महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
ग्रहस्यातिबलस्याङ्गे वरदत्तस्य धीमतः । न शस्त्राणि वहन्त्यङ्गे चक्रवज्रशतान्यपि ॥ ८० ॥ भगवान् शंकरसे उसको वर मिला था। उस अत्यन्त बलशाली बुद्धिमान् ग्रहके अंगमें चक्र और वज्र-जैसे सैकड़ों शस्त्र भी काम नहीं देते थे ॥ ८० ॥ अर्द्यमानाश्च विबुधा ग्रहेण सुबलीयसा । शिवदत्तवरान् जघ्नुरसुरेन्द्रान् सुरा भृशम् ॥ ८१ ॥ जब उस बलवान् ग्रहने देवताओंको सताना आरम्भ कर दिया तब देवताओंने भी भगवान् शंकरसे वर पाये हुए उन असुरेन्द्रोंको बहुत पीटा। (इस प्रकार उनमें दीर्घकालतक युद्ध होता रहा) ॥ ८१ ॥ तुष्टो विद्युत्प्रभस्यापि त्रिलोकेश्वरतां ददौ । शतं वर्षसहस्राणां सर्वलोकेश्वरोऽभवत् ॥ ८२ ॥ इसी तरह विद्युत्प्रभ नामक दैत्यपर भी संतुष्ट होकर रुद्रदेवने उसे तीनों लोकोंका आधिपत्य प्रदान कर दिया। इस प्रकार वह एक लाख वर्षोंतक सम्पूर्ण लोकोंका अधीश्वर बना रहा ॥ ८२ ॥ ममैवानुचरो नित्यं भवितासीति चाब्रवीत् । तथा पुत्रसहस्राणामयुतं च ददौ प्रभुः ॥ ८३ ॥ भगवान्ने उसे यह भी वर दिया था कि 'तुम मेरे नित्य पार्षद हो जाओगे' साथ ही उन प्रभुने उसे सहस्र अयुत (एक करोड़) पुत्र प्रदान किये ॥ ८३ ॥ कुशद्वीपं च स ददौ राज्येन भगवानजः । तथा शतमुखो नाम धात्रा सृष्टो महासुरः ॥ ८४ ॥ येन वर्षशतं साग्रमात्ममांसैर्हुतोऽनलः । अजन्मा भगवान् शिवने उसे राज्य करनेके लिये कुशद्वीप दिया था। इसी प्रकार भगवान् ब्रह्माने एक समय शतमुख नामक महान् असुरकी सृष्टि की थी, जिसने सौ वर्षसे अधिक कालतक अग्निमें अपने ही मांसकी आहुति दी थी ॥ ८४ १/२ ॥ तं प्राह भगवांस्तुष्टः किं करोमीति शंकरः ॥ ८५ ॥ तं वै शतमुखः प्राह योगो भवतु मेऽद्भुतः । बलं च दैवतश्रेष्ठ शाश्वतं संप्रयच्छ मे ॥ ८६ ॥ उससे संतुष्ट होकर भगवान् शंकरने पूछा—'बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा मनोरथ पूर्ण करूँ?' तब शतमुखने उनसे कहा—'सुरश्रेष्ठ! मुझे अद्भुत योगशक्ति प्राप्त हो। साथ ही आप मुझे सदा बना रहनेवाला बल प्रदान कीजिये' ॥ ८५-८६ ॥ तथेति भगवानाह तस्य तद् वचनं प्रभुः । स्वायम्भुवः क्रतुश्चापि पुत्रार्थमभवत् पुरा ॥ ८७ ॥ आविश्य योगेनात्मानं त्रीणि वर्षशतान्यपि ।
तस्य चोपपदौ पुत्रान् सहस्रं क्रतुसम्मितान् ॥ ८८ ॥
उसकी वह बात सुनकर शक्तिशाली भगवान्ने ‘तथास्तु’ कहकर उसे स्वीकार कर लिया। इसी तरह पूर्वकालमें स्वयम्भूके पुत्र क्रतुने पुत्र-प्राप्तिके लिये तीन सौ वर्षोंतक योगके द्वारा अपने आपको भगवान् शिवके चिन्तनमें लगा रखा था; अतः क्रतुको भी भगवान् शंकरने उन्हींके समान एक हजार पुत्र प्रदान किये ॥ ८७-८८ ॥
योगेश्वरं देवगीतं वेत्थ कृष्ण न संशयः ।
याज्ञवल्क्य इति ख्यात ऋषिः परमधार्मिकः ॥ ८९ ॥
आराध्य स महादेवं प्राप्तवानतुलं यशः ।
श्रीकृष्ण! देवता जिनकी महिमाका गान करते हैं, उन योगेश्वर शिवको आप भलीभाँति जानते हैं, इसमें संशय नहीं है। याज्ञवल्क्य नामके विख्यात परम धर्मात्मा ऋषिने महादेवजीकी आराधना करके अनुपम यश प्राप्त किया ॥ ८९ १/२ ॥
वेदव्यासश्च योगात्मा पराशरसुतो मुनिः ॥ ९० ॥
सोऽपि शङ्करमाराध्य प्राप्तवानतुलं यशः ।
पराशरजीके पुत्र मुनिवर वेदव्यास तो योगके स्वरूप ही हैं। उन्होंने भी शंकरजीकी आराधना करके वह महान् यश पा लिया, जिसकी कहीं तुलना नहीं है ॥
बालखिल्या मघवता ह्यवज्ञाताः पुरा किल ॥ ९१ ॥
तैः क्रुद्धैर्भगवान् रुद्रस्तपसा तोषितो ह्यभूत् ।
कहते हैं, पूर्वकालमें किसी समय इन्द्रने बालखिल्य नामक ऋषियोंका अपमान कर दिया था। उन ऋषियोंने कुपित होकर तपस्या की और उसके द्वारा भगवान् रुद्रको संतुष्ट किया ॥ ९१ १/२ ॥
तांश्चापि दैवतश्रेष्ठः प्राह प्रीतो जगत्पतिः ॥ ९२ ॥
सुपर्णं सोमहर्तारं तपसोत्पादयिष्यथ ।
तब सुरश्रेष्ठ विश्वनाथ शिवने प्रसन्न होकर उनसे कहा—‘तुम अपनी तपस्याके बलसे गरुडको उत्पन्न करोगे, जो इन्द्रका अमृत छीन लायेगा’ ॥ ९२ १/२ ॥
महादेवस्य रोषाच्च आपो नष्टाः पुराभवन् ॥ ९३ ॥
ताश्च सप्तकपालेन देवैरन्याः प्रवर्तिताः ।
ततः पानीयमभवत् प्रसन्ने त्र्यम्बके भुवि ॥ ९४ ॥
पहलेकी बात है, महादेवजीके रोषसे जल नष्ट हो गया था। तब देवताओंने, जिसके स्वामी रुद्र हैं, उस सप्त कपालयागके द्वारा दूसरा जल प्राप्त किया। इस प्रकार त्रिनेत्रधारी भगवान् शिवके प्रसन्न होनेपर ही भूतलपर जलकी उपलब्धि हुई ॥ ९३-९४ ॥
अत्रेर्भार्यापि भर्तारं संत्यज्य ब्रह्मवादिनी ।
नाहं तस्य मुनेर्भूयो वशगा स्यां कथंचन ॥ ९५ ॥
इत्युक्त्वा सा महाशिवमगच्छच्छरणं किल ।
अत्रिकी पत्नी ब्रह्मवादिनी अनसूया भी किसी समय रुष्ट हो अपने पतिको त्यागकर चली गयीं और मनमें यह संकल्प करके कि ‘अब मैं किसी तरह भी पुनः अत्रिमुनिके वशीभूत नहीं होऊँगी’ महादेवजीकी शरणमें गयीं ।। ९५ १/३ ।।
निराहारा भयादत्रेस्त्रीणि वर्षशतान्यपि ।। ९६ ।।
अशेत मुसलेष्वेव प्रसादार्थं भवस्य सा ।
वे अत्रिमुनिके भयसे तीन सौ वर्षोंतक निराहार रहकर मुसलोंपर ही सोयीं और भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके लिये तपस्या करती रहीं ।। ९६ १/३ ।।
तामब्रवीद्धसन् देवो भविता वै सुतस्तव ।। ९७ ।।
