महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 182, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंको हि तत्त्वेन तद् वेद ईशस्य चरितं शुभम् । कृतवान् यानि रूपाणि देवदेवः पुरा किल । क्रीडते च तथा शर्वः प्रसीदति यथा च वै ॥ १३६ ॥ पूर्वकालमें देवाधिदेव महादेवने जो-जो रूप धारण किये हैं, ईश्वरके उस शुभ चरित्रको कौन यथार्थरूपसे जानता है? वे कैसे क्रीडा करते हैं और किस तरह प्रसन्न होते हैं? यह कौन समझ सकता है ॥ १३६ ॥
हृदिस्थः सर्वभूतानां विश्वरूपो महेश्वरः । भक्तानामनुकम्पार्थं दर्शनं च यथाश्रुतम् ॥ १३७ ॥ मुनीनां ब्रुवतां दिव्यमीशानचरितं शुभम् । वे विश्वरूपधारी महेश्वर समस्त प्राणियोंके हृदयमन्दिरमें विराजमान हैं। वे भक्तोंपर कृपा करनेके लिये किस प्रकार दर्शन देते हैं? यह शंकरजीके दिव्य एवं कल्याणमय चरित्रका वर्णन करनेवाले मुनियोंके मुखसे जैसा मैंने सुना है वह बताऊँगी ॥ १३७ १/२ ॥
कृतवान् यानि रूपाणि कथितानि दिवौकसैः ॥ १३८ ॥ अनुग्रहार्थं विप्राणां शृणु वत्स समासतः । तानि ते कीर्तयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ १३९ ॥ वत्स! उन्होंने ब्राह्मणोंपर अनुग्रह करनेके लिये देवताओंद्वारा कथित जो-जो रूप ग्रहण किये हैं, उन्हें संक्षेपसे सुनो। वत्स! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वे सारी बातें मैं तुम्हें बताऊँगी ॥ १३८-१३९ ॥
अम्बोवाच
ब्रह्मविष्णुसुरेन्द्राणां रुद्रादित्याश्विनामपि । विश्वेषामपि देवानां वपुर्धारयते भवः ॥ १४० ॥ ऐसा कहकर माता फिर कहने लगी—भगवान् शिव ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार तथा सम्पूर्ण देवताओंका शरीर धारण करते हैं ॥ १४० ॥
नराणां देवनारीणां तथा प्रेतपिशाचयोः । किरातशबराणां च जलजानामनेकशः ॥ १४१ ॥ करोति भगवान् रूपमाटव्यशबराण्यपि । वे भगवान् पुरुषों, देवांगनाओं, प्रेतों, पिशाचों, किरातों, शबरों, अनेकानेक जलजन्तुओं तथा जंगली भीलोंके भी रूप ग्रहण कर लेते हैं ॥ १४१ १/२ ॥
कूर्मो मत्स्यस्तथा शङ्खः प्रवालाङ्कुरभूषणः ॥ १४२ ॥ यक्षराक्षससर्पाणां दैत्यदानवयोरपि । वपुर्धारयते देवो भूयश्च विलवासिनाम् ॥ १४३ ॥