भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 170

मैंने उस श्रेष्ठ पर्वतपर वहाँ अद्भुत भाव देखे। मुझे वहाँका स्थान तपस्याके लिये अद्भुत, उत्तम और श्रेष्ठ क्षेत्र दिखायी दिया।। ४४ ।। दिव्यं वैयाघ्रपद्यस्य उपमन्योर्महात्मनः। पूजितं देवगन्धर्वैर्ब्राह्म्या लक्ष्म्या समावृतम् ॥ ४५ ॥ वह व्याघ्रपादके पुत्र महात्मा उपमन्युका दिव्य आश्रम था, जो ब्राह्मी शोभासे सम्पन्न तथा देवताओं और गन्धर्वोंद्वारा सम्मानित था।। ४५ ।। धवककुभकदम्बनारिकेलैः कुरबककेतकजम्बुपाटलाभिः। वटवरुणकवत्सनाभबिल्वैः सरलकपित्थप्रियालसालतालैः ॥ ४६ ॥ बदरीकुन्दपुन्नागैरशोकाम्रातिमुक्तकैः। मधूकैः कोविदारैश्च चम्पकैः पनसैस्तथा ॥ ४७ ॥ वन्यैर्बहुविधैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युतम्। पुष्पगुल्मलताकीर्णं कदलीषण्डशोभितम् ॥ ४८ ॥ धव, ककुभ (अर्जुन), कदम्ब, नारियल, कुरबक, केतक, जामुन, पाटल, बड़, वरुणक, वत्सनाभ, बिल्व, सरल, कपित्थ, प्रियाल, साल, ताल, बेर, कुन्द, पुन्नाग, अशोक, आम्र, अतिमुक्त, महुआ, कोविदार, चम्पा तथा कटहल आदि बहुत-से फल-फूल देनेवाले विविध वन्य वृक्ष उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे। फूलों, गुल्मों और लताओंसे वह व्याप्त था। केलेके कुंज उसकी शोभाको और भी बढ़ा रहे थे।। ४६-४८ ।। नानाशकुनिसम्भोज्यैः फलैर्वृक्षैरलंकृतम्। यथास्थानविनिक्षिप्तैर्भूषितं भस्मराशिभिः ॥ ४९ ॥ नाना प्रकारके पक्षियोंके खाने योग्य फल और वृक्ष उस आश्रमके अलंकार थे। यथास्थान रखी हुई भस्मराशिसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी।। ४९ ।। रुरुवानरशार्दूलसिंहद्वीपिसमाकुलम्। कुरङ्गबर्हिणाकीर्णं मार्जारभुजगावृतम्। पूगैश्च मृगजातीनां महिषर्क्षनिषेवितम् ॥ ५० ॥ रुरु, वानर, शार्दूल, सिंह, चीते, मृग, मयूर, बिल्ली, सर्प, विभिन्न जातिके मृगोंके झुंड, भैंस तथा रीछोंसे उस आश्रमका निकटवर्ती वन भरा हुआ था।। ५० ।। सकृत्प्रभिन्नैश्च गजैर्विभूषितं प्रहृष्टनानाविधपक्षिसंवितम्। सुपुष्पितैरम्बुधरप्रकाशै- र्महीरुहाणां च वनैर्विचित्रैः ॥ ५१ ॥

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