भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 184

करते हैं ।। १५० ।। अनेकरावसंघुष्टश्चानेकस्तुतिसंस्कृतः । सर्वभूतान्तकः सर्वः सर्वलोकप्रतिष्ठितः ।। १५१ ।। उनके पास अनेक प्रकारके शब्दोंका घोष होता रहता है। वे अनेक प्रकारकी स्तुतियोंसे सम्मानित होते हैं, समस्त प्राणियोंका संहार करते हैं, स्वयं सर्वस्वरूप हैं तथा सबके अन्तर्रात्मारूपसे सम्पूर्ण लोकोंमें प्रतिष्ठित हैं ।। १५१ ।। सर्वलोकान्तरात्मा च सर्वगः सर्ववाद्यपि । सर्वत्र भगवान् ज्ञेयो हृदिस्थः सर्वदेहिनाम् ।। १५२ ।। वे सम्पूर्ण जगत्‌के अन्तर्रात्मा, सर्वव्यापी और सर्ववादी हैं, उन भगवान् शिवको सर्वत्र और सम्पूर्ण देहधारियोंके हृदयमें विराजमान जानना चाहिये ।। १५२ ।। यो हि यं कामयेत् कामं यस्मिन्नर्थेऽर्च्यते पुनः । तत् सर्वं वेत्ति देवेशस्तं प्रपद्य यदिच्छसि ।। १५३ ।। जो जिस मनोरथको चाहता है और जिस उद्देश्यसे उसके द्वारा भगवान्‌की अर्चना की जाती है, देवेश्वर भगवान् शिव वह सब जानते हैं। इसलिये यदि तुम कोई वस्तु चाहते हो तो उन्हींकी शरण लो ।। १५३ ।। नन्दते कुप्यते चापि तथा हुंकारयत्यपि । चक्री शूली गदापाणिर्मुसली खड्गपट्टिशी ।। १५४ ।। वे कभी आनन्दित रहकर आनन्द देते, कभी कुपित होकर कोप प्रकट करते और कभी हुंकार करते हैं, अपने हाथोंमें चक्र, शूल, गदा, मुसल, खड्ग और पट्टिश धारण करते हैं ।। १५४ ।। भूधरो नागमौञ्जी च नागकुण्डलकुण्डली । नागयज्ञोपवीती च नागचर्मोत्तरच्छदः ।। १५५ ।। वे धरणीधर शेषनागरूप हैं, वे नागकी मेखला धारण करते हैं। नागमय कुण्डलसे कुण्डलधारी होते हैं। नागोंका ही यज्ञोपवीत धारण करते हैं तथा नागचर्मका ही उत्तरीय (चादर) लिये रहते हैं ।। १५५ ।। हसते गायते चैव नृत्यते च मनोहरम् । वादयत्यपि वाद्यानि विचित्राणि गणैर्युतः ।। १५६ ।। वे अपने गणोंके साथ रहकर हँसते हैं, गाते हैं, मनोहर नृत्य करते हैं और विचित्र बाजे भी बजाते हैं ।। १५६ ।। वल्गते जृम्भते चैव रुदते रोदयत्यपि । उन्मत्तमत्तरूपं च भाषते चापि सुस्वरः ।। १५७ ।। भगवान् रुद्र उछलते-कूदते हैं। जँभाई लेते हैं। रोते हैं, रुलाते हैं। कभी पागलों और मतवालोंकी तरह बातें करते हैं और कभी मधुर स्वरसे उत्तम वचन बोलते हैं ।। १५७ ।।