भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें लक्ष्मी और रुक्मिणीका संवादविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २३ श्लोक हैं)

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्वादशोऽध्यायः

कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान

(युधिष्ठिर उवाच

प्रायश्चित्तं कृतघ्नानां प्रतिब्रूहि पितामह ।
मातापितॄन् गुरूंश्चैव येऽवमन्यन्ति मोहिताः ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जो मोहवश माता-पिता तथा गुरुजनोंका अपमान करते हैं उन कृतघ्नोंके लिये क्या प्रायश्चित्त है? यह बताइये ।।
ये चाप्यन्ये परे तात कृतघ्ना निरपत्रपाः ।
तेषां गतिं महाबाहो श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
तात! महाबाहो! दूसरे भी जो निर्लज्ज एवं कृतघ्न हैं उनकी गति कैसी होती है? यह सब मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ।।

भीष्म उवाच

कृतघ्नानां गतिस्तात नरके शाश्वतीः समाः ।
मातापितृगुरूणां च ये न तिष्ठन्ति शासने ।।
कृमिकीटपिपीलेषु जायन्ते स्थावरेषु च ।
दुर्लभो हि पुनस्तेषां मानुष्ये पुनरुद्भवः ॥
**भीष्मजीने कहा—**तात! कृतघ्नोंकी एक ही गति है, सदाके लिये नरकमें पड़े रहना। जो माता-पिता तथा गुरुजनोंकी आज्ञाके अधीन नहीं रहते हैं वे कृमि, कीट, पिपीलिका और वृक्ष आदिकी योनियोंमें जन्म लेते हैं। मनुष्ययोनिमें फिर जन्म होना उनके लिये दुर्लभ हो जाता है ।।
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
वत्सनाभो महाप्राज्ञो महर्षिः संशितव्रतः ॥
वल्मीकभूतो ब्रह्मर्षिस्तप्यते सुमहत्तपः ।
इस विषयमें जानकार मनुष्य इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण देते हैं। वत्सनाभ नामवाले एक परम बुद्धिमान् महर्षि कठोर व्रतके पालनमें लगे थे। उनके शरीरपर दीमकोंने घर बना लिया था; अतः वे ब्रह्मर्षि बाँबीरूप हो गये थे और उसी अवस्थामें वे बड़ी भारी तपस्या करते थे ।।
तस्मिंश्च तप्यति तपो वासवो भरतर्षभ ।।

ववर्ष सुमहद् वर्षं सविद्युत्स्तनयित्नुमान् ।
भरतश्रेष्ठ! उनके तप करते समय इन्द्रने बिजलीकी चमक और मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके साथ बड़ी भारी वर्षा आरम्भ कर दी॥
तत्र सप्ताहवर्षं तु मुमुचे पाकशासनः ।
निमीलिताक्षस्तद्वर्षं प्रत्यगृह्णीत वै द्विजः ॥
पाकशासन इन्द्रने लगातार एक सप्ताहतक वहाँ जल बरसाया और वे ब्राह्मण वत्सनाभ आँख मूँदकर चुपचाप उस वर्षाका आघात सहन करते रहे॥
तस्मिन् पतति वर्षे तु शीतवातसमन्विते ।
विशीर्णध्वस्तशिखरो वल्मीकोऽशनिताडितः ॥
सर्दी और हवासे युक्त वह वर्षा हो ही रही थी कि बिजलीसे आहत हो उस वल्मीक (बाँबी)-का शिखर टूटकर बिखर गया॥
ताड्यमाने ततस्तस्मिन् वत्सनाभे महात्मनि ।
कारुण्यात् तस्य धर्मः स्वमानृशंस्यमथाकरोत् ॥
अब महामना वत्सनाभपर उस वर्षाकी चोट पड़ने लगी। यह देख धर्मके हृदयमें करुणा भर आयी और उन्होंने वत्सनाभपर अपनी सहज दया प्रकट की॥
चिन्तयानस्य ब्रह्मर्षि तपन्तमधिधार्मिकम् ।
अनुरूपा मतिः क्षिप्रमुपजाता स्वभावजा ॥
तपस्यामें लगे हुए उन अत्यन्त धार्मिक ब्रह्मर्षिकी चिन्ता करते हुए धर्मके हृदयमें शीघ्र ही स्वाभाविक सुबुद्धिका उदय हुआ, जो उन्हींके अनुरूप थी॥
स्वं रूपं माहिषं कृत्वा सुमहन्तं मनोहरम् ।
त्राणार्थं वत्सनाभस्य चतुष्पादुपरी स्थितः ॥
वे विशाल और मनोहर भैंसेका-सा अपना स्वरूप बनाकर वत्सनाभकी रक्षाके लिये उनके चारों ओर अपने चारों पैर जमाकर उनके ऊपर खड़े हो गये॥
यदा त्वपगतं वर्षं शीतवातसमन्वितम् ।
ततो महिषरूपी स धर्मो धर्मभृतां वर ॥
शनैर्वल्मीकमुत्सृज्य प्राद्रवद् भरतर्षभ ।
स्थितेऽस्मिन् वृष्टिसम्पाते रक्षितः स महातपाः ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भरतभूषण युधिष्ठिर! जब शीतल हवासे युक्त वह वर्षा बंद हो गयी तब भैंसेका रूप धारण करनेवाले धर्म धीरेसे उस वल्मीकको छोड़कर वहाँसे दूर खिसक गये। उस मूसलाधार वर्षामें महिषरूपधारी धर्मके खड़े हो जानेसे महातपस्वी वत्सनाभकी रक्षा हो गयी॥
दिशः सुविपुलास्तत्र गिरीणां शिखराणि च ॥
दृष्ट्वा च पृथिवीं सर्वां सलिलेन परिप्लुताम् ।