विना भर्त्रा च रुद्रेण भविष्यति न संशयः ।
वंशे तवैव नाम्ना तु ख्यातिं यास्यति चेप्सिताम् ।। ९८ ।।
तब महादेवजीने उनसे हँसते हुए कहा—‘देवि! मेरी कृपासे केवल यज्ञसम्बन्धी चरुका द्रव पीनेमात्रसे तुम्हें पतिके सहयोगके बिना ही एक पुत्र प्राप्त होगा—इसमें संशय नहीं है। वह तुम्हारे वंशमें तुम्हारे ही नामसे इच्छानुसार ख्याति प्राप्त करेगा’ ।। ९७-९८ ।।
विकर्णश्च महादेवं तथा भक्तसुखावहम् ।
प्रसाद्य भगवान् सिद्धिं प्राप्तवान् मधुसूदन ।। ९९ ।।
मधुसूदन! ऐश्वर्यशाली विकर्णने भक्तसुखदायक महादेवजीको प्रसन्न करके मनोवांछित सिद्धि प्राप्त की थी ।। ९९ ।।
शाकल्यः संशितात्मा वै नववर्षशतान्यपि ।
आराधयामास भवं मनोयज्ञेन केशव ।। १०० ।।
केशव! शाकल्य ऋषिके मनमें सदा संशय बना रहता था। उन्होंने मनोमय यज्ञ (ध्यान)-के द्वारा भगवान् शिवकी नौ सौ वर्षोंतक आराधना की ।। १०० ।।
तं चाह भगवांस्तुष्टो ग्रन्थकारो भविष्यसि ।
वत्साक्षया च ते कीर्तिस्त्रैलोक्ये वै भविष्यति ।। १०१ ।।
तब उनसे भी संतुष्ट होकर भगवान् शंकरने कहा—‘वत्स! तुम ग्रन्थकार होओगे तथा तीनों लोकोंमें तुम्हारी अक्षय कीर्ति फैल जायगी ।। १०१ ।।
अक्षयं च कुलं तेऽस्तु महर्षिभिरलंकृतम् ।
भविष्यति द्विजश्रेष्ठः सूत्रकर्ता सुतस्तव ।। १०२ ।।
‘तुम्हारा कुल अक्षय एवं महर्षियोंसे अलंकृत होगा। तुम्हारा पुत्र एक श्रेष्ठ ब्राह्मण एवं सूत्रकार होगा’ ।। १०२ ।।
सावर्णिborder सावर्णिश्चापि विख्यात ऋषिरासीत् कृते युगे ।
इह तेन तपस्तप्तं षष्टिवर्षशतान्यथ ।। १०३ ।।
सत्ययुगमें सावर्णिनामसे विख्यात एक ऋषि थे। उन्होंने यहाँ आकर छः हजार वर्षोंतक तपस्या की ।। १०३ ।।
तमाह भगवान् रुद्रः साक्षात् तुष्टोऽस्मि तेऽनघ ।
ग्रन्थकृल्लोकविख्यातो भवितास्यजरामरः ॥ १०४ ॥
तब भगवान् रुद्रने उन्हें साक्षात् दर्शन देकर कहा—'अनघ! मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ। तुम विश्वविख्यात ग्रन्थकार और अजर-अमर होओगे' ॥ १०४ ॥
शक्रेण तु पुरा देवो वाराणस्यां जनार्दन ।
आराधितोऽभूद् भक्तेन दिग्वासा भस्मगुण्ठितः ॥ १०५ ॥
आराध्य स महादेवं देवराजमवाप्तवान् ।
जनार्दन! पहलेकी बात है, इन्द्रने भक्तिभावके साथ काशीपुरीमें भस्मभूषित दिगम्बर महादेवजीकी आराधना की। महादेवजीकी आराधना करके ही उन्होंने देवराजपद प्राप्त किया ॥ १०५ १/२ ॥
नारदेन तु भक्त्यासौ भव आराधितः पुरा ॥ १०६ ॥
तस्य तुष्टो महादेवो जगौ देवगुरुर्गुरुः ।
तेजसा तपसा कीर्त्या त्वत्समो न भविष्यति ॥ १०७ ॥
गीतेन वादित्व्येन नित्यं मामनुयास्यसि ।
देवर्षि नारदने भी पहले भक्तिभावसे भगवान् शंकरकी आराधना की थी। इससे संतुष्ट होकर गुरुस्वरूप देवगुरु महादेवजीने उन्हें यह वरदान दिया कि 'तेज, तप और कीर्तिमें कोई तुम्हारी समता करनेवाला नहीं होगा। तुम गीत और वीणावादनके द्वारा सदा मेरा अनुसरण करोगे' ॥ १०६-१०७ १/२ ॥
मयापि च यथा दृष्टो देवदेवः पुरा विभो ॥ १०८ ॥
साक्षात् पशुपतिस्तात तच्चापि शृणु माधव ।
प्रभो! तात माधव! मैंने भी पूर्वकालमें साक्षात् देवाधिदेव पशुपतिका जिस प्रकार दर्शन किया था, वह प्रसंग सुनिये ॥ १०८ १/२ ॥
यदर्थं च मया देवः प्रयत्नेन तथा विभो ॥ १०९ ॥
प्रबोधितो महातेजास्तं चापि शृणु विस्तरम् ।
भगवन्! मैंने जिस उद्देश्यसे प्रयत्नपूर्वक महातेजस्वी महादेवजीको संतुष्ट किया था, वह सब विस्सारपूर्वक सुनिये ॥ १०९ १/२ ॥
यदवाप्तं च मे पूर्वं देवदेवान्महेश्वरात् ॥ ११० ॥
तत् सर्वं निखिलेनाद्य कथयिष्यामि तेऽनघ ।
अनघ! पूर्वकालमें मुझे देवाधिदेव महेश्वरसे जो कुछ प्राप्त हुआ था, वह सब आज पूर्णरूपसे तुम्हें बताऊँगा ॥ ११० १/२ ॥
पुरा कृतयुगे तात ऋषिरासीन्महायशाः ॥ १११ ॥
व्याघ्रपाद इति खातो वेदवेदाङ्गपारगः ।
तात! पहले सत्ययुगमें एक महायशस्वी ऋषि हो गये हैं, जो व्याघ्रपादनामसे प्रसिद्ध थे। वे वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् थे ॥ १११ १/२ ॥ तस्याहमभवं पुत्रो धौम्यश्चापि ममानुजः ॥ ११२ ॥ कस्यचित् त्वथ कालस्य धौम्येन सह माधव। आगच्छमाश्रमं क्रीडन् मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ ११३ ॥ उन्हींका मैं पुत्र हूँ। मेरे छोटे भाईका नाम धौम्य है। माधव! किसी समय मैं धौम्यके साथ खेलता हुआ पवित्रात्मा मुनियोंके आश्रमपर आया ॥ ११२-११३ ॥ तत्रापि च मया दृष्टा दुह्यमाना पयस्विनी। लक्षितं च मया क्षीरं स्वादुतो ह्यमृतोपमम् ॥ ११४ ॥ वहाँ मैंने देखा, एक दुधारू गाय दुही जा रही थी। वहीं मैंने दूध देखा, जो स्वादमें अमृतके समान होता है ॥ ११४ ॥ ततोऽहमब्रुवं बाल्याज्जननीमात्मनस्तथा। क्षीरोदनसमायुक्तं भोजनं हि प्रयच्छ मे ॥ ११५ ॥ तब मैंने बालस्वभाववश अपनी मातासे कहा—'माँ! मुझे खानेके लिये दूध-भात दो' ॥ ११५ ॥ अभावाच्चैव दुग्धस्य दुःखिता जननी तदा। ततः पिष्टं समालोड्य तोयेन सह माधव ॥ ११६ ॥ आवयोः क्षीरमित्येव पानार्थं समुपानयत्। घरमें दूधका अभाव था; इसलिये मेरी माताको उस समय बड़ा दुःख हुआ। माधव! तब वह पानीमें आटा घोलकर ले आयी और दूध कहकर दोनों भाइयोंको पीनेके लिये दे दिया ॥ ११६ १/२ ॥ अथ गव्यं पयस्तात कदाचित् प्राशितं मया ॥ ११७ ॥ पित्राहं यज्ञकाले हि नीतो ज्ञातिकुलं महत्। तत्र सा क्षरते देवी दिव्या गौः सुरनन्दिनी ॥ ११८ ॥ तात! उसके पहले एक दिन मैंने गायका दूध पीया था। पिताजी यज्ञके समय एक बड़े भारी धनी कुटुम्बीके घर मुझे ले गये थे। वहाँ दिव्य सुरभी गाय दूध दे रही थी ॥ ११७-११८ ॥ तस्याहं तत् पयः पीत्वा रसेन ह्यमृतोपमम्। ज्ञात्वा क्षीरगुणांश्चैव उपलभ्य हि सम्भवम् ॥ ११९ ॥ उस अमृतके समान स्वादिष्ट दूधको पीकर मैं यह जान गया था कि दूधका स्वाद कैसा होता है और उसकी उपलब्धि किस प्रकार होती है ॥ ११९ ॥ स च पिष्टरसस्तात न मे प्रीतिमुपावहत्। ततोऽहमब्रुवं बाल्याज्जननीमात्मनस्तदा ॥ १२० ॥
