-मूसलका काम लेते थे। कुछ लोग किरणों और फेनोंका पान करते थे तथा कितने ही ऋषि मृगचर्याका व्रत लेकर मृगोंके ही साथ रहते और विचरते थे ।। ५७ ।।
अश्वत्थफलभक्षाश्च तथा ह्युदकशायिनः ।
चीरचर्माम्बरधरास्तथा वल्कलधारिणः ॥ ५८ ॥
कोई पीपलके फल खाकर रहते, कोई जलमें ही सोते तथा कुछ लोग चीर, वल्कल और मृगचर्म धारण करते थे ।। ५८ ।।
सुदुःखान् नियमांस्तांस्तान् वहतः सुतपोधनान् ।
पश्यन् मुनीन् बहुविधान् प्रवेष्टुमुपचक्रमे ॥ ५९ ॥
अत्यन्त कष्टसाध्य नियमोंका निर्वाह करते हुए विविध तपस्वी मुनियोंका दर्शन करते हुए मैंने उस महान् आश्रममें प्रवेश करनेका उपक्रम किया ।। ५९ ।।
सुपूजितं देवगणैर्महात्मभिः
शिवादिभिर्भारत पुण्यकर्मभिः ।
रराज तच्चाश्रममण्डलं सदा
दिवीव राजन् शशिमण्डलं यथा ॥ ६० ॥
भरतवंशी नरेश! महात्मा तथा पुण्यकर्मा शिव आदि देवताओंसे समादृत हो वह आश्रममण्डल सदा ही आकाशमें चन्द्रमण्डलकी भाँति शोभा पाता था ।। ६० ।।
क्रीडन्ति सर्पैर्नकुला मृगैर्व्याघ्राश्च मित्रवत् ।
प्रभावाद् दीप्ततपसां सैनिकर्षान्महात्मनाम् ॥ ६१ ॥
वहाँ तीव्र तपस्यावाले महात्माओंके प्रभाव तथा सांनिध्यसे प्रभावित हो नेवले साँपोंके साथ खेलते थे और व्याघ्र मृगोंके साथ मित्रकी भाँति रहते थे ।। ६१ ।।
तत्राश्रमपदे श्रेष्ठे सर्वभूतमनोरमे ।
सेविते द्विजशार्दूलैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ॥ ६२ ॥
नानानियमविख्यातैर्ऋषिभिः सुमहात्मभिः ।
प्रविशन्नेव चापश्यं जटाचीरधरं प्रभुम् ॥ ६३ ॥
तेजसा तपसा चैव दीप्यमानं यथानलम् ।
शिष्यैरनुगतं शान्तं युवानं ब्राह्मणर्षभम् ॥ ६४ ॥
वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् श्रेष्ठ ब्राह्मण जिसका सेवन करते थे तथा नाना प्रकारके नियमोंद्वारा विख्यात हुए महात्मा महर्षि जिसकी शोभा बढ़ाते थे, समस्त प्राणियोंके लिये मनोरम उस श्रेष्ठ आश्रममें प्रवेश करते ही मैंने जटावल्कलधारी, प्रभावशाली, तेज और तपस्यासे अग्निके समान देदीप्यमान, शान्तस्वभाव और युवावस्थासे सम्पन्न ब्राह्मणशिरोमणि उपमन्युको शिष्योंसे घिरकर बैठा देखा ॥ ६२—६४ ॥
शिरसा वन्दमानं मामुपमन्युरभाषत ॥ ६५ ॥
स्वागतं पुण्डरीकाक्ष सफलानि तपांसि नः ।
यः पूज्यः पूजयसि मां द्रष्टव्यो द्रष्टुमिच्छसि ॥ ६६ ॥
मैंने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। मुझे वन्दना करते देख उपमन्यु बोले—‘पुण्डरीकाक्ष! आपका स्वागत है। आप पूजनीय होकर मेरी पूजा करते हैं और दर्शनीय होकर मेरा दर्शन चाहते हैं, इससे हमलोगोंकी तपस्या सफल हो गयी’ ॥ ६५-६६ ॥
