महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 179, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतात! पहले सत्ययुगमें एक महायशस्वी ऋषि हो गये हैं, जो व्याघ्रपादनामसे प्रसिद्ध थे। वे वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् थे ॥ १११ १/२ ॥ तस्याहमभवं पुत्रो धौम्यश्चापि ममानुजः ॥ ११२ ॥ कस्यचित् त्वथ कालस्य धौम्येन सह माधव। आगच्छमाश्रमं क्रीडन् मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ ११३ ॥ उन्हींका मैं पुत्र हूँ। मेरे छोटे भाईका नाम धौम्य है। माधव! किसी समय मैं धौम्यके साथ खेलता हुआ पवित्रात्मा मुनियोंके आश्रमपर आया ॥ ११२-११३ ॥ तत्रापि च मया दृष्टा दुह्यमाना पयस्विनी। लक्षितं च मया क्षीरं स्वादुतो ह्यमृतोपमम् ॥ ११४ ॥ वहाँ मैंने देखा, एक दुधारू गाय दुही जा रही थी। वहीं मैंने दूध देखा, जो स्वादमें अमृतके समान होता है ॥ ११४ ॥ ततोऽहमब्रुवं बाल्याज्जननीमात्मनस्तथा। क्षीरोदनसमायुक्तं भोजनं हि प्रयच्छ मे ॥ ११५ ॥ तब मैंने बालस्वभाववश अपनी मातासे कहा—'माँ! मुझे खानेके लिये दूध-भात दो' ॥ ११५ ॥ अभावाच्चैव दुग्धस्य दुःखिता जननी तदा। ततः पिष्टं समालोड्य तोयेन सह माधव ॥ ११६ ॥ आवयोः क्षीरमित्येव पानार्थं समुपानयत्। घरमें दूधका अभाव था; इसलिये मेरी माताको उस समय बड़ा दुःख हुआ। माधव! तब वह पानीमें आटा घोलकर ले आयी और दूध कहकर दोनों भाइयोंको पीनेके लिये दे दिया ॥ ११६ १/२ ॥ अथ गव्यं पयस्तात कदाचित् प्राशितं मया ॥ ११७ ॥ पित्राहं यज्ञकाले हि नीतो ज्ञातिकुलं महत्। तत्र सा क्षरते देवी दिव्या गौः सुरनन्दिनी ॥ ११८ ॥ तात! उसके पहले एक दिन मैंने गायका दूध पीया था। पिताजी यज्ञके समय एक बड़े भारी धनी कुटुम्बीके घर मुझे ले गये थे। वहाँ दिव्य सुरभी गाय दूध दे रही थी ॥ ११७-११८ ॥ तस्याहं तत् पयः पीत्वा रसेन ह्यमृतोपमम्। ज्ञात्वा क्षीरगुणांश्चैव उपलभ्य हि सम्भवम् ॥ ११९ ॥ उस अमृतके समान स्वादिष्ट दूधको पीकर मैं यह जान गया था कि दूधका स्वाद कैसा होता है और उसकी उपलब्धि किस प्रकार होती है ॥ ११९ ॥ स च पिष्टरसस्तात न मे प्रीतिमुपावहत्। ततोऽहमब्रुवं बाल्याज्जननीमात्मनस्तदा ॥ १२० ॥