तात! इसीलिये वह आटेका रस मुझे प्रिय नहीं लगा; अतः मैंने बालस्वभाववश ही अपनी मातासे कहा— ।।
नेदं क्षीरोदनं मातर्यत् त्वं मे दत्तवत्यसि । ततो मामब्रवीन्माता दुःखशोकसमन्विता ॥ १२१ ॥ पुत्रस्नेहात् परिष्वज्य मूर्ध्नि चाघ्राय माधव । कुतः क्षीरोदनं वत्स मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ १२२ ॥ वने निवसतं नित्यं कन्दमूलफलाशिनाम् ।
‘माँ! तुमने मुझे जो दिया है, यह दूध-भात नहीं है।’ माधव! तब मेरी माता दुःख और शोकमें मग्न हो पुत्रस्नेहवश मुझे हृदयसे लगाकर मेरा मस्तक सूँघती हुई मुझसे बोली—‘बेटा! जो सदा वनमें रहकर कन्द, मूल और फल खाकर निर्वाह करते हैं, उन पवित्र अन्तःकरणवाले मुनियोंको भला दूध-भात कहाँसे मिल सकता है? ।। १२१-१२२ १/२ ।।
आस्थितानां नदीं दिव्यां वालखिल्यैर्निषेविताम् ॥ १२३ ॥ कुतः क्षीरं वनस्थानां मुनीनां गिरिवासिनाम् ।
‘जो बालखिल्योंद्वारा सेवित दिव्य नदी गंगाका सहारा लिये बैठे हैं, पर्वतों और वनोंमें रहनेवाले उन मुनियोंको दूध कहाँसे मिलेगा? ।। १२३ १/२ ।।
पावनानां वनाशानां वनाश्रमनिवासिनाम् ॥ १२४ ॥ ग्राम्याहारनिवृत्तानामारण्यफलभोजिनाम् ।
‘जो पवित्र हैं, वनमें ही होनेवाली वस्तुएँ खाते हैं, वनके आश्रमोंमें ही निवास करते हैं, ग्रामीण आहारसे निवृत्त होकर जंगलके फल-मूलोंका ही भोजन करते हैं, उन्हें दूध कैसे मिल सकता है? ।। १२४ १/२ ।।
नास्ति पुत्र पयोऽरण्ये सुरभीगोत्रवर्जिते ॥ १२५ ॥ नदीगह्वरशैलेषु तीर्थेषु विविधेषु च । तपसा जप्यनित्यानां शिवो नः परमा गतिः ॥ १२६ ॥
‘बेटा! यहाँ सुरभी गायकी कोई संतान नहीं है, अतः इस जंगलमें दूधका सर्वथा अभाव है। नदी, कन्दरा, पर्वत और नाना प्रकारके तीर्थोंमें तपस्यापूर्वक जपमें तत्पर रहनेवाले हम ऋषि-मुनियोंके भगवान् शंकर ही परम आश्रय हैं ।। १२५-१२६ ।।
अप्रसाद्य विरूपाक्षं वरदं स्थाणुमव्ययम् । कुतः क्षीरोदनं वत्स सुखानि वसनानि च ॥ १२७ ॥
‘वत्स! जो सबको वर देनेवाले, नित्य स्थिर रहनेवाले और अविनाशी ईश्वर हैं, उन भगवान् विरूपाक्षको प्रसन्न किये बिना दूध-भात और सुखदायक वस्त्र कैसे मिल सकते हैं? ।। १२७ ।।
तं प्रपद्य सदा वत्स सर्वभावेन शङ्करम् । तत्प्रसादाच्च कामेभ्यः फलं प्राप्स्यसि पुत्रक ॥ १२८ ॥
'बेटा! सदा सर्वतोभावसे उन्हीं भगवान् शंकरकी शरण लेकर उनकी कृपासे ही इच्छानुसार फल पा सकोगे' ॥ १२८ ॥
जनन्यास्तद् वचः श्रुत्वा तदाप्रभृति शत्रुहन् ।
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा इदमम्बामचोदयम् ॥ १२९ ॥
शत्रुसूदन! जननीकी वह बात सुनकर उसी समय मैंने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर माताजीसे यह पूछा— ॥ १२९ ॥
कोऽयमम्ब महादेवः स कथं च प्रसीदति ।
कुत्र वा वसते देवो द्रष्टव्यो वा कथञ्चन ॥ १३० ॥
'अम्ब! ये महादेवजी कौन हैं? और कैसे प्रसन्न होते हैं? वे शिव देवता कहाँ रहते हैं और कैसे उनका दर्शन किया जा सकता है? ॥ १३० ॥
तुष्यते वा कथं शर्वो रूपं तस्य च कीदृशम् ।
कथं ज्ञेयः प्रसन्नो वा दर्शयेज्जननि मम ॥ १३१ ॥
मेरी माँ! यह बताओ कि शिवजीका रूप कैसा है? वे कैसे संतुष्ट होते हैं? उन्हें किस तरह जाना जाय अथवा वे कैसे प्रसन्न होकर मुझे दर्शन दे सकते हैं?' ॥ १३१ ॥
एवमुक्ता तदा कृष्ण माता मे सुतवत्सला ।
मूर्ध्न्याघ्राय गोविन्द सबाष्पाकुललोचना ॥ १३२ ॥
प्रमार्जन्ती च गात्राणि मम वै मधुसूदन ।
दैन्यमालम्ब्य जननी इदमाह सुरोत्तम ॥ १३३ ॥
सच्चिदानन्दस्वरूप गोविन्द! सुरश्रेष्ठ मधुसूदन! मेरे इस प्रकार पूछनेपर मेरी पुत्रवत्सला माताके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वह मेरा मस्तक सूँघकर मेरे सभी अङ्गोंपर हाथ फेरने लगी और कुछ दीन-सी होकर यों बोली ॥ १३२-१३३ ॥
अम्बोवाच
दुर्विज्ञेयो महादेवो दुराधारो दुरन्तकः ।
दुराबाधश्च दुर्ग्राह्यो दुर्द्दश्यो ह्यकृतात्मभिः ॥ १३४ ॥
**माताने कहा—**जिन्होंने अपने मनको वशमें नहीं किया है, ऐसे लोगोंके लिये महादेवजीका ज्ञान होना बहुत कठिन है। उनका मनसे धारण करनेमें आना मुश्किल है। उनकी प्राप्तिके मार्गमें बड़े-बड़े विघ्न हैं। दुस्तर बाधाएँ हैं। उनका ग्रहण और दर्शन होना भी अत्यन्त कठिन है ॥ १३४ ॥
यस्य रूपाण्यनेकानि प्रवदन्ति मनीषिणः ।
स्थानानि च विचित्राणि प्रसादाश्चाप्यनेकंशः ॥ १३५ ॥
मनीषी पुरुष कहते हैं कि भगवान् शंकरके अनेक रूप हैं। उनके रहनेके विचित्र स्थान हैं और उनका कृपाप्रसाद भी अनेक रूपोंमें प्रकट होता है ॥ १३५ ॥