जलाशयान् स तान् दृष्ट्वा विप्रः प्रमुदितोऽभवत् ।।
तदनन्तर वहाँ सुविस्तृत दिशाओं, पर्वतोंके शिखरों, जलमें डूबी हुई सारी पृथ्वी और जलाशयोंको देखकर ब्राह्मण वत्सनाभ बहुत प्रसन्न हुए ।।
अचिन्तयद् विस्मितश्च वर्षात् केनाभिरक्षितः ।
ततोऽपश्यत् तं महिषमवस्थितमदूरतः ।।
फिर वे विस्मित होकर सोचने लगे कि ‘इस वर्षासे किसने मेरी रक्षा की है। इतनेहीमें पास ही खड़े हुए उस भैंसेपर उनकी दृष्टि पड़ी ।।
तिर्यग्योनावपि कथं दृश्यते धर्मवत्सलः ।
अतो नु भद्रं महिषः शिलापट्ट इव स्थितः ।
पीवरश्चैव शूल्यश्च बहुमांसो भवेदयम् ।।
‘अहो! पशुयोनिमें पैदा होकर भी यह कैसा धर्मवत्सल दिखायी देता है? निश्चय ही यह भैंसा मेरे ऊपर शिलापट्टके समान खड़ा हो गया था। इसीलिये मेरा भला हुआ है। यह बड़ा मोटा और बहुत मांसल है’ ।।
तस्य बुद्धिरियं जाता धर्मसंसक्तिजा मुनेः ।
कृतघ्ना नरकं यान्ति ये तु विश्वासघातिनः ।।
तदनन्तर धर्ममें अनुराग होनेके कारण मुनिके हृदयमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘जो विश्वासघाती एवं कृतघ्न मनुष्य हैं, वे नरकमें पड़ते हैं ।।
निष्कृतिं नैव पश्यामि कृतघ्नानां कथंचन ।
ऋते प्राणपरित्यागं धर्मज्ञानां वचो यथा ।।
‘मैं प्राण-त्यागके सिवा कृतघ्नोंके उद्धारका दूसरा कोई उपाय किसी तरह नहीं देख पाता। धर्मज्ञ पुरुषोंका कथन भी ऐसा ही है ।।
अकृत्वा भरणं पित्रोरदत्त्वा गुरुदक्षिणाम् ।
कृतघ्नतां च सम्प्राप्य मरणान्ता च निष्कृतिः ।।
‘पिता-माताका भरण-पोषण न करके तथा गुरुदक्षिणा न देकर मैं कृतघ्नभावको प्राप्त हो गया हूँ। इस कृतघ्नताका प्रायश्चित्त है स्वेच्छासे मृत्युको वरण कर लेना ।।
आकाङ्क्षायामुपेक्षायां चोपपातकमुत्तमम् ।
तस्मात् प्राणान् परित्यक्ष्ये प्रायश्चित्तार्थमित्युत ।।
‘अपने कृतघ्न जीवनकी आकांक्षा और प्रायश्चित्तकी उपेक्षा करनेपर भी भारी उपपातक भी बढ़ता रहेगा। अतः मैं प्रायश्चित्तके लिये अपने प्राणोंका परित्याग करूँगा’ ।।
स मेरुशिखरं गत्वा निस्सङ्गेनान्तरात्मना ।
प्रायश्चित्तं कर्तुकामः शरीरं त्यक्तुमुद्यतः ।।
निगृहीतश्च धर्मात्मा हस्ते धर्मेण धर्मवित् ।।

अनासक्त चित्तसे मेरु पर्वतके शिखरपर जाकर प्रायश्चित्त करनेकी इच्छासे अपने शरीरको त्याग देनेके लिये उद्यत हो गये। इसी समय धर्मने आकर उन धर्मज्ञ, धर्मात्मा वत्सनाभका हाथ पकड़ लिया ।।

धर्म उवाच

वत्सनाभ महाप्राज्ञ बहुवर्षशतायुषः ।
परितुष्टोऽस्मि त्यागेन निःसङ्गेन तथाऽऽत्मनः ।।
**धर्मने कहा—**महाप्राज्ञ वत्सनाभ! तुम्हारी आयु कई सौ वर्षोंकी है। तुम्हारे इस आसक्तिरहित आत्मत्यागके विचारसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ ।।
एवं धर्मभृतः सर्वे विमृशन्ति तथा कृतम् ।
न स कश्चिद् वत्सनाभ यस्य नोपहतं मनः ।।
यश्चानवद्यश्चरति शक्तो धर्मं तु सर्वशः ।
निवर्तस्व महाप्राज्ञ भूतात्मा ह्यसि शाश्वतः ॥)
इसी प्रकार सभी धर्मात्मा पुरुष अपने किये हुए कर्मकी आलोचना करते हैं। वत्सनाभ! जगत्में कोई ऐसा पुरुष नहीं है जिसका मन कभी दूषित न हुआ हो। जो मनुष्य निन्द्य कर्मोंसे दूर रहकर सब तरहसे धर्मका आचरण करता है वही शक्तिशाली है। महाप्राज्ञ! अब तुम प्राणत्यागके संकल्पसे निवृत्त हो जाओ, क्योंकि तुम सनातन (अजर-अमर) आत्मा हो ।।

युधिष्ठिर उवाच

स्त्रीपुंसयोः सम्प्रयोगे स्पर्शः कस्याधिको भवेत् ।
एतस्मिन् संशये राजन् यथावद् वक्तुमर्हसि ।। १ ।।
**युधिष्ठिरने पूछा—**राजन्! स्त्री और पुरुषके संयोगमें विषयसुखकी अनुभूति किसको अधिक होती है (स्त्रीको या पुरुषको)? इस संशयके विषयमें आप यथावत्रूपसे बतानेकी कृपा करें ।। १ ।।