तमहं प्राञ्जलिर्भूत्वा मृगपक्षिष्वथाग्निषु ।
धर्मे च शिष्यवर्गे च समपृच्छमनामयम् ॥ ६७ ॥
तब मैंने हाथ जोड़कर आश्रमके मृग, पक्षी, अग्निहोत्र, धर्माचरण तथा शिष्यवर्गका कुशल-समाचार पूछा ॥ ६७ ॥
ततो मां भगवानाह साम्ना परमवल्गुना ।
लप्स्यसे तनयं कृष्ण आत्मतुल्यमसंशयम् ॥ ६८ ॥
तब भगवान् उपमन्युने परम मधुर सान्त्वनापूर्ण वाणीमें मुझसे कहा—श्रीकृष्ण! आप अपने समान पुत्र प्राप्त करेंगे—इसमें संशय नहीं है ॥ ६८ ॥
तपः सुमहदास्थाय तोषयेशानमीश्वरम् ।
इह देवः सपत्नीकः समाक्रीडत्यधोक्षज ॥ ६९ ॥
अधोक्षज! आप महान् तपका आश्रय लेकर यहाँ सर्वेश्वर भगवान् शिवको संतुष्ट कीजिये। यहाँ महादेवजी अपनी पत्नी भगवती उमाके साथ क्रीड़ा करते हैं ॥ ६९ ॥
इहैनं दैवतश्रेष्ठं देवाः सर्षिगणाः पुरा ।
तपसा ब्रह्मचर्येण सत्येन च दमेन च ॥ ७० ॥
तोषयित्वा शुभान् कामान् प्राप्तवन्तो जनार्दन ।
जनार्दन! यहाँ सुरश्रेष्ठ महादेवजीको तपस्या, ब्रह्मचर्य, सत्य और इन्द्रिय-संयमद्वारा संतुष्ट करके पहले कितने ही देवता और महर्षि अपने शुभ मनोरथ प्राप्त कर चुके हैं ॥ ७० ॥
तेजसां तपसां चैव निधिः स भगवानिह ॥ ७१ ॥
शुभाशुभान्वितान् भावान् विसृजन् संक्षिपन्नपि ।
आस्ते देव्या सदाचिन्त्यो यं प्रार्थयसि शत्रुहन् ॥ ७२ ॥
शत्रुनाशक श्रीकृष्ण! आप जिनकी प्रार्थना करते हैं, वे तेज और तपस्याकी निधि अचिन्त्य भगवान् शंकर यहाँ शम आदि शुभभावोंकी सृष्टि और काम आदि अशुभ भावोंका संहार करते हुए देवी पार्वतीके साथ सदा विराजमान रहते हैं ॥ ७१-७२ ॥
हिरण्यकशिपुर्योऽभूद् दानवो मेरुकम्पनः ।
तेन सर्वामरैश्वर्यं शर्वात् प्राप्तं समाबुर्दम् ॥ ७३ ॥
पहले जो मेरुपर्वतको भी कम्पित कर देनेवाला हिरण्यकशिपु नामक दानव हुआ था, उसने भगवान् शंकरसे एक अर्बुद (दस करोड़) वर्षोंतकके लिये सम्पूर्ण देवताओंका ऐश्वर्य प्राप्त किया था ॥ ७३ ॥
तस्यैव पुत्रप्रवरो मन्दारो नाम विश्रुतः ।
महादेववराच्चक्रं वर्षाबुर्दमयोधयत् ॥ ७४ ॥
उसीका श्रेष्ठ पुत्र मन्दार नामसे विख्यात हुआ, जो महादेवजीके वरसे एक अर्बुद वर्षोंतक इन्द्रके साथ युद्ध करता रहा ॥ ७४ ॥
विष्णोश्चक्रं च तद् घोरं वज्रमाखण्डलस्य च ।
शीर्णं पुराभवत् तात ग्रहस्याङ्गेषु केशव ॥ ७५ ॥
तात केशव! भगवान् विष्णुका वह भयंकर चक्र तथा इन्द्रका वज्र भी पूर्वकालमें उस ग्रहके अंगोंपर पुराने तिनकोंके समान जीर्ण-शीर्ण-सा हो गया था ॥ ७५ ॥