को हि तत्त्वेन तद् वेद ईशस्य चरितं शुभम् । कृतवान् यानि रूपाणि देवदेवः पुरा किल । क्रीडते च तथा शर्वः प्रसीदति यथा च वै ॥ १३६ ॥ पूर्वकालमें देवाधिदेव महादेवने जो-जो रूप धारण किये हैं, ईश्वरके उस शुभ चरित्रको कौन यथार्थरूपसे जानता है? वे कैसे क्रीडा करते हैं और किस तरह प्रसन्न होते हैं? यह कौन समझ सकता है ॥ १३६ ॥
हृदिस्थः सर्वभूतानां विश्वरूपो महेश्वरः । भक्तानामनुकम्पार्थं दर्शनं च यथाश्रुतम् ॥ १३७ ॥ मुनीनां ब्रुवतां दिव्यमीशानचरितं शुभम् । वे विश्वरूपधारी महेश्वर समस्त प्राणियोंके हृदयमन्दिरमें विराजमान हैं। वे भक्तोंपर कृपा करनेके लिये किस प्रकार दर्शन देते हैं? यह शंकरजीके दिव्य एवं कल्याणमय चरित्रका वर्णन करनेवाले मुनियोंके मुखसे जैसा मैंने सुना है वह बताऊँगी ॥ १३७ १/२ ॥
कृतवान् यानि रूपाणि कथितानि दिवौकसैः ॥ १३८ ॥ अनुग्रहार्थं विप्राणां शृणु वत्स समासतः । तानि ते कीर्तयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ १३९ ॥ वत्स! उन्होंने ब्राह्मणोंपर अनुग्रह करनेके लिये देवताओंद्वारा कथित जो-जो रूप ग्रहण किये हैं, उन्हें संक्षेपसे सुनो। वत्स! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वे सारी बातें मैं तुम्हें बताऊँगी ॥ १३८-१३९ ॥
अम्बोवाच
ब्रह्मविष्णुसुरेन्द्राणां रुद्रादित्याश्विनामपि । विश्वेषामपि देवानां वपुर्धारयते भवः ॥ १४० ॥ ऐसा कहकर माता फिर कहने लगी—भगवान् शिव ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार तथा सम्पूर्ण देवताओंका शरीर धारण करते हैं ॥ १४० ॥
नराणां देवनारीणां तथा प्रेतपिशाचयोः । किरातशबराणां च जलजानामनेकशः ॥ १४१ ॥ करोति भगवान् रूपमाटव्यशबराण्यपि । वे भगवान् पुरुषों, देवांगनाओं, प्रेतों, पिशाचों, किरातों, शबरों, अनेकानेक जलजन्तुओं तथा जंगली भीलोंके भी रूप ग्रहण कर लेते हैं ॥ १४१ १/२ ॥
कूर्मो मत्स्यस्तथा शङ्खः प्रवालाङ्कुरभूषणः ॥ १४२ ॥ यक्षराक्षससर्पाणां दैत्यदानवयोरपि । वपुर्धारयते देवो भूयश्च विलवासिनाम् ॥ १४३ ॥
कूर्म, मत्स्य, शंख, नये-नये पल्लवोंके अंकुरसे सुशोभित होनेवाले वसंत आदिके रूपोंमें भी वे ही प्रकट होते हैं। वे महादेवजी यक्ष, राक्षस, सर्प, दैत्य, दानव और पातालवासियोंका भी रूप धारण करते हैं॥ १४२-१४३ ॥
व्याघ्रसिंहमृगाणां च तरक्ष्वृक्षपतत्रिणाम् ।
उलूकश्वशृगालानां रूपाणि कुरुतेऽपि च ॥ १४४ ॥
वे व्याघ्र, सिंह, मृग, तरक्षु, रीछ, पक्षी, उल्लू, कुत्ते और सियारोंके भी रूप धारण कर लेते हैं॥ १४४ ॥
हंसकाकमयूराणां कृकलासकसारसाम् ।
रूपाणि च बलाकानां गृध्रचक्राङ्गयोरपि ॥ १४५ ॥
करोति वा स रूपाणि धारयत्यपि पर्वतम् ।
गोरूपं च महादेवो हस्त्यश्वोष्ट्रखराकृतिः ॥ १४६ ॥
हंस, काक, मोर, गिरगिट, सारस, बगुले, गीध और चक्रांग (सविशेष)-के भी रूप वे महादेवजी धारण करते हैं। पर्वत, गाय, हाथी, घोड़े, ऊँट और गदहेके आकारमें भी वे प्रकट हो जाते हैं॥ १४५-१४६ ॥
छागशार्दूलरूपश्च अनेकमृगरूपधृक् ।
अण्डजानां च दिव्यानां वपुर्धारयते भवः ॥ १४७ ॥
वे बकरे और शार्दूलके रूपमें भी उपलब्ध होते हैं। नाना प्रकारके मृगों—वन्य पशुओंके भी रूप धारण करते हैं तथा भगवान् शिव दिव्य पक्षियोंके भी रूप धारण कर लेते हैं॥ १४७ ॥
दण्डी छत्री च कुण्डी च द्विजानां धारणस्तथा ।
षण्मुखो वै बहुमुखस्त्रिनेत्रो बहुशीर्षकः ॥ १४८ ॥
वे द्विजोंके चिह्न दण्ड, छत्र और कुण्ड (कमण्डलु) धारण करते हैं। कभी छः मुख और कभी बहुत-से मुखवाले हो जाते हैं। कभी तीन नेत्र धारण करते हैं। कभी बहुत-से मस्तक बना लेते हैं॥ १४८ ॥
अनेककटिपादश्च अनेकोदरवक्त्रधृक् ।
अनेकपाणिपार्श्वश्च अनेकगणसंवृतः ॥ १४९ ॥
उनके पैर और कटिभाग अनेक हैं। वे बहुसंख्यक पेट और मुख धारण करते हैं। उनके हाथ और पार्श्वभाग भी अनेकानेक हैं। अनेक पार्षदगण उन्हें सब ओरसे घेरे रहते हैं॥ १४९ ॥
ऋषिगन्धर्वरूपश्च सिद्धचारणरूपधृक् ।
भस्मपाण्डुरगात्रश्च चन्द्रार्धकृतभूषणः ॥ १५० ॥
वे ऋषि और गन्धर्वरूप हैं। सिद्ध और चारणोंके भी रूप धारण करते हैं। उनका सारा शरीर भस्म रमाये रहनेसे सफेद जान पड़ता है। वे ललाटमें अर्द्धचन्द्रका आभूषण धारण
करते हैं ।। १५० ।। अनेकरावसंघुष्टश्चानेकस्तुतिसंस्कृतः । सर्वभूतान्तकः सर्वः सर्वलोकप्रतिष्ठितः ।। १५१ ।। उनके पास अनेक प्रकारके शब्दोंका घोष होता रहता है। वे अनेक प्रकारकी स्तुतियोंसे सम्मानित होते हैं, समस्त प्राणियोंका संहार करते हैं, स्वयं सर्वस्वरूप हैं तथा सबके अन्तर्रात्मारूपसे सम्पूर्ण लोकोंमें प्रतिष्ठित हैं ।। १५१ ।। सर्वलोकान्तरात्मा च सर्वगः सर्ववाद्यपि । सर्वत्र भगवान् ज्ञेयो हृदिस्थः सर्वदेहिनाम् ।। १५२ ।। वे सम्पूर्ण जगत्के अन्तर्रात्मा, सर्वव्यापी और सर्ववादी हैं, उन भगवान् शिवको सर्वत्र और सम्पूर्ण देहधारियोंके हृदयमें विराजमान जानना चाहिये ।। १५२ ।। यो हि यं कामयेत् कामं यस्मिन्नर्थेऽर्च्यते पुनः । तत् सर्वं वेत्ति देवेशस्तं प्रपद्य यदिच्छसि ।। १५३ ।। जो जिस मनोरथको चाहता है और जिस उद्देश्यसे उसके द्वारा भगवान्की अर्चना की जाती है, देवेश्वर भगवान् शिव वह सब जानते हैं। इसलिये यदि तुम कोई वस्तु चाहते