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
भंगास्वनेन शक्रस्य यथा वैरमभूत् पुरा ।। २ ।।
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! इस विषयमें भी भंगास्वनके साथ इन्द्रका पहले जो वैर हुआ था, उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ।। २ ।।
पुरा भंगास्वनो नाम राजर्षिरतिधार्मिकः ।
अपुत्रः पुरुषव्याघ्र पुत्रार्थं यज्ञमाहरत् ।। ३ ।।

पुरुषसिंह! पहलेकी बात है, भंगास्वन नामसे प्रसिद्ध अत्यन्त धर्मात्मा राजर्षि पुत्रहीन

होनेके कारण पुत्र-प्राप्तिके लिये यज्ञ करते थे ।। ३ ।।

अग्निष्टुतं स राजर्षिरिन्द्रद्विष्टं महाबलः ।

प्रायश्चित्तेषु मर्त्यानां पुत्रकामेषु चेष्यते ॥ ४ ॥

उन महाबली राजर्षिने अग्निष्टुत नामक यज्ञका आयोजन किया था। उसमें इन्द्रकी

प्रधानता न होनेके कारण इन्द्र उस यज्ञसे द्वेष रखते हैं। वह यज्ञ मनुष्योंके प्रायश्चित्तके

अवसरपर अथवा पुत्रकी कामना होनेपर अभीष्ट मानकर किया जाता है ॥ ४ ।।

इन्द्रो ज्ञात्वा तु तं यज्ञं महाभागः सुरेश्वरः ।

अन्तरं तस्य राजर्षेरन्विच्छन्नियतात्मनः ॥ ५ ॥

महाभाग देवराज इन्द्रको जब उस यज्ञकी बात मालूम हुई तब वे मनको वशमें

रखनेवाले राजर्षि भंगास्वनका छिद्र ढूँढ़ने लगे ।। ५ ।।

न चैवास्यान्तरं राजन् स ददर्श महात्मनः ।

कस्यचित्त्वथ कालस्य मृगयां गतवान् नृपः ।। ६ ।।

राजन्! बहुत ढूँढ़नेपर भी वे उस महामना नरेशका कोई छिद्र न देख सके। कुछ

कालके अनन्तर राजा भंगास्वन शिकार खेलनेके लिये वनमें गये ।। ६ ।।

इदमन्तरमित्येव शक्रो नृपममोहयत् ।

एकाश्वेन च राजर्षिर्भ्रान्त इन्द्रेण मोहितः ॥ ७ ॥

न दिशोऽविन्दत नृपः क्षुत्पिपासार्दितस्तदा ।

इतश्चेतश्च वै राजन् श्रमकृष्णाान्वितो नृप ।। ८ ।।

नरेश्वर! 'यही बदला लेनेका अवसर है' ऐसा निश्चय करके इन्द्रने राजाको मोहमें डाल

दिया। इन्द्रद्वारा मोहित एवं भ्रान्त हुए राजर्षि भंगास्वन एकमात्र घोड़ेके साथ इधर-उधर

भटकने लगे। उन्हें दिशाओंका भी पता नहीं चलता था। वे भूख-प्याससे पीड़ित तथा

परिश्रम और तृष्णासे विकल हो इधर-उधर घूमते रहे ॥ ७-८ ।।

सरोऽपश्यत् सुरुचिरं पूर्णं परमवारिणा ।

सोऽवगाह्य सरस्तात पाययामास वाजिनम् ॥ ९ ॥

तात! घूमते-घूमते उन्होंने उत्तम जलसे भरा हुआ एक सुन्दर सरोवर देखा। उन्होंने

घोड़ेको उस सरोवरमें स्नान कराकर पानी पिलाया ।। ९ ।।

अथ पीतोदकं सोऽश्वं वृक्षे बद्ध्वा नृपोत्तमः ।

अवगाह्य ततः स्नातस्तत्र स्त्रीत्वमवाप्तवान् ॥ १० ॥

जब घोड़ा पानी पी चुका तब उसे एक वृक्षमें बाँधकर वे श्रेष्ठ नरेश स्वयं भी जलमें

उतरे। उसमें स्नान करते ही वे राजा स्त्रीभावको प्राप्त हो गये ।। १० ।।

आत्मानं स्त्रीकृतं दृष्ट्वा व्रीडितो नृपसत्तमः ।

चिन्तानुगतसर्वात्मा व्याकुलेन्द्रियचेतनः ॥ ११ ॥

अपनेको स्त्रीरूपमें देखकर राजाको बड़ी लज्जा हुई। उनके सारे अन्तःकरणमें भारी चिन्ता व्याप्त हो गयी। उनकी इन्द्रियाँ और चेतना व्याकुल हो उठीं।। आरोहिष्ये कथं त्वश्वं कथं यास्यामि वै पुरम्। इष्टेनाग्निष्टुता चापि पुत्राणां शतमौरसम् ।। १२ ।। जातं महाबलानां मे तान् प्रवक्ष्यामि किं त्वहम् । दारेषु चात्मकीयेषु पौरजानपदेषु च ।। १३ ।। वे स्त्रीरूपमें इस प्रकार सोचने लगे—अब मैं कैसे घोड़ेपर चढूँगी? कैसे नगरको जाऊँगी? मेरे अग्निष्टुत यज्ञके अनुष्ठानसे मुझे सौ महाबलवान् औरस पुत्र प्राप्त हुए हैं। उन सबसे क्या कहूँगी? अपनी स्त्रियों तथा नगर और जनपदके लोगोंमें कैसे जाऊँगी? ।। १२-१३ ।।

मृदुत्वं च तनुत्वं च विक्लवत्वं तथैव च। स्त्रीगुणा ऋषिभिः प्रोक्ता धर्मतत्त्वार्थदर्शिभिः ।। १४ ।। ‘धर्मके तत्त्वको देखने और जाननेवाले ऋषियोंने मृदुता, कृशता और व्याकुलता—ये स्त्रीके गुण बताये हैं ।। १४ ।।

