महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतमाह भगवान् रुद्रः साक्षात् तुष्टोऽस्मि तेऽनघ ।
ग्रन्थकृल्लोकविख्यातो भवितास्यजरामरः ॥ १०४ ॥
तब भगवान् रुद्रने उन्हें साक्षात् दर्शन देकर कहा—'अनघ! मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ। तुम विश्वविख्यात ग्रन्थकार और अजर-अमर होओगे' ॥ १०४ ॥
शक्रेण तु पुरा देवो वाराणस्यां जनार्दन ।
आराधितोऽभूद् भक्तेन दिग्वासा भस्मगुण्ठितः ॥ १०५ ॥
आराध्य स महादेवं देवराजमवाप्तवान् ।
जनार्दन! पहलेकी बात है, इन्द्रने भक्तिभावके साथ काशीपुरीमें भस्मभूषित दिगम्बर महादेवजीकी आराधना की। महादेवजीकी आराधना करके ही उन्होंने देवराजपद प्राप्त किया ॥ १०५ १/२ ॥
नारदेन तु भक्त्यासौ भव आराधितः पुरा ॥ १०६ ॥
तस्य तुष्टो महादेवो जगौ देवगुरुर्गुरुः ।
तेजसा तपसा कीर्त्या त्वत्समो न भविष्यति ॥ १०७ ॥
गीतेन वादित्व्येन नित्यं मामनुयास्यसि ।
देवर्षि नारदने भी पहले भक्तिभावसे भगवान् शंकरकी आराधना की थी। इससे संतुष्ट होकर गुरुस्वरूप देवगुरु महादेवजीने उन्हें यह वरदान दिया कि 'तेज, तप और कीर्तिमें कोई तुम्हारी समता करनेवाला नहीं होगा। तुम गीत और वीणावादनके द्वारा सदा मेरा अनुसरण करोगे' ॥ १०६-१०७ १/२ ॥
मयापि च यथा दृष्टो देवदेवः पुरा विभो ॥ १०८ ॥
साक्षात् पशुपतिस्तात तच्चापि शृणु माधव ।
प्रभो! तात माधव! मैंने भी पूर्वकालमें साक्षात् देवाधिदेव पशुपतिका जिस प्रकार दर्शन किया था, वह प्रसंग सुनिये ॥ १०८ १/२ ॥
यदर्थं च मया देवः प्रयत्नेन तथा विभो ॥ १०९ ॥
प्रबोधितो महातेजास्तं चापि शृणु विस्तरम् ।
भगवन्! मैंने जिस उद्देश्यसे प्रयत्नपूर्वक महातेजस्वी महादेवजीको संतुष्ट किया था, वह सब विस्सारपूर्वक सुनिये ॥ १०९ १/२ ॥
यदवाप्तं च मे पूर्वं देवदेवान्महेश्वरात् ॥ ११० ॥
तत् सर्वं निखिलेनाद्य कथयिष्यामि तेऽनघ ।
अनघ! पूर्वकालमें मुझे देवाधिदेव महेश्वरसे जो कुछ प्राप्त हुआ था, वह सब आज पूर्णरूपसे तुम्हें बताऊँगा ॥ ११० १/२ ॥
पुरा कृतयुगे तात ऋषिरासीन्महायशाः ॥ १११ ॥
व्याघ्रपाद इति खातो वेदवेदाङ्गपारगः ।