महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतात! इसीलिये वह आटेका रस मुझे प्रिय नहीं लगा; अतः मैंने बालस्वभाववश ही अपनी मातासे कहा— ।।
नेदं क्षीरोदनं मातर्यत् त्वं मे दत्तवत्यसि । ततो मामब्रवीन्माता दुःखशोकसमन्विता ॥ १२१ ॥ पुत्रस्नेहात् परिष्वज्य मूर्ध्नि चाघ्राय माधव । कुतः क्षीरोदनं वत्स मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ १२२ ॥ वने निवसतं नित्यं कन्दमूलफलाशिनाम् ।
‘माँ! तुमने मुझे जो दिया है, यह दूध-भात नहीं है।’ माधव! तब मेरी माता दुःख और शोकमें मग्न हो पुत्रस्नेहवश मुझे हृदयसे लगाकर मेरा मस्तक सूँघती हुई मुझसे बोली—‘बेटा! जो सदा वनमें रहकर कन्द, मूल और फल खाकर निर्वाह करते हैं, उन पवित्र अन्तःकरणवाले मुनियोंको भला दूध-भात कहाँसे मिल सकता है? ।। १२१-१२२ १/२ ।।
आस्थितानां नदीं दिव्यां वालखिल्यैर्निषेविताम् ॥ १२३ ॥ कुतः क्षीरं वनस्थानां मुनीनां गिरिवासिनाम् ।
‘जो बालखिल्योंद्वारा सेवित दिव्य नदी गंगाका सहारा लिये बैठे हैं, पर्वतों और वनोंमें रहनेवाले उन मुनियोंको दूध कहाँसे मिलेगा? ।। १२३ १/२ ।।
पावनानां वनाशानां वनाश्रमनिवासिनाम् ॥ १२४ ॥ ग्राम्याहारनिवृत्तानामारण्यफलभोजिनाम् ।
‘जो पवित्र हैं, वनमें ही होनेवाली वस्तुएँ खाते हैं, वनके आश्रमोंमें ही निवास करते हैं, ग्रामीण आहारसे निवृत्त होकर जंगलके फल-मूलोंका ही भोजन करते हैं, उन्हें दूध कैसे मिल सकता है? ।। १२४ १/२ ।।
नास्ति पुत्र पयोऽरण्ये सुरभीगोत्रवर्जिते ॥ १२५ ॥ नदीगह्वरशैलेषु तीर्थेषु विविधेषु च । तपसा जप्यनित्यानां शिवो नः परमा गतिः ॥ १२६ ॥
‘बेटा! यहाँ सुरभी गायकी कोई संतान नहीं है, अतः इस जंगलमें दूधका सर्वथा अभाव है। नदी, कन्दरा, पर्वत और नाना प्रकारके तीर्थोंमें तपस्यापूर्वक जपमें तत्पर रहनेवाले हम ऋषि-मुनियोंके भगवान् शंकर ही परम आश्रय हैं ।। १२५-१२६ ।।
अप्रसाद्य विरूपाक्षं वरदं स्थाणुमव्ययम् । कुतः क्षीरोदनं वत्स सुखानि वसनानि च ॥ १२७ ॥
‘वत्स! जो सबको वर देनेवाले, नित्य स्थिर रहनेवाले और अविनाशी ईश्वर हैं, उन भगवान् विरूपाक्षको प्रसन्न किये बिना दूध-भात और सुखदायक वस्त्र कैसे मिल सकते हैं? ।। १२७ ।।
तं प्रपद्य सदा वत्स सर्वभावेन शङ्करम् । तत्प्रसादाच्च कामेभ्यः फलं प्राप्स्यसि पुत्रक ॥ १२८ ॥