महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 174, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंआस्ते देव्या सदाचिन्त्यो यं प्रार्थयसि शत्रुहन् ॥ ७२ ॥
शत्रुनाशक श्रीकृष्ण! आप जिनकी प्रार्थना करते हैं, वे तेज और तपस्याकी निधि अचिन्त्य भगवान् शंकर यहाँ शम आदि शुभभावोंकी सृष्टि और काम आदि अशुभ भावोंका संहार करते हुए देवी पार्वतीके साथ सदा विराजमान रहते हैं ॥ ७१-७२ ॥
हिरण्यकशिपुर्योऽभूद् दानवो मेरुकम्पनः ।
तेन सर्वामरैश्वर्यं शर्वात् प्राप्तं समाबुर्दम् ॥ ७३ ॥
पहले जो मेरुपर्वतको भी कम्पित कर देनेवाला हिरण्यकशिपु नामक दानव हुआ था, उसने भगवान् शंकरसे एक अर्बुद (दस करोड़) वर्षोंतकके लिये सम्पूर्ण देवताओंका ऐश्वर्य प्राप्त किया था ॥ ७३ ॥
तस्यैव पुत्रप्रवरो मन्दारो नाम विश्रुतः ।
महादेववराच्चक्रं वर्षाबुर्दमयोधयत् ॥ ७४ ॥
उसीका श्रेष्ठ पुत्र मन्दार नामसे विख्यात हुआ, जो महादेवजीके वरसे एक अर्बुद वर्षोंतक इन्द्रके साथ युद्ध करता रहा ॥ ७४ ॥
विष्णोश्चक्रं च तद् घोरं वज्रमाखण्डलस्य च ।
शीर्णं पुराभवत् तात ग्रहस्याङ्गेषु केशव ॥ ७५ ॥
तात केशव! भगवान् विष्णुका वह भयंकर चक्र तथा इन्द्रका वज्र भी पूर्वकालमें उस ग्रहके अंगोंपर पुराने तिनकोंके समान जीर्ण-शीर्ण-सा हो गया था ॥ ७५ ॥
यत् तद् भगवता पूर्वं दत्तं चक्रं तवानघ ।
जलान्तरचरं हत्वा दैत्यं च बलगर्वितम् ॥ ७६ ॥
उत्पादितं वृषाङ्केन दीप्तज्वलनसंनिभम् ।
दत्तं भगवता तुभ्यं दुर्धर्षं तेजसाद्भुतम् ॥ ७७ ॥
निष्पाप श्रीकृष्ण! पूर्वकालमें जलके भीतर रहनेवाले गर्वीले दैत्यको मारकर भगवान् शंकरने आपको जो चक्र प्रदान किया था, उस अग्निके समान तेजस्वी शस्त्रको स्वयं भगवान् वृषध्वजने ही उत्पन्न किया और आपको दिया था, वह अस्त्र अद्भुत तेजसे युक्त एवं दुर्धर्ष है ॥ ७६-७७ ॥
न शक्यं द्रष्टुमन्येन वर्जयित्वा पिनाकिनम् ।
सुदर्शनं भवत्येवं भवेनोक्तं तदा तु तत् ॥ ७८ ॥
सुदर्शनं तदा तस्य लोके नाम प्रतिष्ठितम् ।
तज्जीर्णमभवत् तात ग्रहस्याङ्गेषु केशव ॥ ७९ ॥
पिनाकपाणि भगवान् शंकरको छोड़कर दूसरा कोई उसको देख नहीं सकता था। उस समय भगवान् शंकरने कहा—'यह अस्त्र सुदर्शन (देखनेमें सुगम) हो जाय।' तभीसे संसारमें उसका सुदर्शन नाम प्रचलित हो गया। तात केशव! ऐसा प्रसिद्ध अस्त्र भी उस ग्रहके अंगोंपर जीर्ण-सा हो गया ॥ ७८-७९ ॥