व्यायामे कर्कशत्वं च वीर्यं च पुरुषे गुणाः। पौरुषं विप्रणष्टं वै स्त्रीत्वं केनापि मेऽभवत् ।। १५ ।। ‘परिश्रम करनेमें कठोरता और बल-पराक्रम—ये पुरुषके गुण हैं। मेरा पौरुष नष्ट हो गया और किसी अज्ञात कारणसे मुझमें स्त्रीत्व प्रकट हो गया ।। १५ ।।

स्त्रीभावात् पुनरश्वं तं कथमारोढुमुत्सहे । महता त्वथ यत्नेन आरुह्याश्वं नराधिपः ।। १६ ।। पुनरायात् पुरं तात स्त्रीकृतो नृपसत्तमः । ‘अब स्त्रीभाव आ जानेसे उस अश्वपर कैसे चढ़ सकूँगी?’ तात! किसी-किसी तरह महान् प्रयत्न करके वे स्त्रीरूपधारी नरेश घोड़ेपर चढ़कर अपने नगरमें आये ।। १६ १/२ ।।

पुत्र दारांश्च भृत्यांश्च पौरजानपदांश्च ते ।। १७ ।। किंस्विदं त्विति विज्ञाय विस्मयं परमं गताः । राजाके पुत्र, स्त्रियाँ, सेवक तथा नगर और जनपदके लोग, ‘यह क्या हुआ?’—ऐसी जिज्ञासा करते हुए बड़े आश्चर्यमें पड़ गये ।। १७ १/२ ।।

अथोवाच स राजर्षिः स्त्रीभूतो वदतां वरः ।। १८ ।। मृगयामस्मि निर्यातो बलैः परिवृतो दृढम् । उद्भ्रान्तः प्राविशं घोरमटवीं दैवचोदितः ।। १९ ।। तब स्त्रीरूपधारी, वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजर्षि भंगास्वन बोले—‘मैं अपनी सेनासे घिरकर शिकार खेलनेके लिये निकला था; परंतु दैवकी प्रेरणासे भ्रान्तचित्त होकर एक भयानक वनमें जा घुसा ।। १८-१९ ।।

अटव्यां च सुघोरायां तृष्णार्तो नष्टचेतनः । सरः सुरुचिरप्रख्यमपश्यं पक्षिभिर्वृतम् ॥ २० ॥ उस घोर वनमें प्याससे पीड़ित एवं अचेत-सा होकर मैंने एक सरोवर देखा, जो पक्षियोंसे घिरा हुआ और मनोहर शोभासे सम्पन्न था ॥ २० ॥

तत्रावगाढः स्त्रीभूतो दैवेनाहं कृतः पुरा । नामगोत्राणि चाभाष्य दाराणां मन्त्रिणां तथा ॥ २१ ॥ आह पुत्रांस्ततः सोऽथ स्त्रीभूतः पार्थिवोत्तमः । सम्प्रीत्या भुज्यतां राज्यं वनं यास्यामि पुत्रकाः ॥ २२ ॥ उस सरोवरमें उतरकर स्नान करते ही दैवने मुझे स्त्री बना दिया। अपनी स्त्रियों और मन्त्रियोंके नाम-गोत्र बताकर उन स्त्रीरूपधारी श्रेष्ठ नरेशने अपने पुत्रोंसे कहा—'पुत्रो! तुमलोग आपसमें प्रेमपूर्वक रहकर राज्यका उपभोग करो। अब मैं वनको चला जाऊँगा' ॥ २१-२२ ॥

एवमुक्त्वा पुत्रशतं वनमेव जगाम ह । गत्वा चैवाश्रमं सा तु तापसं प्रत्यपद्यत ॥ २३ ॥ अपने सौ पुत्रोंसे ऐसा कहकर राजा वनको चले गये। वह स्त्री किसी आश्रममें जाकर एक तापसके आश्रयमें रहने लगी ॥ २३ ॥

तापसेनास्य पुत्राणामाश्रमेष्वभवच्छतम् । अथ साऽऽदाय तान् सर्वान् पूर्वपुत्रानभाषत ॥ २४ ॥ पुरुषत्वे सुता यूयं स्त्रीत्वे चेमे शतं सुताः । एकत्र भुज्यतां राज्यं भ्रातृभावेन पुत्रकाः ॥ २५ ॥ उस तपस्वीसे आश्रममें उसके सौ पुत्र हुए। तब वह रानी अपने उन पुत्रोंको लेकर पहलेवाले पुत्रोंके पास गयी और उनसे इस प्रकार बोली—'पुत्रो! जब मैं पुरुषरूपमें थी तब तुम मेरे सौ पुत्र हुए थे और जब स्त्रीरूपमें आयी हूँ तब ये मेरे सौ पुत्र हुए हैं। तुम सब लोग एकत्र होकर साथ-साथ भ्रातृभावसे इस राज्यका उपभोग करो' ॥ २४-२५ ॥

सहिता भ्रातरस्तेऽथ राज्यं बुभुजिरे तदा । तान् दृष्ट्वा भ्रातृभावेन भुञ्जानान् राज्यमुत्तमम् ॥ २६ ॥ चिन्तयामास देवेन्द्रो मन्युनाथ परिप्लुतः । उपकारोऽस्य राजर्षेः कृतो नापकृतं मया ॥ २७ ॥ तब वे सब भाई एक साथ होकर उस राज्यका उपभोग करने लगे। उन सबको भ्रातृभावसे एक साथ रहकर उस उत्तम राज्यका उपभोग करते देख क्रोधमें भरे हुए देवराज इन्द्रने सोचा कि मैंने तो इस राजर्षिका उपकार ही कर दिया, अपकार तो कुछ किया ही नहीं ॥ २६-२७ ॥

