भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 167

न गतिः कर्मणां शक्या वेत्तुमीशस्य तत्त्वतः । हिरण्यगर्भप्रमुखा देवाः सेन्द्रा महर्षयः ॥ २२ ॥ न विदुर्यस्य भवनमादित्याः सूक्ष्मदर्शिनः । स कथं नरमात्रेण शक्यो ज्ञातुं सतां गतिः ॥ २३ ॥ **भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**भगवान् शंकरके कर्मोंकी गतिका यथार्थरूपसे ज्ञान होना अशक्य है। ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवता, महर्षि तथा सूक्ष्मदर्शी आदित्य भी जिनके निवासस्थानको नहीं जानते, सत्पुरुषोंके आश्रयभूत उन भगवान् शिवके तत्त्वका ज्ञान मनुष्यमात्रको कैसे हो सकता है? ॥ २२-२३ ॥ तस्याहमसुरघ्नस्य कांश्चिद् भगवतो गुणान् । भवतां कीर्तयिष्यामि व्रतेशाय यथातथम् ॥ २४ ॥ अतः मैं उन असुरविनाशक व्रतेश्वर भगवान् शंकरके कुछ गुणोंका आपलोगोंके समक्ष यथार्थरूपसे वर्णन करूँगा ॥ २४ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा तु भगवान् गुणांस्तस्य महात्मनः । उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा कथयामास धीमतः ॥ २५ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण आचमन करके पवित्र हो बुद्धिमान् परमात्मा शिवके गुणोंका वर्णन करने लगे ॥ २५ ॥

वासुदेव उवाच

शुश्रूषध्वं ब्राह्मणेन्द्रास्त्वं च तात युधिष्ठिर । त्वं चापगेय नामानि शृणुष्वेह कपर्दिने ॥ २६ ॥ **भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**यहाँ बैठे हुए ब्राह्मण-शिरोमणियो! सुनो, तात युधिष्ठिर! और गंगानन्दन भीष्म! आपलोग भी यहाँ भगवान् शंकरके नामोंका श्रवण करें ॥ २६ ॥ यदवाप्तं च मे पूर्वं साम्बहेतोः सुदुष्करम् । यथावद् भगवान् दृष्टो मया पूर्वं समाधिना ॥ २७ ॥ पूर्वकालमें साम्बकी उत्पत्तिके लिये अत्यन्त दुष्कर तप करके मैंने जिस दुर्लभ नामसमूहका ज्ञान प्राप्त किया था और समाधिके द्वारा भगवान् शंकरका जिस प्रकार यथावत्रूपसे साक्षात्कार किया था, वह सब प्रसंग सुना रहा हूँ ॥ २७ ॥ शम्बरे निहते पूर्वं रौक्मिणेयेन धीमता । अतीते द्वादशे वर्षे जाम्बवत्यब्रवीद्धि माम् ॥ २८ ॥ प्रद्युम्नचारुदेष्णादीन् रुक्मिण्या वीक्ष्य पुत्रकान् । पुत्रार्थिनी मामुपेत्य वाक्यमाह युधिष्ठिर ॥ २९ ॥