हो तो उन्हींकी शरण लो ।। १५३ ।। नन्दते कुप्यते चापि तथा हुंकारयत्यपि । चक्री शूली गदापाणिर्मुसली खड्गपट्टिशी ।। १५४ ।। वे कभी आनन्दित रहकर आनन्द देते, कभी कुपित होकर कोप प्रकट करते और कभी हुंकार करते हैं, अपने हाथोंमें चक्र, शूल, गदा, मुसल, खड्ग और पट्टिश धारण करते हैं ।। १५४ ।। भूधरो नागमौञ्जी च नागकुण्डलकुण्डली । नागयज्ञोपवीती च नागचर्मोत्तरच्छदः ।। १५५ ।। वे धरणीधर शेषनागरूप हैं, वे नागकी मेखला धारण करते हैं। नागमय कुण्डलसे कुण्डलधारी होते हैं। नागोंका ही यज्ञोपवीत धारण करते हैं तथा नागचर्मका ही उत्तरीय (चादर) लिये रहते हैं ।। १५५ ।। हसते गायते चैव नृत्यते च मनोहरम् । वादयत्यपि वाद्यानि विचित्राणि गणैर्युतः ।। १५६ ।। वे अपने गणोंके साथ रहकर हँसते हैं, गाते हैं, मनोहर नृत्य करते हैं और विचित्र बाजे भी बजाते हैं ।। १५६ ।। वल्गते जृम्भते चैव रुदते रोदयत्यपि । उन्मत्तमत्तरूपं च भाषते चापि सुस्वरः ।। १५७ ।। भगवान् रुद्र उछलते-कूदते हैं। जँभाई लेते हैं। रोते हैं, रुलाते हैं। कभी पागलों और मतवालोंकी तरह बातें करते हैं और कभी मधुर स्वरसे उत्तम वचन बोलते हैं ।। १५७ ।।
अतीव हसते रौद्रस्त्रासयन् नयनैर्जनम् ।
जागर्ति चैव स्वपिति जृम्भते च यथासुखम् ॥ १५८ ॥
कभी भयंकर रूप धारण करके अपने नेत्रोंद्वारा लोगोंमें त्रास उत्पन्न करते हुए जोर-जोरसे अट्टहास करते, जागते, सोते और मौजसे अँगड़ाई लेते हैं ॥ १५८ ॥
जपते जप्यते चैव तपते तप्यते पुनः ।
ददाति प्रतिगृह्णाति युज्यते ध्यायतेऽपि च ॥ १५९ ॥
वे जप करते हैं और वे ही जपे जाते हैं; तप करते हैं और तपे जाते हैं (उन्हींके उद्देश्यसे तप किया जाता है)। वे दान देते और दान लेते हैं तथा योग और ध्यान करते हैं ॥ १५९ ॥
वेदीमध्ये तथा यूपे गोष्ठमध्ये हुताशने ।
दृश्यते दृश्यते चापि बालो वृद्धो युवा तथा ॥ १६० ॥
यज्ञकी वेदीमें, यूपमें, गौशालामें तथा प्रज्वलित अग्निमें वे ही दिखायी देते हैं। बालक, वृद्ध और तरुणरूपमें भी उनका दर्शन होता है ॥ १६० ॥
क्रीडते ऋषिकन्याभिर्ऋषिपत्नीभिरेव च ।
ऊर्ध्वकेशो महाशेफो नग्नो विकृतलोचनः ॥ १६१ ॥
वे ऋषिकन्याओं तथा मुनिपत्नियोंके साथ खेला करते हैं। कभी ऊर्ध्वकेश (ऊपर उठे हुए बालवाले), कभी महालिंग, कभी नंग-धड़ंग और कभी विकराल नेत्रोंसे युक्त हो जाते हैं ॥ १६१ ॥
गौरः श्यामस्तथा कृष्णः पाण्डुरो धूमलोहितः ।
विकृताक्षो विशालाक्षो दिग्वासाः सर्ववासकः ॥ १६२ ॥
कभी गोरे, कभी साँवले, कभी काले, कभी सफेद, कभी धूएँके समान रंगवाले एवं लोहित दिखायी देते हैं। कभी विकृत नेत्रोंसे युक्त होते हैं। कभी सुन्दर विशाल नेत्रोंसे सुशोभित होते हैं। कभी दिगम्बर दिखायी देते हैं और कभी सब प्रकारके वस्त्रोंसे विभूषित होते हैं ॥ १६२ ॥
अरूपस्याद्यरूपस्य अतिरूपाद्यरूपिणः ।
अनाद्यन्तमजस्यान्तं वेत्स्यते कोऽस्य तत्त्वतः ॥ १६३ ॥
वे रूपरहित हैं। उनका स्वरूप ही सबका आदिकारण है। वे रूपसे अतीत हैं। सबसे पहले जिसकी सृष्टि हुई है जल उन्हींका रूप है। इन अजन्मा महादेवजीका स्वरूप आदि-अन्तसे रहित है। उसे कौन ठीक-ठीक जान सकता है ॥ १६३ ॥
हृदि प्राणो मनो जीवो योगात्मा योगसंज्ञितः ।
ध्यानं तत्परमात्मा च भावग्राह्यो महेश्वरः ॥ १६४ ॥
भगवान् शंकर प्राणियोंके हृदयमें प्राण, मन एवं जीवात्मारूपसे विराजमान हैं। वे ही योगस्वरूप, योगी, ध्यान तथा परमात्मा हैं। भगवान् महेश्वर भक्तिभावसे ही गृहीत होते
हैं ॥ १६४ ॥ वादको गायनश्चैव सहस्रशतलोचनः । एकवक्त्रो द्विवक्त्रश्च त्रिवक्त्रोऽनेकवक्त्रकः ॥ १६५ ॥ वे बाजा बजानेवाले और गीत गानेवाले हैं। उनके लाखों नेत्र हैं। वे एकमुख, द्विमुख, त्रिमुख और अनेक मुखवाले हैं ॥ १६५ ॥ तद्भक्तस्तद्गतो नित्यं तन्निष्ठस्तत्परायणः । भज पुत्र महादेवं ततः प्राप्स्यसि चेप्सितम् ॥ १६६ ॥ बेटा! तुम उन्हींके भक्त बनकर उन्हींमें आसक्त रहो। सदा उन्हींपर निर्भर रहो और उन्हींके शरणागत होकर महादेवजीका निरन्तर भजन करते रहो। इससे तुम्हें मनोवाञ्छित वस्तुकी प्राप्ति होगी ॥ १६६ ॥ जनन्यास्तद् वचः श्रुत्वा तदाप्रभृति शत्रुहन् । मम भक्तिर्महादेवे नैष्ठिकी समपद्यत ॥ १६७ ॥ शत्रुसूदन श्रीकृष्ण! माताका वह उपदेश सुनकर तभीसे महादेवजीके प्रति मेरी सुदृढ़ भक्ति हो गयी ॥ ततोऽहं तप आस्थाय तोषयामास शङ्करम् । एकं वर्षसहस्रं तु वामाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितः ॥ १६८ ॥ तदनन्तर मैंने तपस्याका आश्रय ले भगवान् शंकरको संतुष्ट किया। एक हजार वर्षतक केवल बायें पैरके अँगूठेके अग्रभागके बलपर मैं खड़ा रहा ॥ १६८ ॥ एकं वर्षशतं चैव फलाहारस्ततोऽभवम् । द्वितीयं शीर्णपर्णाशी तृतीयं चाम्बुभोजनः ॥ १६९ ॥ पहले तो एक सौ वर्षोंतक मैं फलाहारी रहा। दूसरे शतकमें गिरे-पड़े सूखे पत्ते चबाकर रहा और तीसरे शतकमें केवल जल पीकर ही प्राण धारण करता रहा ॥ १६९ ॥ शतानि सप्त चैवाहं वायुभक्षस्तदाभवम् । एकं वर्षसहस्रं तु दिव्यमाराधितो मया ॥ १७० ॥ फिर शेष सात सौ वर्षोंतक केवल हवा पीकर रहा। इस प्रकार मैंने एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक उनकी आराधना की ॥ १७० ॥ ततस्तुष्टो महादेवः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः । एकभक्त इति ज्ञात्वा जिज्ञासां कुरुते तदा ॥ १७१ ॥ तदनन्तर सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी भगवान् महादेव मुझे अपना अनन्यभक्त जानकर संतुष्ट हुए और मेरी परीक्षा लेने लगे ॥ १७१ ॥ शक्ररूपं स कृत्वा तु सर्वैर्देवगणैर्वृतः । सहस्राक्षस्तदा भूत्वा वज्रपाणिर्महायशाः ॥ १७२ ॥
