महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 183, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंकूर्म, मत्स्य, शंख, नये-नये पल्लवोंके अंकुरसे सुशोभित होनेवाले वसंत आदिके रूपोंमें भी वे ही प्रकट होते हैं। वे महादेवजी यक्ष, राक्षस, सर्प, दैत्य, दानव और पातालवासियोंका भी रूप धारण करते हैं॥ १४२-१४३ ॥
व्याघ्रसिंहमृगाणां च तरक्ष्वृक्षपतत्रिणाम् ।
उलूकश्वशृगालानां रूपाणि कुरुतेऽपि च ॥ १४४ ॥
वे व्याघ्र, सिंह, मृग, तरक्षु, रीछ, पक्षी, उल्लू, कुत्ते और सियारोंके भी रूप धारण कर लेते हैं॥ १४४ ॥
हंसकाकमयूराणां कृकलासकसारसाम् ।
रूपाणि च बलाकानां गृध्रचक्राङ्गयोरपि ॥ १४५ ॥
करोति वा स रूपाणि धारयत्यपि पर्वतम् ।
गोरूपं च महादेवो हस्त्यश्वोष्ट्रखराकृतिः ॥ १४६ ॥
हंस, काक, मोर, गिरगिट, सारस, बगुले, गीध और चक्रांग (सविशेष)-के भी रूप वे महादेवजी धारण करते हैं। पर्वत, गाय, हाथी, घोड़े, ऊँट और गदहेके आकारमें भी वे प्रकट हो जाते हैं॥ १४५-१४६ ॥
छागशार्दूलरूपश्च अनेकमृगरूपधृक् ।
अण्डजानां च दिव्यानां वपुर्धारयते भवः ॥ १४७ ॥
वे बकरे और शार्दूलके रूपमें भी उपलब्ध होते हैं। नाना प्रकारके मृगों—वन्य पशुओंके भी रूप धारण करते हैं तथा भगवान् शिव दिव्य पक्षियोंके भी रूप धारण कर लेते हैं॥ १४७ ॥
दण्डी छत्री च कुण्डी च द्विजानां धारणस्तथा ।
षण्मुखो वै बहुमुखस्त्रिनेत्रो बहुशीर्षकः ॥ १४८ ॥
वे द्विजोंके चिह्न दण्ड, छत्र और कुण्ड (कमण्डलु) धारण करते हैं। कभी छः मुख और कभी बहुत-से मुखवाले हो जाते हैं। कभी तीन नेत्र धारण करते हैं। कभी बहुत-से मस्तक बना लेते हैं॥ १४८ ॥
अनेककटिपादश्च अनेकोदरवक्त्रधृक् ।
अनेकपाणिपार्श्वश्च अनेकगणसंवृतः ॥ १४९ ॥
उनके पैर और कटिभाग अनेक हैं। वे बहुसंख्यक पेट और मुख धारण करते हैं। उनके हाथ और पार्श्वभाग भी अनेकानेक हैं। अनेक पार्षदगण उन्हें सब ओरसे घेरे रहते हैं॥ १४९ ॥
ऋषिगन्धर्वरूपश्च सिद्धचारणरूपधृक् ।
भस्मपाण्डुरगात्रश्च चन्द्रार्धकृतभूषणः ॥ १५० ॥
वे ऋषि और गन्धर्वरूप हैं। सिद्ध और चारणोंके भी रूप धारण करते हैं। उनका सारा शरीर भस्म रमाये रहनेसे सफेद जान पड़ता है। वे ललाटमें अर्द्धचन्द्रका आभूषण धारण