महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 165, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेवताओंसे लेकर पिशाचतक जिनकी उपासना करते हैं, जो प्रकृतिसे भी परे और पुरुषसे भी विलक्षण हैं, योगवेत्ता तत्त्वदर्शी ऋषि जिनका चिन्तन करते हैं, जो अविनाशी परम ब्रह्म एवं सदसत्स्वरूप हैं, जिन देवाधिदेव प्रजापति शिवने अपने तेजसे प्रकृति और पुरुषको क्षुब्ध करके ब्रह्माजीकी सृष्टि की, उन्हीं देवदेव बुद्धिमान् महादेवजीके गुणोंका वर्णन करनेमें गर्भ, जन्म, जरा और मृत्युसे युक्त कौन मनुष्य समर्थ हो सकता है? ।। को हि शक्तो भवं ज्ञातुं मद्विधः परमेश्वरम् । ऋते नारायणात् पुत्र शङ्खचक्रगदाधरात् ॥ ८ ॥ बेटा! शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् नारायणको छोड़कर मेरे-जैसा कौन पुरुष परमेश्वर शिवके तत्त्वको जान सकता है? ॥ ८ ॥ एष विद्वान् गुणश्रेष्ठो विष्णुः परमदुर्जयः । दिव्यचक्षुर्महातेजा वीक्षते योगचक्षुषा ॥ ९ ॥ ये भगवान् विष्णु सर्वज्ञ, गुणोंमें सबसे श्रेष्ठ, अत्यन्त दुर्जय, दिव्य नेत्रधारी तथा महातेजस्वी हैं। ये योगदृष्टिसे सब कुछ देखते हैं ॥ ९ ॥ रुद्रभक्त्या तु कृष्णेन जगद् व्याप्तं महात्मना । तं प्रसाद्य तदा देवं बदर्यां किल भारत ॥ १० ॥ अर्थात् प्रियतरत्वं च सर्वलोकेषु वै तदा । प्राप्तवानेव राजेन्द्र सुवर्णाक्षान्महेश्वरात् ॥ ११ ॥ भरतनन्दन! रुद्रदेवके प्रति भक्तिके कारण ही महात्मा श्रीकृष्णने सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है। राजन्! कहते हैं कि पूर्वकालमें महादेवजीको बदरिकाश्रममें प्रसन्न करके उन दिव्यदृष्टि महेश्वरसे श्रीकृष्णने सब पदार्थोंकी अपेक्षा प्रियतर भावको प्राप्त कर लिया; अर्थात् वे सम्पूर्ण लोकोंके प्रियतम बन गये ॥ १०-११ ॥ पूर्णं वर्षसहस्रं तु तप्तवानेष माधवः । प्रसाद्य वरदं देवं चराचरगुरुं शिवम् ॥ १२ ॥ इन माधवने वरदायक देवता चराचरगुरु भगवान् शिवको प्रसन्न करते हुए पूर्वकालमें पूरे एक हजार वर्षतक तपस्या की थी ॥ १२ ॥ युगे युगे तु कृष्णेन तोषितो वै महेश्वरः । भक्त्या परमया चैव प्रीतश्चैव महात्मनः ॥ १३ ॥ श्रीकृष्णने प्रत्येक युगमें महेश्वरको संतुष्ट किया है। महात्मा श्रीकृष्णकी परम भक्तिसे वे सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ १३ ॥ ऐश्वर्यं यादृशं तस्य जगद्योनेर्महात्मनः । तदयं दृष्टवान् साक्षात् पुत्रार्थे हरिरच्युतः ॥ १४ ॥ जगत्के कारणभूत परमात्मा शिवका ऐश्वर्य जैसा है, उसे पुत्रके लिये तपस्या करते हुए इन अच्युत श्रीहरिने प्रत्यक्ष देखा है ॥ १४ ॥