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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 177

अत्रिकी पत्नी ब्रह्मवादिनी अनसूया भी किसी समय रुष्ट हो अपने पतिको त्यागकर चली गयीं और मनमें यह संकल्प करके कि ‘अब मैं किसी तरह भी पुनः अत्रिमुनिके वशीभूत नहीं होऊँगी’ महादेवजीकी शरणमें गयीं ।। ९५ १/३ ।।

निराहारा भयादत्रेस्त्रीणि वर्षशतान्यपि ।। ९६ ।।
अशेत मुसलेष्वेव प्रसादार्थं भवस्य सा ।
वे अत्रिमुनिके भयसे तीन सौ वर्षोंतक निराहार रहकर मुसलोंपर ही सोयीं और भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके लिये तपस्या करती रहीं ।। ९६ १/३ ।।

तामब्रवीद्धसन् देवो भविता वै सुतस्तव ।। ९७ ।।
विना भर्त्रा च रुद्रेण भविष्यति न संशयः ।
वंशे तवैव नाम्ना तु ख्यातिं यास्यति चेप्सिताम् ।। ९८ ।।
तब महादेवजीने उनसे हँसते हुए कहा—‘देवि! मेरी कृपासे केवल यज्ञसम्बन्धी चरुका द्रव पीनेमात्रसे तुम्हें पतिके सहयोगके बिना ही एक पुत्र प्राप्त होगा—इसमें संशय नहीं है। वह तुम्हारे वंशमें तुम्हारे ही नामसे इच्छानुसार ख्याति प्राप्त करेगा’ ।। ९७-९८ ।।

विकर्णश्च महादेवं तथा भक्तसुखावहम् ।
प्रसाद्य भगवान् सिद्धिं प्राप्तवान् मधुसूदन ।। ९९ ।।
मधुसूदन! ऐश्वर्यशाली विकर्णने भक्तसुखदायक महादेवजीको प्रसन्न करके मनोवांछित सिद्धि प्राप्त की थी ।। ९९ ।।

शाकल्यः संशितात्मा वै नववर्षशतान्यपि ।
आराधयामास भवं मनोयज्ञेन केशव ।। १०० ।।
केशव! शाकल्य ऋषिके मनमें सदा संशय बना रहता था। उन्होंने मनोमय यज्ञ (ध्यान)-के द्वारा भगवान् शिवकी नौ सौ वर्षोंतक आराधना की ।। १०० ।।

तं चाह भगवांस्तुष्टो ग्रन्थकारो भविष्यसि ।
वत्साक्षया च ते कीर्तिस्त्रैलोक्ये वै भविष्यति ।। १०१ ।।
तब उनसे भी संतुष्ट होकर भगवान् शंकरने कहा—‘वत्स! तुम ग्रन्थकार होओगे तथा तीनों लोकोंमें तुम्हारी अक्षय कीर्ति फैल जायगी ।। १०१ ।।

अक्षयं च कुलं तेऽस्तु महर्षिभिरलंकृतम् ।
भविष्यति द्विजश्रेष्ठः सूत्रकर्ता सुतस्तव ।। १०२ ।।
‘तुम्हारा कुल अक्षय एवं महर्षियोंसे अलंकृत होगा। तुम्हारा पुत्र एक श्रेष्ठ ब्राह्मण एवं सूत्रकार होगा’ ।। १०२ ।।

सावर्णिborder सावर्णिश्चापि विख्यात ऋषिरासीत् कृते युगे ।
इह तेन तपस्तप्तं षष्टिवर्षशतान्यथ ।। १०३ ।।
सत्ययुगमें सावर्णिनामसे विख्यात एक ऋषि थे। उन्होंने यहाँ आकर छः हजार वर्षोंतक तपस्या की ।। १०३ ।।