भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 175

ग्रहस्यातिबलस्याङ्गे वरदत्तस्य धीमतः । न शस्त्राणि वहन्त्यङ्गे चक्रवज्रशतान्यपि ॥ ८० ॥ भगवान् शंकरसे उसको वर मिला था। उस अत्यन्त बलशाली बुद्धिमान् ग्रहके अंगमें चक्र और वज्र-जैसे सैकड़ों शस्त्र भी काम नहीं देते थे ॥ ८० ॥ अर्द्यमानाश्च विबुधा ग्रहेण सुबलीयसा । शिवदत्तवरान् जघ्नुरसुरेन्द्रान् सुरा भृशम् ॥ ८१ ॥ जब उस बलवान् ग्रहने देवताओंको सताना आरम्भ कर दिया तब देवताओंने भी भगवान् शंकरसे वर पाये हुए उन असुरेन्द्रोंको बहुत पीटा। (इस प्रकार उनमें दीर्घकालतक युद्ध होता रहा) ॥ ८१ ॥ तुष्टो विद्युत्प्रभस्यापि त्रिलोकेश्वरतां ददौ । शतं वर्षसहस्राणां सर्वलोकेश्वरोऽभवत् ॥ ८२ ॥ इसी तरह विद्युत्प्रभ नामक दैत्यपर भी संतुष्ट होकर रुद्रदेवने उसे तीनों लोकोंका आधिपत्य प्रदान कर दिया। इस प्रकार वह एक लाख वर्षोंतक सम्पूर्ण लोकोंका अधीश्वर बना रहा ॥ ८२ ॥ ममैवानुचरो नित्यं भवितासीति चाब्रवीत् । तथा पुत्रसहस्राणामयुतं च ददौ प्रभुः ॥ ८३ ॥ भगवान्ने उसे यह भी वर दिया था कि 'तुम मेरे नित्य पार्षद हो जाओगे' साथ ही उन प्रभुने उसे सहस्र अयुत (एक करोड़) पुत्र प्रदान किये ॥ ८३ ॥ कुशद्वीपं च स ददौ राज्येन भगवानजः । तथा शतमुखो नाम धात्रा सृष्टो महासुरः ॥ ८४ ॥ येन वर्षशतं साग्रमात्ममांसैर्हुतोऽनलः । अजन्मा भगवान् शिवने उसे राज्य करनेके लिये कुशद्वीप दिया था। इसी प्रकार भगवान् ब्रह्माने एक समय शतमुख नामक महान् असुरकी सृष्टि की थी, जिसने सौ वर्षसे अधिक कालतक अग्निमें अपने ही मांसकी आहुति दी थी ॥ ८४ १/२ ॥ तं प्राह भगवांस्तुष्टः किं करोमीति शंकरः ॥ ८५ ॥ तं वै शतमुखः प्राह योगो भवतु मेऽद्भुतः । बलं च दैवतश्रेष्ठ शाश्वतं संप्रयच्छ मे ॥ ८६ ॥ उससे संतुष्ट होकर भगवान् शंकरने पूछा—'बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा मनोरथ पूर्ण करूँ?' तब शतमुखने उनसे कहा—'सुरश्रेष्ठ! मुझे अद्भुत योगशक्ति प्राप्त हो। साथ ही आप मुझे सदा बना रहनेवाला बल प्रदान कीजिये' ॥ ८५-८६ ॥ तथेति भगवानाह तस्य तद् वचनं प्रभुः । स्वायम्भुवः क्रतुश्चापि पुत्रार्थमभवत् पुरा ॥ ८७ ॥ आविश्य योगेनात्मानं त्रीणि वर्षशतान्यपि ।