उन्होंने सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रका रूप धारण करके पदार्पण किया। उस समय उनके सहस्र नेत्र शोभा पा रहे थे। उन महायशस्वी इन्द्रके हाथमें वज्र प्रकाशित हो रहा था॥ १७२ ॥
सुधावदातं रक्ताक्षं स्तब्धकर्णं मदोत्कटम्।
आवेष्टितकरं घोरं चतुर्दंष्ट्रं महाग़जम्॥ १७३॥
समास्थितः स भगवान् दीप्यमानः स्वतेजसा।
आजगाम किरीटी तु हारकेयूरभूषितः॥ १७४॥
वे भगवान् इन्द्र लाल नेत्र और खड़े कानवाले, सुधाके समान उज्ज्वल, मुड़ी हुई सूँड़से सुशोभित, चार दाँतोंसे युक्त और देखनेमें भयंकर मदसे उन्मत्त महान् गजराज ऐरावतकी पीठपर बैठकर अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए वहाँ पधारे। उनके मस्तकपर मुकुट, गलेमें हार और भुजाओंमें केयूर शोभा दे रहे थे॥ १७३-१७४॥
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि।
सेव्यमानोऽप्सरोभिश्च दिव्यगन्धर्वनादितैः॥ १७५॥
सिरपर श्वेत छत्र तना हुआ था। अप्सराएँ उनकी सेवा कर रही थीं और दिव्य गन्धर्वोंके संगीतकी मनोरम ध्वनि वहाँ सब ओर गूँज रही थी॥ १७५॥
ततो मामाह देवेन्द्रस्तुष्टस्तेऽहं द्विजोत्तम।
वरं वृणीष्व मत्तःस्त्वं यत् ते मनसि वर्तते॥ १७६॥
शक्रस्य तु वचः श्रुत्वा नाहं प्रीतमनाभवम्।
अब्रुवंश्च तदा हृष्टो देवराजमिदं वचः॥ १७७॥
उस समय देवराज इन्द्रने मुझसे कहा—'द्विजश्रेष्ठ! मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ। तुम्हारे मनमें जो वर लेनेकी इच्छा हो, वही मुझसे माँग लो।' इन्द्रकी बात सुनकर मेरा मन प्रसन्न नहीं हुआ। मैंने ऊपरसे हर्ष प्रकट करते हुए देवराजसे यह कहा— ॥ १७६-१७७॥
नाहं त्वत्तो वरं काङ्क्षे नान्यस्मादपि दैवतात्।
महादेवादृते सौम्य सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥ १७८॥
'सौम्य! मैं महादेवजीके सिवा तुमसे या दूसरे किसी देवतासे वर लेना नहीं चाहता। यह मैं सच्ची बात कहता हूँ॥ १७८॥
सत्यं सत्यं हि नः शक्र वाक्यमेतत् सुनिश्चितम्।
न यन्महेश्वरं मुक्त्वा कथान्या मम रोचते॥ १७९॥
'इन्द्र! हमारा यह कथन सत्य है, सत्य है और सुनिश्चित है। मुझे महादेवजीको छोड़कर और कोई बात अच्छी ही नहीं लगती है॥ १७९॥
पशुपतिवचनाद् भवामि सद्यः
कृमिरथवा तरुरप्यनेकशाखः।
अपशुपतिवरप्रसादजा मे
त्रिभुवनराज्यविभूतिरप्यनिष्टा ॥ १८० ॥ 'मैं भगवान् पशुपतिके कहनेसे तत्काल प्रसन्नतापूर्वक कीट अथवा अनेक शाखाओंसे युक्त वृक्ष भी हो सकता हूँ; परंतु भगवान् शिवसे भिन्न दूसरे किसीके वर-प्रसादसे मुझे त्रिभुवनका राज्यवैभव प्राप्त हो रहा हो तो वह भी अभीष्ट नहीं है ॥ १८० ॥
जन्म श्वपाकमध्येऽपि मेऽस्तु हरचरणवन्दनरतस्य । मा वानीश्वरभक्तो भवानि भवनेऽपि शक्रस्य ॥ १८१ ॥ 'यदि मुझे भगवान् शंकरके चरणारविन्दोंकी वन्दनामें तत्पर रहनेका अवसर मिले तो मेरा जन्म चाण्डालोंमें भी हो जाय तो यह मुझे सहर्ष स्वीकार है। परंतु भगवान् शिवकी अनन्यभक्तिसे रहित होकर मैं इन्द्रके भवनमें भी स्थान पाना नहीं चाहता ॥ १८१ ॥
वाय्वम्बुभुजोऽपि सतो नरस्य दुःखक्षयः कुतस्तस्य । भवति हि सुरासुरगुरौ यस्य न विश्वेश्वरे भक्तिः ॥ १८२ ॥ 'कोई जल या हवा पीकर ही रहनेवाला क्यों न हो, जिसकी सुरासुरगुरु भगवान् विश्वनाथमें भक्ति न हो, उसके दुःखोंका नाश कैसे हो सकता है? ॥ १८२ ॥
अलमन्याभिस्तेषां कथाभिरप्यन्यधर्मयुक्ताभिः । येषां न क्षणमपि रुचितो हरचरणस्मरणविच्छेदः ॥ १८३ ॥ 'जिन्हें क्षणभरके लिये भी भगवान् शिवके चरणारविन्दोंके स्मरणका वियोग अच्छा नहीं लगता, उन पुरुषोंके लिये अन्यान्य धर्मोंसे युक्त दूसरी-दूसरी सारी कथाएँ व्यर्थ हैं ॥ १८३ ॥
हरचरणनिरतमतिना भवितव्यमनार्जवं युगं प्राप्य । संसारभयं न भवति हरभक्तिरसायनं पीत्वा ॥ १८४ ॥ 'कुटिल कलिकालको पाकर सभी पुरुषोंको अपना मन भगवान् शंकरके चरणारविन्दोंके चिन्तनमें लगा देना चाहिये। शिव-भक्तिरूपी रसायनके पी लेनेपर संसाररूपी रोगका भय नहीं रह जाता है ॥ १८४ ॥
दिवसं दिवसार्धं वा मुहूर्तं वा क्षणं लवम् । न ह्यलब्धप्रसादस्य भक्तिर्भवति शङ्करे ॥ १८५ ॥