ततो ब्राह्मणरूपेण देवराजः शतक्रतुः ।

भेदयामास तान् गत्वा नगरं वै नृपात्मजान् ॥ २८ ॥
तब देवराज इन्द्रने ब्राह्मणका रूप धारण करके उस नगरमें जाकर उन राजकुमारोंमें फूट डाल दी ॥ २८ ॥

भ्रातॄणां नास्ति सौभ्रात्रं येष्वेकस्य पितुः सुताः ।
राज्यहेतोर्विवदिताः कश्यपस्य सुरासुराः ॥ २९ ॥
वे बोले—‘राजकुमारो! जो एक पिताके पुत्र हैं, ऐसे भाइयोंमें भी प्रायः उत्तम भ्रातृप्रेम नहीं रहता। देवता और असुर दोनों ही कश्यपजीके पुत्र हैं तथापि राज्यके लिये परस्पर विवाद करते रहते हैं’ ॥ २९ ॥

यूयं भङ्गास्वनापत्यास्तापसस्येतरे सुताः ।
कश्यपस्य सुराश्चैव असुराश्च सुतास्तथा ॥ ३० ॥
‘तुमलोग तो भङ्गास्वनके पुत्र हो और दूसरे सौ भाई एक तापसके लड़के हैं। फिर तुममें प्रेम कैसे रह सकता है? देवता और असुर तो कश्यपके ही पुत्र हैं, फिर भी उनमें प्रेम नहीं हो पाता है ॥ ३० ॥

युष्माकं पैतृकं राज्यं भुज्यते तापसात्मजैः ।
इन्द्रेण भेदितास्ते तु युद्धेऽन्योन्यमपातयन् ॥ ३१ ॥
‘तुमलोगोंका जो पैतृक राज्य है, उसे तापसके लड़के आकर भोग रहे हैं।’ इस प्रकार इन्द्रके द्वारा फूट डालनेपर वे आपसमें लड़ पड़े। उन्होंने युद्धमें एक-दूसरेको मार गिराया ॥ ३१ ॥

तच्छ्रुत्वा तापसी चापि संतप्ता प्ररुरोद ह ।
ब्राह्मणच्छद्मनाभ्येत्य तामिन्द्रोऽथान्वपृच्छत ॥ ३२ ॥
यह समाचार सुनकर तापसीको बड़ा दुःख हुआ। वह फूट-फूटकर रोने लगी। उस समय ब्राह्मणका वेश धारण करके इन्द्र उसके पास आये और पूछने लगे— ॥ ३२ ॥

केन दुःखेन संतप्ता रोदिषि त्वं वरानने ।
ब्राह्मणं तं ततो दृष्ट्वा सा स्त्री करुणमब्रवीत् ॥ ३३ ॥
‘सुमुखि! तुम किस दुःखसे संतप्त होकर रो रही हो?’ उस ब्राह्मणको देखकर वह स्त्री करुणस्वरमें बोली— ॥ ३३ ॥

पुत्राणां द्वे शते ब्रह्मन् कालेन विनिपातिते ।
अहं राजाभवं विप्र तत्र पूर्वं शतं मम ॥ ३४ ॥
समुत्पन्नं स्वरूपाणां पुत्राणां ब्राह्मणोत्तम ।
कदाचिन्मृगयां यात उद्भ्रान्तो गहने वने ॥ ३५ ॥
‘ब्रह्मन्! मेरे दो सौ पुत्र कालके द्वारा मारे गये। विप्रवर! मैं पहले राजा था। तब मेरे सौ पुत्र हुए थे। द्विजश्रेष्ठ! वे सभी मेरे अनुरूप थे। एक दिन मैं शिकार खेलनेके लिये गहन वनमें गया और वहाँ अकारण भ्रमित-सा होकर इधर-उधर भटकने लगा ॥ ३४-३५ ॥

अवगाढश्च सरसि स्त्रीभूतो ब्राह्मणोत्तम ।
पुत्रान् राज्ये प्रतिष्ठाप्य वनमस्मि ततो गतः ॥ ३६ ॥
‘ब्राह्मणशिरोमणे! वहाँ एक सरोवरमें स्नान करते ही मैं पुरुषसे स्त्री हो गया और पुत्रोंको राज्यपर बिठाकर वनमें चला आया ॥ ३६ ॥
स्त्रियाश्च मे पुत्रशतं तापसेन महात्मना ।
आश्रमे जनितं ब्रह्मन् नीतं तन्नगरं मया ॥ ३७ ॥
‘स्त्रीरूपमें आनेपर महामना तापसने इस आश्रममें मुझसे सौ पुत्र उत्पन्न किये। ब्रह्मन्! मैं उन सब पुत्रोंको नगरमें ले गयी और उन्हें भी राज्यपर प्रतिष्ठित करायी ॥ ३७ ॥
तेषां च वैरमुत्पन्नं कालयोगेन वै द्विज ।
एतत् शोचाम्यहं ब्रह्मन् दैवेन समभिप्लुता ॥ ३८ ॥
‘विप्रवर! कालकी प्रेरणासे उन सब पुत्रोंमें वैर उत्पन्न हो गया और वे आपसमें ही लड़-भिड़कर नष्ट हो गये। इस प्रकार दैवकी मारी हुई मैं शोकमें डूब रही हूँ’ ॥ ३८ ॥
इन्द्रस्तां दुःखितां दृष्ट्वा अब्रवीत् परुषं वचः ।
पुरा सुदुःसहं भद्रे मम दुःखं त्वया कृतम् ॥ ३९ ॥
इन्द्रने उसे दुःखी देख कठोर वाणीमें कहा—भद्रे! जब पहले तुम राजा थीं, तब तुमने भी मुझे दुःसह दुःख दिया था ॥ ३९ ॥
इन्द्रद्विष्टेन यजता मामनाहूय धिष्ठितम् ।
इन्द्रोऽहमस्मि दुर्बुद्धे वैरं ते पातितं मया ॥ ४० ॥
‘तुमने उस यज्ञका अनुष्ठान किया जिसका मुझसे वैर है। मेरा आवाहन न करके तुमने वह यज्ञ पूरा कर लिया। खोटी बुद्धिवाली स्त्री! मैं वही इन्द्र हूँ और तुमसे मैंने ही अपने वैरका बदला लिया है’ ॥ ४० ॥
इन्द्रं दृष्ट्वा तु राजर्षिः पादयोः शिरसा गतः ।
प्रसीद त्रिदशश्रेष्ठ पुत्रकामेन स क्रतुः ॥ ४१ ॥
इष्टस्त्रिदशशार्दूल तत्र मे क्षन्तुमर्हसि ।
इन्द्रको देखकर वे स्त्रीरूपधारी राजर्षि उनके चरणोंमें सिर रखकर बोले—‘सुरश्रेष्ठ! आप प्रसन्न हों। मैंने पुत्रकी इच्छासे वह यज्ञ किया था। देवेश्वर! उसके लिये आप मुझे क्षमा करें’ ॥ ४१ १/२ ॥
प्रणिपातेन तस्येन्द्रः परितुष्टो वरं ददौ ॥ ४२ ॥
पुत्रास्ते कतमे राजन् जीवन्त्वेतत् प्रचक्ष्व मे ।
स्त्रीभूतस्य हि ये जाताः पुरुषस्याथ येऽभवन् ॥ ४३ ॥
‘इनके इस प्रकार प्रणाम करनेपर इन्द्र संतुष्ट हो गये और वर देनेके लिये उद्यत होकर बोले—राजन्! तुम्हारे कौन-से पुत्र जीवित हो जायँ? तुमने स्त्री होकर जिन्हें उत्पन्न किया था; वे अथवा पुरुषावस्थामें जो तुमसे उत्पन्न हुए थे?’ ॥ ४२-४३ ॥

