भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 168

युधिष्ठिर! बुद्धिमान् रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नके द्वारा पूर्वकालमें जब शम्बरासुर मारा गया और वे द्वारकामें आये, तबसे बारह वर्ष व्यतीत होनेके पश्चात् रुक्मिणीके प्रद्युम्न, चारुदेष्ण आदि पुत्रोंको देखकर पुत्रकी इच्छा रखनेवाली जाम्बवती मेरे पास आकर इस प्रकार बोली— ॥ २८-२९ ॥

शूरं बलवतां श्रेष्ठं कान्तरूपमकल्मषम् ।
आत्मतुल्यं मम सुतं प्रयच्छाच्युत माचिरम् ॥ ३० ॥
‘अच्युत! आप मुझे अपने ही समान शूरवीर, बलवानोंमें श्रेष्ठ तथा कमनीय रूप-सौन्दर्यसे युक्त निष्पाप पुत्र प्रदान कीजिये। इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये ॥ ३० ॥
न हि तेऽप्राप्यमस्तीह त्रिषु लोकेषु किंचन ।
लोकान् सृजेस्त्वमपरानिच्छन् यदुकुलोद्वह ॥ ३१ ॥
‘यदुकुलधुरन्धर! आपके लिये तीनों लोकोंमें कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं है। आप चाहें तो दूसरे-दूसरे लोकोंकी सृष्टि कर सकते हैं ॥ ३१ ॥
त्वया द्वादशवर्षाणि व्रतीभूतेन शुष्यता ।
आराध्य पशुभर्तारं रुक्मिण्यां जनिताः सुताः ॥ ३२ ॥
‘आपने बारह वर्षोंतक व्रतपरायण हो अपने शरीरको सुखाकर भगवान् पशुपतिकी आराधना की और रुक्मिणीदेवीके गर्भसे अनेक पुत्र उत्पन्न किये ॥ ३२ ॥
चारुदेष्णः सुचारुश्च चारुवेशो यशोधरः ।
चारुश्रवाश्चारुयशाः प्रद्युम्नः शम्भुरेव च ॥ ३३ ॥
यथा ते जनिताः पुत्रा रुक्मिण्यां चारुविक्रमाः ।
तथा ममापि तनयं प्रयच्छ मधुसूदन ॥ ३४ ॥
‘मधुसूदन! चारुदेष्ण, सुचारु, चारुवेश, यशोधर, चारुश्रवा, चारुयशा, प्रद्युम्न और शम्भु—इन सुन्दर पराक्रमी पुत्रोंको जिस प्रकार आपने रुक्मिणीदेवीके गर्भसे उत्पन्न किया है उसी प्रकार मुझे भी पुत्र प्रदान कीजिये’ ॥ ३३-३४ ॥
इत्येवं चोदितो देव्या तामवोचं सुमध्यमाम् ।
अनुजानीहि मां राज्ञि करिष्ये वचनं तव ॥ ३५ ॥
देवी जाम्बवतीके इस प्रकार प्रेरणा देनेपर मैंने उस सुन्दरीसे कहा—‘रानी! मुझे जानेकी अनुमति दो। मैं तुम्हारी प्रार्थना सफल करूँगा’ ॥ ३५ ॥
सा च मामब्रवीद् गच्छ शिवाय विजयाय च ।
ब्रह्मा शिवः काश्यपश्च नद्यो देवा मनोऽनुगाः ॥ ३६ ॥
क्षेत्रौषध्यो यज्ञवाहाश्छन्दांस्यृषिगणाध्वराः ।
समुद्रा दक्षिणास्तोभा ऋक्षाणि पितरो ग्रहाः ॥ ३७ ॥
देवपत्न्यो देवकन्या देवमातर एव च ।
मन्वन्तराणि गावश्च चन्द्रमाः सविता हरिः ॥ ३८ ॥