महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतस्य चोपपदौ पुत्रान् सहस्रं क्रतुसम्मितान् ॥ ८८ ॥
उसकी वह बात सुनकर शक्तिशाली भगवान्ने ‘तथास्तु’ कहकर उसे स्वीकार कर लिया। इसी तरह पूर्वकालमें स्वयम्भूके पुत्र क्रतुने पुत्र-प्राप्तिके लिये तीन सौ वर्षोंतक योगके द्वारा अपने आपको भगवान् शिवके चिन्तनमें लगा रखा था; अतः क्रतुको भी भगवान् शंकरने उन्हींके समान एक हजार पुत्र प्रदान किये ॥ ८७-८८ ॥
योगेश्वरं देवगीतं वेत्थ कृष्ण न संशयः ।
याज्ञवल्क्य इति ख्यात ऋषिः परमधार्मिकः ॥ ८९ ॥
आराध्य स महादेवं प्राप्तवानतुलं यशः ।
श्रीकृष्ण! देवता जिनकी महिमाका गान करते हैं, उन योगेश्वर शिवको आप भलीभाँति जानते हैं, इसमें संशय नहीं है। याज्ञवल्क्य नामके विख्यात परम धर्मात्मा ऋषिने महादेवजीकी आराधना करके अनुपम यश प्राप्त किया ॥ ८९ १/२ ॥
वेदव्यासश्च योगात्मा पराशरसुतो मुनिः ॥ ९० ॥
सोऽपि शङ्करमाराध्य प्राप्तवानतुलं यशः ।
पराशरजीके पुत्र मुनिवर वेदव्यास तो योगके स्वरूप ही हैं। उन्होंने भी शंकरजीकी आराधना करके वह महान् यश पा लिया, जिसकी कहीं तुलना नहीं है ॥
बालखिल्या मघवता ह्यवज्ञाताः पुरा किल ॥ ९१ ॥
तैः क्रुद्धैर्भगवान् रुद्रस्तपसा तोषितो ह्यभूत् ।
कहते हैं, पूर्वकालमें किसी समय इन्द्रने बालखिल्य नामक ऋषियोंका अपमान कर दिया था। उन ऋषियोंने कुपित होकर तपस्या की और उसके द्वारा भगवान् रुद्रको संतुष्ट किया ॥ ९१ १/२ ॥
तांश्चापि दैवतश्रेष्ठः प्राह प्रीतो जगत्पतिः ॥ ९२ ॥
सुपर्णं सोमहर्तारं तपसोत्पादयिष्यथ ।
तब सुरश्रेष्ठ विश्वनाथ शिवने प्रसन्न होकर उनसे कहा—‘तुम अपनी तपस्याके बलसे गरुडको उत्पन्न करोगे, जो इन्द्रका अमृत छीन लायेगा’ ॥ ९२ १/२ ॥
महादेवस्य रोषाच्च आपो नष्टाः पुराभवन् ॥ ९३ ॥
ताश्च सप्तकपालेन देवैरन्याः प्रवर्तिताः ।
ततः पानीयमभवत् प्रसन्ने त्र्यम्बके भुवि ॥ ९४ ॥
पहलेकी बात है, महादेवजीके रोषसे जल नष्ट हो गया था। तब देवताओंने, जिसके स्वामी रुद्र हैं, उस सप्त कपालयागके द्वारा दूसरा जल प्राप्त किया। इस प्रकार त्रिनेत्रधारी भगवान् शिवके प्रसन्न होनेपर ही भूतलपर जलकी उपलब्धि हुई ॥ ९३-९४ ॥
अत्रेर्भार्यापि भर्तारं संत्यज्य ब्रह्मवादिनी ।
नाहं तस्य मुनेर्भूयो वशगा स्यां कथंचन ॥ ९५ ॥
इत्युक्त्वा सा महाशिवमगच्छच्छरणं किल ।