तापसी तु ततः शक्रमुवाच प्रयताञ्जलिः । स्त्रीभूतस्य हि ये पुत्रास्ते मे जीवन्तु वासव ॥ ४४ ॥ तब तापसीने इन्द्रसे हाथ जोड़कर कहा—'देवेन्द्र! स्त्रीरूप हो जानेपर मुझसे जो पुत्र उत्पन्न हुए हैं, वे ही जीवित हो जायँ' ॥ ४४ ॥ इन्द्रस्तु विस्मितो दृष्ट्वा स्त्रियं पप्रच्छ तां पुनः । पुरुषोत्पादिता ये ते कथं द्वेष्याः सुतास्तव ॥ ४५ ॥ स्त्रीभूतस्य हि ये जाताः स्नेहस्तेभ्योऽधिकः कथम् । कारणं श्रोतुमिच्छामि तन्मे वक्तुमिहार्हसि ॥ ४६ ॥ तब इन्द्रने विस्मित होकर उस स्त्रीसे पूछा—'तुमने पुरुषरूपसे जिन्हें उत्पन्न किया था, वे पुत्र तुम्हारे द्वेषके पात्र क्यों हो गये? तथा स्त्रीरूप होकर तुमने जिनको जन्म दिया है, उनपर तुम्हारा अधिक स्नेह क्यों है? मैं इसका कारण सुनना चाहता हूँ। तुम्हें मुझसे यह बताना चाहिये' ॥ ४५-४६ ॥

स्त्र्युवाच स्त्रियास्त्वभ्यधिकः स्नेहो न तथा पुरुषस्य वै । तस्मात् ते शक्र जीवन्तु ये जाताः स्त्रीकृतस्य वै ॥ ४७ ॥ **स्त्रीने कहा—**इन्द्र! स्त्रीका अपने पुत्रोंपर अधिक स्नेह होता है, वैसा स्नेह पुरुषका नहीं होता है। अतः इन्द्र! स्त्रीरूपमें आनेपर मुझसे जिनका जन्म हुआ है, वे ही जीवित हो जायँ ॥ ४७ ॥

भीष्म उवाच एवमुक्तस्ततस्त्विन्द्रः प्रीतो वाक्यमुवाच ह । सर्व एवेह जीवन्तु पुत्रास्ते सत्यवादिनि ॥ ४८ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तापसीके यों कहनेपर इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले—'सत्यवादिनि! तुम्हारे सभी पुत्र जीवित हो जायँ ॥ ४८ ॥ वरं च वृणु राजेन्द्र यं त्वमिच्छसि सुव्रत । पुरुषत्वमथ स्त्रीत्वं मत्तो यदभिकाङ्क्षते ॥ ४९ ॥ 'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजेन्द्र! तुम मुझसे अपनी इच्छाके अनुसार दूसरा वर भी माँग लो। बोलो, फिरसे पुरुष होना चाहते हो या स्त्री ही रहनेकी इच्छा है? जो चाहो वह मुझसे ले लो' ॥ ४९ ॥

स्त्र्युवाच स्त्रीत्वमेव वृणे शक्र पुंस्त्वं नेच्छामि वासव । एवमुक्तस्तु देवेन्द्रस्तां स्त्रियं प्रत्युवाच ह ॥ ५० ॥

**स्त्रीने कहा—**इन्द्र! मैं स्त्रीत्वका ही वरण करती हूँ। वासव! अब मैं पुरुष होना नहीं चाहती। उसके ऐसा कहनेपर देवराजने उस स्त्रीसे पूछा— ॥ ५० ॥

पुरुषत्वं कथं त्यक्त्वा स्त्रीत्वं चोदयसे विभो ।
एवमुक्तः प्रत्युवाच स्त्रीभूतो राजसत्तमः ॥ ५१ ॥
‘प्रभो! तुम्हें पुरुषत्वका त्याग करके स्त्री बने रहनेकी इच्छा क्यों होती है?’
इन्द्रके यों पूछनेपर उन स्त्रीरूपधारी नृपश्रेष्ठने इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ ५१ ॥

