महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयस्मात् परतरं चैव नान्यं पश्यामि भारत । व्याख्यातुं देवदेवस्य शक्तो नामान्यशेषतः ॥ १५ ॥ भारत! उसी ऐश्वर्यके कारण मैं परात्पर श्रीकृष्णके सिवा किसी दूसरेको ऐसा नहीं देखता जो देवाधिदेव महादेवजीके नामोंकी पूर्णरूपसे व्याख्या कर सके ॥ १५ ॥
एष शक्तो महाबाहुर्वक्तुं भगवतो गुणान् । विभूतिं चैव कार्त्स्न्येन सत्यां माहेश्वरीं नृप ॥ १६ ॥ नरेश्वर! ये महाबाहु श्रीकृष्ण ही भगवान् महेश्वरके गुणों तथा उनके यथार्थ ऐश्वर्यका पूर्णतः वर्णन करनेमें समर्थ हैं ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तदा भीष्मो वासुदेवं महायशाः । भवमाहात्म्यसंयुक्तमिदमाह पितामहः ॥ १७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! महायशस्वी पितामह भीष्मने युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर भगवान् वासुदेवके प्रति शंकरजीकी महिमासे युक्त यह बात कही ॥ १७ ॥
भीष्म उवाच
सुरासुरगुरो देव विष्णो त्वं वक्तुमर्हसि । शिवाय विश्वरूपाय यन्मां पृच्छद् युधिष्ठिरः ॥ १८ ॥ भीष्मजी बोले— देवासुरगुरो! विष्णुदेव! राजा युधिष्ठिरने मुझसे जो पूछा है, उस विश्वरूप शिवके माहात्म्यको बतानेके योग्य आप ही हैं ॥ १८ ॥
नाम्नां सहस्रं देवस्य तण्डिना ब्रह्मयोनिना । निवेदितं ब्रह्मलोके ब्रह्मणो यत् पुराभवत् ॥ १९ ॥ द्वैपायनप्रभृतयस्तथा चेमे तपोधनाः । ऋषयः सुव्रता दान्ताः शृण्वन्तु गदतस्तव ॥ २० ॥ पूर्वकालमें ब्रह्मपुत्र तण्डीमुनिके द्वारा ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके समक्ष जिस शिव-सहस्रनामका निरूपण किया गया था, उसीका आप वर्णन करें और ये उत्तम व्रतका पालन करनेवाले व्यास आदि तपोधन एवं जितेन्द्रिय महर्षि आपके मुखसे इसका श्रवण करें ॥
ध्रुवाय नन्दिने होत्रे गोप्त्रे विश्वसृजेऽग्नये । महाभाग्यं विभोर्ब्रूहि मुण्डिनेऽथ कपर्दिने ॥ २१ ॥ जो ध्रुव (कूटस्थ), नन्दी (आनन्दमय), होता, गोप्ता (रक्षक), विश्वस्रष्टा, गार्हपत्य आदि अग्नि, मुण्डी (चूड़ारहित) और कपर्दी (जटाजूटधारी) हैं, उन भगवान् शंकरके महान् सौभाग्यका आप वर्णन कीजिये ॥
वासुदेव उवाच