यत् तद् भगवता पूर्वं दत्तं चक्रं तवानघ ।
जलान्तरचरं हत्वा दैत्यं च बलगर्वितम् ॥ ७६ ॥
उत्पादितं वृषाङ्केन दीप्तज्वलनसंनिभम् ।
दत्तं भगवता तुभ्यं दुर्धर्षं तेजसाद्भुतम् ॥ ७७ ॥
निष्पाप श्रीकृष्ण! पूर्वकालमें जलके भीतर रहनेवाले गर्वीले दैत्यको मारकर भगवान् शंकरने आपको जो चक्र प्रदान किया था, उस अग्निके समान तेजस्वी शस्त्रको स्वयं भगवान् वृषध्वजने ही उत्पन्न किया और आपको दिया था, वह अस्त्र अद्भुत तेजसे युक्त एवं दुर्धर्ष है ॥ ७६-७७ ॥
न शक्यं द्रष्टुमन्येन वर्जयित्वा पिनाकिनम् ।
सुदर्शनं भवत्येवं भवेनोक्तं तदा तु तत् ॥ ७८ ॥
सुदर्शनं तदा तस्य लोके नाम प्रतिष्ठितम् ।
तज्जीर्णमभवत् तात ग्रहस्याङ्गेषु केशव ॥ ७९ ॥
पिनाकपाणि भगवान् शंकरको छोड़कर दूसरा कोई उसको देख नहीं सकता था। उस समय भगवान् शंकरने कहा—'यह अस्त्र सुदर्शन (देखनेमें सुगम) हो जाय।' तभीसे संसारमें उसका सुदर्शन नाम प्रचलित हो गया। तात केशव! ऐसा प्रसिद्ध अस्त्र भी उस ग्रहके अंगोंपर जीर्ण-सा हो गया ॥ ७८-७९ ॥
ग्रहस्यातिबलस्याङ्गे वरदत्तस्य धीमतः । न शस्त्राणि वहन्त्यङ्गे चक्रवज्रशतान्यपि ॥ ८० ॥ भगवान् शंकरसे उसको वर मिला था। उस अत्यन्त बलशाली बुद्धिमान् ग्रहके अंगमें चक्र और वज्र-जैसे सैकड़ों शस्त्र भी काम नहीं देते थे ॥ ८० ॥ अर्द्यमानाश्च विबुधा ग्रहेण सुबलीयसा । शिवदत्तवरान् जघ्नुरसुरेन्द्रान् सुरा भृशम् ॥ ८१ ॥ जब उस बलवान् ग्रहने देवताओंको सताना आरम्भ कर दिया तब देवताओंने भी भगवान् शंकरसे वर पाये हुए उन असुरेन्द्रोंको बहुत पीटा। (इस प्रकार उनमें दीर्घकालतक युद्ध होता रहा) ॥ ८१ ॥ तुष्टो विद्युत्प्रभस्यापि त्रिलोकेश्वरतां ददौ । शतं वर्षसहस्राणां सर्वलोकेश्वरोऽभवत् ॥ ८२ ॥ इसी तरह विद्युत्प्रभ नामक दैत्यपर भी संतुष्ट होकर रुद्रदेवने उसे तीनों लोकोंका आधिपत्य प्रदान कर दिया। इस प्रकार वह एक लाख वर्षोंतक सम्पूर्ण लोकोंका अधीश्वर बना रहा ॥ ८२ ॥ ममैवानुचरो नित्यं भवितासीति चाब्रवीत् । तथा पुत्रसहस्राणामयुतं च ददौ प्रभुः ॥ ८३ ॥ भगवान्ने उसे यह भी वर दिया था कि 'तुम मेरे नित्य पार्षद हो जाओगे' साथ ही उन प्रभुने उसे सहस्र अयुत (एक करोड़) पुत्र प्रदान किये ॥ ८३ ॥ कुशद्वीपं च स ददौ राज्येन भगवानजः । तथा शतमुखो नाम धात्रा सृष्टो महासुरः ॥ ८४ ॥ येन वर्षशतं साग्रमात्ममांसैर्हुतोऽनलः । अजन्मा भगवान् शिवने उसे राज्य करनेके लिये कुशद्वीप दिया था। इसी प्रकार भगवान् ब्रह्माने एक समय शतमुख नामक महान् असुरकी सृष्टि की थी, जिसने सौ वर्षसे अधिक कालतक अग्निमें अपने ही मांसकी आहुति दी थी ॥ ८४ १/२ ॥ तं प्राह भगवांस्तुष्टः किं करोमीति शंकरः ॥ ८५ ॥ तं वै शतमुखः प्राह योगो भवतु मेऽद्भुतः । बलं च दैवतश्रेष्ठ शाश्वतं संप्रयच्छ मे ॥ ८६ ॥ उससे संतुष्ट होकर भगवान् शंकरने पूछा—'बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा मनोरथ पूर्ण करूँ?' तब शतमुखने उनसे कहा—'सुरश्रेष्ठ! मुझे अद्भुत योगशक्ति प्राप्त हो। साथ ही आप मुझे सदा बना रहनेवाला बल प्रदान कीजिये' ॥ ८५-८६ ॥ तथेति भगवानाह तस्य तद् वचनं प्रभुः । स्वायम्भुवः क्रतुश्चापि पुत्रार्थमभवत् पुरा ॥ ८७ ॥ आविश्य योगेनात्मानं त्रीणि वर्षशतान्यपि ।
तस्य चोपपदौ पुत्रान् सहस्रं क्रतुसम्मितान् ॥ ८८ ॥
उसकी वह बात सुनकर शक्तिशाली भगवान्ने ‘तथास्तु’ कहकर उसे स्वीकार कर लिया। इसी तरह पूर्वकालमें स्वयम्भूके पुत्र क्रतुने पुत्र-प्राप्तिके लिये तीन सौ वर्षोंतक योगके द्वारा अपने आपको भगवान् शिवके चिन्तनमें लगा रखा था; अतः क्रतुको भी भगवान् शंकरने उन्हींके समान एक हजार पुत्र प्रदान किये ॥ ८७-८८ ॥
योगेश्वरं देवगीतं वेत्थ कृष्ण न संशयः ।
याज्ञवल्क्य इति ख्यात ऋषिः परमधार्मिकः ॥ ८९ ॥
आराध्य स महादेवं प्राप्तवानतुलं यशः ।
श्रीकृष्ण! देवता जिनकी महिमाका गान करते हैं, उन योगेश्वर शिवको आप भलीभाँति जानते हैं, इसमें संशय नहीं है। याज्ञवल्क्य नामके विख्यात परम धर्मात्मा ऋषिने महादेवजीकी आराधना करके अनुपम यश प्राप्त किया ॥ ८९ १/२ ॥
वेदव्यासश्च योगात्मा पराशरसुतो मुनिः ॥ ९० ॥
सोऽपि शङ्करमाराध्य प्राप्तवानतुलं यशः ।
पराशरजीके पुत्र मुनिवर वेदव्यास तो योगके स्वरूप ही हैं। उन्होंने भी शंकरजीकी आराधना करके वह महान् यश पा लिया, जिसकी कहीं तुलना नहीं है ॥
बालखिल्या मघवता ह्यवज्ञाताः पुरा किल ॥ ९१ ॥
तैः क्रुद्धैर्भगवान् रुद्रस्तपसा तोषितो ह्यभूत् ।
कहते हैं, पूर्वकालमें किसी समय इन्द्रने बालखिल्य नामक ऋषियोंका अपमान कर दिया था। उन ऋषियोंने कुपित होकर तपस्या की और उसके द्वारा भगवान् रुद्रको संतुष्ट किया ॥ ९१ १/२ ॥
तांश्चापि दैवतश्रेष्ठः प्राह प्रीतो जगत्पतिः ॥ ९२ ॥
सुपर्णं सोमहर्तारं तपसोत्पादयिष्यथ ।
तब सुरश्रेष्ठ विश्वनाथ शिवने प्रसन्न होकर उनसे कहा—‘तुम अपनी तपस्याके बलसे गरुडको उत्पन्न करोगे, जो इन्द्रका अमृत छीन लायेगा’ ॥ ९२ १/२ ॥