‘जिसपर भगवान् शिवकी कृपा नहीं है, उस मनुष्यकी एक दिन, आधे दिन, एक मुहूर्त, एक क्षण या एक लवके लिये भी भगवान् शंकरमें भक्ति नहीं होती है ॥ १८५ ॥ अपि कीटः पतङ्गो वा भवेयं शङ्कराज्ञया । न तु शक्र त्वया दत्तं त्रैलोक्यमपि कामये ॥ १८६ ॥ श्वापि महेश्वरवचनाद् भवामि स हि नः परः कामः । त्रिदशगणराज्यमपि खलु नेच्छाम्यमहेश्वरैराज्ञप्तम् ॥ १८७ ॥ ‘शक्र! मैं भगवान् शंकरकी आज्ञासे कीट या पतंग भी हो सकता हूँ, परंतु तुम्हारा दिया हुआ त्रिलोकीका राज्य भी नहीं लेना चाहता। महेश्वरके कहनेसे यदि मैं कुत्ता भी हो जाऊँ तो उसे मैं सर्वोत्तम मनोरथकी पूर्ति समझूँगा; परंतु महादेवजीके सिवा दूसरे किसीसे प्राप्त हुए देवताओंके राज्यको लेनेकी भी मुझे इच्छा नहीं है ॥ १८६-१८७ ॥ न नाकपृष्ठं न च देवराज्यं न ब्रह्मलोकं न च निष्कलत्वम् । न सर्वकामानखिलान् वृणोमि हरस्य दासत्वमहं वृणोमि ॥ १८८ ॥ ‘न तो मैं स्वर्गलोक चाहता हूँ, न देवताओंका राज्य पानेकी अभिलाषा रखता हूँ। न ब्रह्मलोककी इच्छा करता हूँ और न निर्गुण ब्रह्मका सायुज्य ही प्राप्त करना चाहता हूँ। भूमण्डलकी समस्त कामनाओंको भी पानेकी मेरी इच्छा नहीं है। मैं तो केवल भगवान् शिवकी दासताका ही वरण करता हूँ ॥ १८८ ॥ यावच्छशाङ्कधवलामलबद्धमौलि- र्न प्रीयते पशुपतिर्भगवान् म्मेशः । तावज्जरामरणजन्मशताभिघातै- र्दुःखानि देहविहितानि समुद्वहामि ॥ १८९ ॥ ‘जिनके मस्तकपर अर्द्धचन्द्रमय उज्ज्वल एवं निर्मल मुकुट बँधा हुआ है, वे मेरे स्वामी भगवान् पशुपति जबतक प्रसन्न नहीं होते हैं, तबतक मैं जरा-मृत्यु और जन्मके सैकड़ों आघातोंसे प्राप्त होनेवाले दैहिक दुःखोंका भार ढोता रहूँगा ॥ १८९ ॥ दिवसकरशशाङ्कवह्निदीप्तं त्रिभुवनसारमसारमाद्यमेकम् । अजरममरमप्रसाद्य रुद्रं जगति पुमानिह को लभेत शान्तिम् ॥ १९० ॥ ‘जो अपने नेत्रभूत सूर्य, चन्द्रमा और अग्निकी प्रभासे उद्भासित होते हैं, त्रिभुवनके साररूप हैं, जिनसे बढ़कर सारतत्त्व दूसरा नहीं है, जो जगत्के आदिकारण, अद्वितीय तथा
अजर-अमर हैं, उन भगवान् रुद्रको भक्तिभावसे प्रसन्न किये बिना कौन पुरुष इस संसारमें शान्ति पा सकता है ॥ १९० ॥ यदि नाम जन्म भूयो भवति मदीयैः पुनर्दोषैः । तस्मिंस्तस्मिञ्जन्मनि भवे भवेन्मेऽक्षया भक्तिः ॥ १९१ ॥ 'यदि मेरे दोषोंसे मुझे बारंबार इस जगत्में जन्म लेना पड़े तो मेरी यही इच्छा है कि उस-उस प्रत्येक जन्ममें भगवान् शिवमें मेरी अक्षय भक्ति हो' ॥ १९१ ॥
शक्र उवाच
कः पुनर्भवने हेतुरीशे कारणकारणे । येन शर्वाद्दृतेऽन्यस्मात् प्रसादं नाभिकाङ्क्षसि ॥ १९२ ॥ इन्द्रने पूछा— ब्रह्मन्! कारणके भी कारण जगदीश्वर शिवकी सत्तामें क्या प्रमाण है, जिससे तुम शिवके अतिरिक्त दूसरे किसी देवताका कृपा-प्रसाद ग्रहण करना नहीं चाहते? ॥ १९२ ॥
उपमन्युरुवाच
सदसद् व्यक्तमव्यक्तं यमाहुर्ब्रह्मवादिनः । नित्यमेकमनेकं च वरं तस्माद् वृणीमहे ॥ १९३ ॥ उपमन्युने कहा— देवराज! ब्रह्मवादी महात्मा जिन्हें विभिन्न मतोंके अनुसार सत्-असत्, व्यक्त-अव्यक्त, नित्य, एक और अनेक कहते हैं, उन्हीं महादेवजीसे हम वर माँगेंगे ॥ १९३ ॥
अनादिमध्यपर्यन्तं ज्ञानैश्वर्यमचिन्तितम् । आत्मानं परमं यस्माद् वरं तस्माद् वृणीमहे ॥ १९४ ॥ जिनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है, ज्ञान ही जिनका ऐश्वर्य है तथा जो चित्तकी चिन्तनशक्तिसे भी परे हैं और इन्हीं कारणोंसे जिन्हें परमात्मा कहा जाता है, उन्हीं महादेवजीसे हम वर प्राप्त करेंगे ॥ १९४ ॥
ऐश्वर्यं सकलं यस्मादनुत्पादितमव्ययम् । अबीजाद् बीजसम्भूतं वरं तस्माद् वृणीमहे ॥ १९५ ॥ योगीलोग महादेवजीके समस्त ऐश्वर्यको ही नित्य सिद्ध और अविनाशी बताते हैं। वे कारणरहित हैं और उन्हींसे समस्त कारणोंकी उत्पत्ति हुई है। अतः महादेवजीकी ऐसी महिमा है, इसलिये हम उन्हींसे वर माँगते हैं ॥ १९५ ॥
तमसः परमं ज्योतिस्तपस्तद्वृत्तिनां परम् । यं ज्ञात्वा नानुशोचन्ति वरं तस्माद् वृणीमहे ॥ १९६ ॥
जो अज्ञानान्धकारसे परे चिन्मय परमज्योतिःस्वरूप हैं, तपस्वीजनोंके परम तप हैं तथा जिनका ज्ञान प्राप्त करके ज्ञानी पुरुष कभी शोक नहीं करते हैं, उन्हीं भगवान् शिवसे हम वर प्राप्त करना चाहते हैं ।। १९६ ।। भूतभावनभावज्ञं सर्वभूताभिभावनम् । सर्वगं सर्वदं देवं पूजयामि पुरन्दर ।। १९७ ।। पुरंदर! जो सम्पूर्ण भूतोंके उत्पादक तथा उनके मनोभावोंको जाननेवाले हैं, समस्त प्राणियोंके पराभव (विलय)-के भी जो एकमात्र स्थान हैं तथा जो सर्वव्यापी और सब कुछ देनेमें समर्थ हैं, उन्हीं महादेवजीकी मैं पूजा करता हूँ ।। १९७ ।। हेतुवादैर्विनिर्मुक्तं सांख्ययोगार्थदं परम् । यमुपासन्ति तत्त्वज्ञा वरं तस्माद् वृणीमहे ।। १९८ ।। जो युक्तिवादसे दूर हैं, जो अपने भक्तोंको सांख्य और योगका परम प्रयोजन (आत्यन्तिक दुःखनिवृत्ति और ब्रह्मसाक्षात्कार) प्रदान करनेवाले हैं, तत्त्वज्ञ पुरुष जिनकी सदा उपासना करते हैं, उन्हीं महादेवजीसे हम वरके लिये प्रार्थना करते हैं ।। १९८ ।। मघवन् मधवात्मानं यं वदन्ति सुरेश्वरम् । सर्वभूतगुरुं देवं वरं तस्माद् वृणीमहे ।। १९९ ।। मघवन्! ज्ञानी पुरुष जिन्हें देवेश्वर इन्द्ररूप तथा सम्पूर्ण भूतोंके गुरुदेव बताते हैं, उन्हींसे हम वर लेना चाहते हैं ।। १९९ ।। यः पूर्वमसृजद् देवं ब्रह्माणं लोकभावनम् । अण्डमाकाशमापूर्य वरं तस्माद् वृणीमहे ।। २०० ।। जिन्होंने पूर्वकालमें आकाशव्यापी ब्रह्माण्ड एवं लोकस्रष्टा देवेश्वर ब्रह्माको उत्पन्न किया, उन्हीं महादेवजीसे हम वर प्राप्त करना चाहते हैं ।। २०० ।। अग्निरापोऽनिलः पृथ्वी खं बुद्धिश्च मनो महान् । स्रष्टा चैषां भवेद् योऽन्यो ब्रूहि कः परमेश्वरात् ।। २०१ ।। देवराज! जो अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—इन सबका स्रष्टा हो, वह परमेश्वरसे भिन्न दूसरा कौन पुरुष है? यह बताओ ।। मनो मतिरहंकारस्तन्मात्राणीन्द्रियाणि च । ब्रूहि चैषां भवेच्छक्र कोऽन्योऽस्ति परं शिवात् ।। २०२ ।। शक्र! जो मन, बुद्धि, अहंकार, पञ्चतन्मात्रा और दस इन्द्रिय—इन सबकी सृष्टि कर सके, ऐसा कौन पुरुष है जो भगवान् शिवसे भिन्न अथवा उत्कृष्ट हो? यह बताओ ।। २०२ ।। स्रष्टारं भुवनस्येह वदन्तीह पितामहम् । आराध्य स तु देवेशमश्नुते महतीं श्रियम् ।। २०३ ।।