स्त्रियाः पुरुषसंयोगे प्रीतिरभ्यधिका सदा ।
एतस्मात् कारणाच्छक्र स्त्रीत्वमेव वृणोम्यहम् ॥ ५२ ॥
‘देवेन्द्र! स्त्रीका पुरुषके साथ संयोग होनेपर स्त्रीको ही पुरुषकी अपेक्षा अधिक विषयसुख प्राप्त होता है, इसी कारणसे मैं स्त्रीत्वका ही वरण करती हूँ’ ॥ ५२ ॥

रमिताभ्यधिकं स्त्रीत्वे सत्यं वै देवसत्तम ।
स्त्रीभावेन हि तुष्यामि गम्यतां त्रिदशाधिप ॥ ५३ ॥
‘देवश्रेष्ठ! सुरेश्वर! मैं सच कहती हूँ, स्त्रीरूपमें मैंने अधिक रति-सुखका अनुभव किया है, अतः स्त्रीरूपसे ही संतुष्ट हूँ। आप पधारिये’ ॥ ५३ ॥

एवमस्त्विति चोक्त्वा तामापृच्छ्य त्रिदिवं गतः ।
एवं स्त्रिया महाराज अधिका प्रीतिरुच्यते ॥ ५४ ॥
महाराज! तब ‘एवमस्तु’ कहकर उस तापसीसे विदा ले इन्द्र स्वर्गलोकको चले गये। इस प्रकार स्त्रीको विषय-भोगमें पुरुषकी अपेक्षा अधिक सुख-प्राप्ति बतायी जाती है ॥ ५४ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि भङ्गास्वनोपाख्याने द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें भङ्गास्वनका उपाख्यानविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २६ श्लोक मिलाकर कुल ८० श्लोक हैं)

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रयोदशोऽध्यायः

शरीर, वाणी और मनसे होनेवाले पापोंके परित्यागका उपदेश

युधिष्ठिर उवाच

किं कर्तव्यं मनुष्येण लोकयात्राहितार्थिना ।
कथं वै लोकयात्रां तु किंशीलश्च समाचरेत् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! लोकयात्राका भली-भाँति निर्वाह करनेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको क्या करना चाहिये? कैसा स्वभाव बनाकर किस प्रकार लोकमें जीवन बिताना चाहिये? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

कायेन त्रिविधं कर्म वाचा चापि चतुर्विधम् ।
मनसा त्रिविधं चैव दशकर्मपथांस्त्यजेत् ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! शरीरसे तीन प्रकारके कर्म, वाणीसे चार प्रकारके कर्म और मनसे भी तीन प्रकारके कर्म—इस तरह कुल दस तरहके कर्मोंका त्याग कर दे ॥ २ ॥

प्राणातिपातः स्तेन्यं च परदारानथापि च ।
त्रीणि पापानि कायेन सर्वतः परिवर्जयेत् ॥ ३ ॥
दूसरोंके प्राणनाश करना, चोरी करना और परायी स्त्रीसे संसर्ग रखना—ये तीन शरीरसे होनेवाले पाप हैं। इन सबका परित्याग कर देना उचित है ॥ ३ ॥

असत्प्रलापं पारुष्यं पैशुन्यमनृतं तथा ।
चत्वारि वाचा राजेन्द्र न जल्पेन्नानुचिन्तयेत् ॥ ४ ॥
मुँहसे बुरी बातें निकालना, कठोर बोलना, चुगली खाना और झूठ बोलना—ये चार वाणीसे होनेवाले पाप हैं। राजेन्द्र! इन्हें न तो कभी जबानपर लाना चाहिये और न मनमें ही सोचना चाहिये ॥ ४ ॥

अनभिध्या परस्वेषु सर्वसत्त्वेषु सौहृदम् ।
कर्मणां फलमस्तीति त्रिविधं मनसा चरेत् ॥ ५ ॥
दूसरेके धनको लेनेका उपाय न सोचना, समस्त प्राणियोंके प्रति मैत्रीभाव रखना और कर्मोंका फल अवश्य मिलता है, इस बातपर विश्वास रखना—ये तीन मनसे आचरण करने योग्य कार्य हैं। इन्हें सदा करना चाहिये। (इनके विपरीत दूसरोंके धनका लालच करना,

समस्त प्राणियोंसे वैर रखना और कर्मोंके फलपर विश्वास न करना—ये तीन मानसिक पाप हैं—इनसे सदा बचे रहना चाहिये) ।। ५ ।। तस्माद् वाक्कायमनसा नाचरेदशुभं नरः । शुभाशुभान्याचरन् हि तस्य तस्याश्नुते फलम् ॥ ६ ॥ इसलिये मनुष्यका कर्तव्य है कि वह मन, वाणी या शरीरसे कभी अशुभ कर्म न करे; क्योंकि वह शुभ या अशुभ जैसा कर्म करता है; उसका वैसा ही फल उसे भोगना पड़ता है ।। ६ ।।

[ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा]

अमृतस्य समुत्पत्तौ देवानामसुरैः सह । षष्टिवर्षसहस्राणि देवासुरमवर्तत ॥ एक समय अमृतकी उत्पत्ति हो जानेपर उसकी प्राप्तिके लिये देवताओंका असुरोंके साथ साठ हजार वर्षोंतक युद्ध हुआ, जो देवासुर-संग्रामके नामसे प्रसिद्ध है ।।

तत्र देवास्तु दैतेयैर्वध्यन्ते भृशदारुणैः । त्रातारं नाधिगच्छन्ति वध्यमाना महासुरैः ॥ उस युद्धमें अत्यन्त भयंकर दैत्यों एवं बड़े-बड़े असुरोंकी मार खाकर देवता किसी रक्षकको नहीं पाते थे ।।