महादेवस्य रोषाच्च आपो नष्टाः पुराभवन् ॥ ९३ ॥
ताश्च सप्तकपालेन देवैरन्याः प्रवर्तिताः ।
ततः पानीयमभवत् प्रसन्ने त्र्यम्बके भुवि ॥ ९४ ॥
पहलेकी बात है, महादेवजीके रोषसे जल नष्ट हो गया था। तब देवताओंने, जिसके स्वामी रुद्र हैं, उस सप्त कपालयागके द्वारा दूसरा जल प्राप्त किया। इस प्रकार त्रिनेत्रधारी भगवान् शिवके प्रसन्न होनेपर ही भूतलपर जलकी उपलब्धि हुई ॥ ९३-९४ ॥
अत्रेर्भार्यापि भर्तारं संत्यज्य ब्रह्मवादिनी ।
नाहं तस्य मुनेर्भूयो वशगा स्यां कथंचन ॥ ९५ ॥
इत्युक्त्वा सा महाशिवमगच्छच्छरणं किल ।
अत्रिकी पत्नी ब्रह्मवादिनी अनसूया भी किसी समय रुष्ट हो अपने पतिको त्यागकर चली गयीं और मनमें यह संकल्प करके कि ‘अब मैं किसी तरह भी पुनः अत्रिमुनिके वशीभूत नहीं होऊँगी’ महादेवजीकी शरणमें गयीं ।। ९५ १/३ ।।
निराहारा भयादत्रेस्त्रीणि वर्षशतान्यपि ।। ९६ ।।
अशेत मुसलेष्वेव प्रसादार्थं भवस्य सा ।
वे अत्रिमुनिके भयसे तीन सौ वर्षोंतक निराहार रहकर मुसलोंपर ही सोयीं और भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके लिये तपस्या करती रहीं ।। ९६ १/३ ।।
तामब्रवीद्धसन् देवो भविता वै सुतस्तव ।। ९७ ।।
विना भर्त्रा च रुद्रेण भविष्यति न संशयः ।
वंशे तवैव नाम्ना तु ख्यातिं यास्यति चेप्सिताम् ।। ९८ ।।
तब महादेवजीने उनसे हँसते हुए कहा—‘देवि! मेरी कृपासे केवल यज्ञसम्बन्धी चरुका द्रव पीनेमात्रसे तुम्हें पतिके सहयोगके बिना ही एक पुत्र प्राप्त होगा—इसमें संशय नहीं है। वह तुम्हारे वंशमें तुम्हारे ही नामसे इच्छानुसार ख्याति प्राप्त करेगा’ ।। ९७-९८ ।।
विकर्णश्च महादेवं तथा भक्तसुखावहम् ।
प्रसाद्य भगवान् सिद्धिं प्राप्तवान् मधुसूदन ।। ९९ ।।
मधुसूदन! ऐश्वर्यशाली विकर्णने भक्तसुखदायक महादेवजीको प्रसन्न करके मनोवांछित सिद्धि प्राप्त की थी ।। ९९ ।।
शाकल्यः संशितात्मा वै नववर्षशतान्यपि ।
आराधयामास भवं मनोयज्ञेन केशव ।। १०० ।।
केशव! शाकल्य ऋषिके मनमें सदा संशय बना रहता था। उन्होंने मनोमय यज्ञ (ध्यान)-के द्वारा भगवान् शिवकी नौ सौ वर्षोंतक आराधना की ।। १०० ।।
तं चाह भगवांस्तुष्टो ग्रन्थकारो भविष्यसि ।
वत्साक्षया च ते कीर्तिस्त्रैलोक्ये वै भविष्यति ।। १०१ ।।
तब उनसे भी संतुष्ट होकर भगवान् शंकरने कहा—‘वत्स! तुम ग्रन्थकार होओगे तथा तीनों लोकोंमें तुम्हारी अक्षय कीर्ति फैल जायगी ।। १०१ ।।
अक्षयं च कुलं तेऽस्तु महर्षिभिरलंकृतम् ।
