भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 169

सावित्री ब्रह्मविद्या च ऋतवो वत्सरास्तथा । क्षणा लवा मुहूर्ताश्च निमेषा युगपर्ययाः ॥ ३९ ॥ रक्षन्तु सर्वत्र गतं त्वां यादव सुखाय च । अरिष्टं गच्छ पन्थानमप्रमत्तो भवानघ ॥ ४० ॥ उसने कहा—‘प्राणनाथ! आप कल्याण और विजय पानेके लिये जाइये। यदुनन्दन! ब्रह्मा, शिव, काश्यप, नदियाँ, मनोऽनुकूल देवगण, क्षेत्र, ओषधियाँ, यज्ञवाह (मन्त्र), छन्द, ऋषिगण, यज्ञ, समुद्र, दक्षिणा, स्तोभ (सामगानपूरक ‘हावु’ ‘हायि’ आदि शब्द), नक्षत्र, पितर, ग्रह, देवपत्नियाँ, देवकन्याएँ और देवमाताएँ, मन्वन्तर, गौ, चन्द्रमा, सूर्य, इन्द्र, सावित्री, ब्रह्मविद्या, ऋतु, वर्ष, क्षण, लव, मुहूर्त, निमेष और युग—ये सर्वत्र आपकी रक्षा करें। आप अपने मार्गपर निर्विघ्न यात्रा करें और अनघ! आप सतत सावधान रहें’ ॥ ३६—४० ॥

एवं कृतस्वस्त्ययनस्तयाहं ततोऽभ्यनुज्ञाय नरेन्द्रपुत्रीम् । पितुः समीपं नरसत्तमस्य मातुश्च राज्ञश्च तथाऽऽहुकस्य ॥ ४१ ॥ गत्वा समावेद्य यदब्रवीन्मां विद्याधरेन्द्रस्य सुता भृशार्ता । तानभ्यनुज्ञाय तदातिदुःखाद् गदं तथैवातिबलं च रामम् । अथोचतुः प्रीतियुतौ तदानीं तपःसमृद्धिर्भवतोऽस्त्वविघ्नम् ॥ ४२ ॥ इस तरह जाम्बवतीके द्वारा स्वस्तिवाचनके पश्चात् मैं उस राजकुमारीकी अनुमति ले नरश्रेष्ठ पिता वसुदेव, माता देवकी तथा राजा उग्रसेनके समीप गया। वहाँ जाकर विद्याधरराजकुमारी जाम्बवतीने अत्यन्त आर्त होकर मुझसे जो प्रार्थना की थी वह सब मैंने बताया और उन सबसे तपके लिये जानेकी आज्ञा ली। गद और अत्यन्त बलवान् बलरामजीसे विदा माँगी। उन दोनोंने बड़े दुःखसे अत्यन्त प्रेमपूर्वक उस समय मुझसे कहा—‘भाई! तुम्हारी तपस्या निर्विघ्न पूर्ण हो’ ॥ ४१-४२ ॥

प्राप्यानुज्ञां गुरुजनादहं तार्क्ष्यमचिन्तयम् । सोऽवहद्धिमवन्तं मां प्राप्य चैनं व्यसर्जयम् ॥ ४३ ॥ गुरुजनोंकी आज्ञा पाकर मैंने गरुडका चिन्तन किया। उसने (आकर) मुझे हिमालयपर पहुँचा दिया। वहाँ पहुँचकर मैंने गरुडको विदा कर दिया ॥ ४३ ॥

तत्राहमद्भुतान् भावानपश्यं गिरिसत्तमे । क्षेत्रं च तपसां श्रेष्ठं पश्याम्यद्भुतमुत्तमम् ॥ ४४ ॥