ज्ञानी महात्मा ब्रह्माजीको ही सम्पूर्ण विश्वका स्रष्टा बताते हैं। परंतु वे देवेश्वर
महादेवजीकी आराधना करके ही महान् ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं ॥ २०३ ॥
भगवत्युत्तमैश्वर्यं ब्रह्मविष्णुपुरोगमम् ।
विद्यते वै महादेवाद् ब्रूहि कः परमेश्वरात् ॥ २०४ ॥
जिस भगवान्में ब्रह्मा और विष्णुसे भी उत्तम ऐश्वर्य है, वह परमेश्वर महादेवके सिवा
दूसरा कौन है? यह बताओ तो सही ॥ २०४ ॥
दैत्यदानवमुख्यानामाधिपत्यारिमर्दनात् ।
कोऽन्यः शक्नोति देवेशाद् दितेः सम्पादितुं सुतान् ॥ २०५ ॥
दैत्यों और दानवोंके प्रमुख वीर हिरण्यकशिपु आदिमें जो तीनों लोकोंपर आधिपत्य
स्थापित करने और अपने शत्रुओंको कुचल देनेकी शक्ति सुनी गयी है, उसपर दृष्टिपात
करके मैं यह पूछ रहा हूँ कि देवेश्वर महादेवके सिवा दूसरा कौन ऐसा है जो दितिके पुत्रोंको
इस प्रकार अनुपम ऐश्वर्यसे सम्पन्न कर सके? ॥
दिक्कालसूर्यतेजांसि ग्रहवाग्विन्दुतारकाः ।
विद्धि त्वेते महादेवाद् ब्रूहि कः परमेश्वरात् ॥ २०६ ॥
दिशा, काल, सूर्य, अग्नि, अन्य ग्रह, वायु, चन्द्रमा और नक्षत्र—ये महादेवजीकी
कृपासे ही ऐसे प्रभावशाली हुए हैं। इस बातको तुम जानते हो, अतः तुम्हीं बताओ, परमेश्वर
महादेवजीके सिवा दूसरा कौन ऐसी अचिन्त्य शक्तिसे सम्पन्न है? ॥ २०६ ॥
अथोत्पत्तिविनाशे वा यज्ञस्य त्रिपुरस्य वा ।
दैत्यदानवमुख्यानामाधिपत्यारिमर्दनः ॥ २०७ ॥
यज्ञकी उत्पत्ति और त्रिपुरका विनाश भी उन्हींके द्वारा सम्पन्न हुआ है। प्रधान-प्रधान
दैत्यों और दानवोंको आधिपत्य प्रदान करने और शत्रुमर्दनाकी शक्ति देनेवाले भी वे ही
हैं ॥ २०७ ॥
किं चात्र बहुभिः सूक्तैर्हेतुवादैः पुरंदर ।
सहस्रनयनं दृष्ट्वा त्वामेव सुरसत्तम ॥ २०८ ॥
पूजितं सिद्धगन्धर्वैर्देवैश्च ऋषिभिस्तथा ।
देवदेवप्रसादेन तत् सर्वं कुशिकोत्तम ॥ २०९ ॥
सुरश्रेष्ठ पुरंदर! कौशिकवंशावतंस इन्द्र! यहाँ बहुत-सी युक्तियुक्त सूक्तियोंको सुनानेसे
क्या लाभ? आप जो सहस्र नेत्रोंसे सुशोभित हैं तथा आपको देखकर सिद्ध, गन्धर्व, देवता
और ऋषि जो सम्मान प्रदर्शित करते हैं, वह सब देवाधिदेव महादेवके प्रसादसे ही सम्भव
हुआ है ॥ २०८-२०९ ॥
अव्यक्तमुक्तकेशाय सर्वगस्येदमात्मकम् ।
चेतनाचेतनाद्येषु शक्र विद्धि महेश्वरात् ॥ २१० ॥
इन्द्र! चेतन और अचेतन आदि समस्त पदार्थोंमें 'यह ऐसा है' इस प्रकारका जो लक्षण देखा जाता है, वह सब अव्यक्त, मुक्तकेश एवं सर्वव्यापी महादेवजीके ही प्रभावसे प्रकट है; अतएव सब कुछ महेश्वरसे ही उत्पन्न हुआ है—ऐसा समझो ॥ २१० ॥
भुवाद्येषु महान्तेषु लोकालोकान्तरेषु च । द्वीपस्थानेषु मेरोश्च विभवेष्वन्तरेषु च ॥ २११ ॥ भगवन् मघवन् देवं वदन्ते तत्त्वदर्शिनः ।
भगवान् देवराज! भूलोकसे लेकर महर्लोकतक समस्त लोक-लोकान्तरोंमें, पर्वतके मध्यभागमें, सम्पूर्ण द्वीपस्थानोंमें, मेरु पर्वतके वैभवपूर्ण प्रान्तोंमें सर्वत्र ही तत्त्वदर्शी पुरुष महादेवजीकी स्थिति बताते हैं ॥ २११ १/२ ॥
यदि देवाः सुराः शक्र पश्यन्त्यन्यां भवाद् गतिम् ॥ २१२ ॥ किं न गच्छन्ति शरणं मर्दिताश्चासुरैः सुराः ।
शक्र! यदि तेजस्वी देवगण महादेवजीके सिवा दूसरा कोई सहारा देखते हैं तो असुरोंद्वारा कुचले जानेपर वे उसीकी शरणमें क्यों नहीं जाते हैं? ॥ २१२ १/२ ॥
अभिघातेषु देवानां सयक्षोरगरक्षसाम् ॥ २१३ ॥ परस्परविनाशेषु स्वस्थानैश्वर्यदो भवः ।
देवता, यक्ष, नाग और राक्षस—इनमें जब संघर्ष होता और परस्पर एक-दूसरेसे विनाशका अवसर उपस्थित होता है तब उन्हें अपने स्थान और ऐश्वर्यकी प्राप्ति करानेवाले भगवान् शिव ही हैं ॥ २१३ १/२ ॥
अन्धकस्याथ शुक्रस्य दुन्दुभेर्महिषस्य च ॥ २१४ ॥ यक्षेन्द्रबलरक्षःसु निवातकवचेषु च । वरदानावघाताय ब्रूहि कोऽन्यो महेश्वरात् ॥ २१५ ॥
बताओ तो सही, अन्धकको, शुक्रको, दुन्दुभिको, महिषको, यक्षराज कुबेरकी सेनाके राक्षसोंको तथा निवातकवच नामक दानवोंको वरदान देने और उनका विनाश करनेमें भगवान् महेश्वरको छोड़कर दूसरा कौन समर्थ है? ॥ २१४-२१५ ॥
सुरासुरगुरोर्वक्त्रे कस्य रेत: पुरा हुतम् । कस्य वान्यस्य रेतस्तद् येन हैमो गिरिः कृतः ॥ २१६ ॥
पूर्वकालमें महादेवजीके सिवा दूसरे किस देवताके वीर्यकी देवासुरगुरु अग्निके मुखमें आहुति दी गयी थी? जिसके द्वारा सुवर्णमय मेरुगिरिका निर्माण हुआ, वह भगवान् शिवके सिवा और किस देवताका वीर्य था? ॥ २१६ ॥
दिग्वासाः कीर्त्यते कोऽन्यो लोके कश्चोध्वरेतसः । कस्य चार्धे स्थिता कान्ता अनङ्गः केन निर्जितः ॥ २१७ ॥
दूसरा कौन दिगम्बर कहलाता है? संसारमें दूसरा कौन ऊर्ध्वरेता है? किसके आधे शरीरमें धर्मपत्नी स्थित रहती है तथा किसने कामदेवको परास्त किया है? ॥
ब्रूहीन्द्र परमं स्थानं कस्य देवैः प्रशस्यते ।