भविष्यति द्विजश्रेष्ठः सूत्रकर्ता सुतस्तव ।। १०२ ।।
‘तुम्हारा कुल अक्षय एवं महर्षियोंसे अलंकृत होगा। तुम्हारा पुत्र एक श्रेष्ठ ब्राह्मण एवं सूत्रकार होगा’ ।। १०२ ।।
सावर्णिborder सावर्णिश्चापि विख्यात ऋषिरासीत् कृते युगे ।
इह तेन तपस्तप्तं षष्टिवर्षशतान्यथ ।। १०३ ।।
सत्ययुगमें सावर्णिनामसे विख्यात एक ऋषि थे। उन्होंने यहाँ आकर छः हजार वर्षोंतक तपस्या की ।। १०३ ।।
तमाह भगवान् रुद्रः साक्षात् तुष्टोऽस्मि तेऽनघ ।
ग्रन्थकृल्लोकविख्यातो भवितास्यजरामरः ॥ १०४ ॥
तब भगवान् रुद्रने उन्हें साक्षात् दर्शन देकर कहा—'अनघ! मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ। तुम विश्वविख्यात ग्रन्थकार और अजर-अमर होओगे' ॥ १०४ ॥
शक्रेण तु पुरा देवो वाराणस्यां जनार्दन ।
आराधितोऽभूद् भक्तेन दिग्वासा भस्मगुण्ठितः ॥ १०५ ॥
आराध्य स महादेवं देवराजमवाप्तवान् ।
जनार्दन! पहलेकी बात है, इन्द्रने भक्तिभावके साथ काशीपुरीमें भस्मभूषित दिगम्बर महादेवजीकी आराधना की। महादेवजीकी आराधना करके ही उन्होंने देवराजपद प्राप्त किया ॥ १०५ १/२ ॥
नारदेन तु भक्त्यासौ भव आराधितः पुरा ॥ १०६ ॥
तस्य तुष्टो महादेवो जगौ देवगुरुर्गुरुः ।
तेजसा तपसा कीर्त्या त्वत्समो न भविष्यति ॥ १०७ ॥
गीतेन वादित्व्येन नित्यं मामनुयास्यसि ।
देवर्षि नारदने भी पहले भक्तिभावसे भगवान् शंकरकी आराधना की थी। इससे संतुष्ट होकर गुरुस्वरूप देवगुरु महादेवजीने उन्हें यह वरदान दिया कि 'तेज, तप और कीर्तिमें कोई तुम्हारी समता करनेवाला नहीं होगा। तुम गीत और वीणावादनके द्वारा सदा मेरा अनुसरण करोगे' ॥ १०६-१०७ १/२ ॥
मयापि च यथा दृष्टो देवदेवः पुरा विभो ॥ १०८ ॥
साक्षात् पशुपतिस्तात तच्चापि शृणु माधव ।
प्रभो! तात माधव! मैंने भी पूर्वकालमें साक्षात् देवाधिदेव पशुपतिका जिस प्रकार दर्शन किया था, वह प्रसंग सुनिये ॥ १०८ १/२ ॥
यदर्थं च मया देवः प्रयत्नेन तथा विभो ॥ १०९ ॥
प्रबोधितो महातेजास्तं चापि शृणु विस्तरम् ।
भगवन्! मैंने जिस उद्देश्यसे प्रयत्नपूर्वक महातेजस्वी महादेवजीको संतुष्ट किया था, वह सब विस्सारपूर्वक सुनिये ॥ १०९ १/२ ॥
यदवाप्तं च मे पूर्वं देवदेवान्महेश्वरात् ॥ ११० ॥
तत् सर्वं निखिलेनाद्य कथयिष्यामि तेऽनघ ।
अनघ! पूर्वकालमें मुझे देवाधिदेव महेश्वरसे जो कुछ प्राप्त हुआ था, वह सब आज पूर्णरूपसे तुम्हें बताऊँगा ॥ ११० १/२ ॥
पुरा कृतयुगे तात ऋषिरासीन्महायशाः ॥ १११ ॥
व्याघ्रपाद इति खातो वेदवेदाङ्गपारगः ।