आर्तास्ते देवदेवेशं प्रपन्नाः शरणैषिणः । पितामहं महाप्राज्ञं वध्यमानाः सुरेतरैः ॥ दैत्योंद्वारा सताये जानेवाले देवता दुःखी होकर अपने लिये आश्रय ढूँढ़ते हुए देवदेवेश्वर महाज्ञानी ब्रह्माजीकी शरणमें गये ।।

वैकुण्ठं शरणं देवं प्रतिपेदे च तैः सह ॥ तब ब्रह्माजी उन सबके साथ भगवान् विष्णुकी शरणमें गये ।।

ततः स देवैः सहितः पद्मयोनिरनेश्वर । तुष्टाव प्राञ्जलिर्भूत्वा नारायणमनामयम् ॥ नरेश्वर! तदनन्तर देवताओंसहित कमलयोनि ब्रह्माजी हाथ जोड़कर रोग-शोकसे रहित भगवान् नारायणकी स्तुति करने लगे ।।

ब्रह्मोवाच

त्वद्रूपचिन्तनान्नाम्नां स्मरणादर्चनादपि । तपोयोगादिभिश्चैव श्रेयो यान्ति मनीषिणः ॥ **ब्रह्माजी बोले—**प्रभो! आपके रूपका चिन्तन करनेसे, नामोंके स्मरण और जपसे, पूजनसे तथा तप और योग आदिसे मनीषी पुरुष कल्याणको प्राप्त होते हैं ।।

भक्तवत्सल पद्माक्ष परमेश्वर पापहन् ।

परमात्माविकाराद्य नारायण नमोऽस्तु ते ॥ भक्तवत्सल! कमलनयन! परमेश्वर! पापहारी परमात्मन्! निर्विकार! आदिपुरुष! नारायण! आपको नमस्कार है ॥ नमस्ते सर्वलोकादे सर्वात्मामितविक्रम । सर्वभूतभविष्येश सर्वभूतमहेश्वर ॥ सम्पूर्ण लोकोंके आदिकारण! सर्वात्मन्! अमित पराक्रमी नारायण! सम्पूर्ण भूत और भविष्यके स्वामी! सर्वभूतमहेश्वर! आपको नमस्कार है ॥ देवानामपि देवस्त्वं सर्वविद्यापरायणः । जगद्वीजसमाहार जगतः परमो ह्यसि ॥ प्रभो! आप देवताओंके भी देवता और समस्त विद्याओंके परम आश्रय हैं। जगत्‌के जितने भी बीज हैं, उन सबका संग्रह करनेवाले आप ही हैं। आप ही जगत्‌के परम कारण हैं ॥ त्रायस्व देवता वीर दानवाद्यैः सुपीडिताः । लोकांश्च लोकपालांश्च ऋषींश्च जयतां वर ॥ वीर! ये देवता दानव, दैत्य आदिसे अत्यन्त पीड़ित हो रहे हैं। आप इनकी रक्षा कीजिये। विजयशीलोंमें सबसे श्रेष्ठ नारायणदेव! आप लोकों, लोकपालों तथा ऋषियोंका संरक्षण कीजिये ॥ वेदाः साङ्गोपनिषदः सरहस्याः ससंग्रहाः । सोङ्काराः सवषट्काराः प्राहुस्त्वां यज्ञमुत्तमम् ॥ सम्पूर्ण अंगों और उपनिषदोंसहित वेद, उनके रहस्य, संग्रह, ॐकार और वषट्कार आपहीको उत्तम यज्ञका स्वरूप बताते हैं ॥ पवित्राणां पवित्रं च मङ्गलानां च मङ्गलम् । तपस्विनां तपश्चैव दैवतं देवतास्वपि ॥ आप पवित्रोंके भी पवित्र, मंगलोंके भी मंगल, तपस्वियोंके तप और देवताओंके भी देवता हैं ॥

भीष्म उवाच

एवमादिपुरस्कारैर्ऋक्सामयजुषां गणैः । वैकुण्ठं तुष्टुवुर्देवाः समेत्य ब्रह्मणा सह ॥ भीष्मजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार ब्रह्मासहित देवताओंने एकत्र होकर ऋक्, साम और यजुर्वेदके मन्त्रोंद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति की ॥ ततोऽन्तरिक्षे वागासीन्मेघगम्भीरनिःस्वना । जेष्यध्वं दानवान् यूयं मयैव सह सङ्गरे ॥

तब मेघके समान गम्भीर स्वरमें आकाशवाणी हुई—‘देवताओ! तुम युद्धमें मेरे साथ रहकर दानवोंको अवश्य जीत लोगे’ ।।

ततो देवगणानां च दानवानां च युध्यताम् ।
प्रादुरासीन्महातेजाः शङ्खचक्रगदाधरः ॥
तत्पश्चात् परस्पर युद्ध करनेवाले देवताओं और दानवोंके बीच शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले महातेजस्वी भगवान् विष्णु प्रकट हुए ।।

सुपर्णपृष्ठमास्थाय तेजसा प्रदहन्निव ।
व्यधमद् दानवान् सर्वान् बाहुद्रविणतेजसा ॥
उन्होंने गरुडकी पीठपर बैठकर तेजसे विरोधियोंको दग्ध करते हुए-से अपनी भुजाओंके तेज और वैभवसे समस्त दानवोंका संहार कर डाला ।।

तं समासाद्य समरे दैत्यदानवपुङ्गवाः ।
व्यनश्यन्त महाराज पतङ्गा इव पावकम् ॥
महाराज! समरभूमिमें दैत्यों और दानवोंके प्रमुख वीर भगवान्‌से टक्कर लेकर वैसे ही नष्ट हो गये, जैसे पतंगे आगमें कूदकर अपने प्राण दे देते हैं ।।

स विजित्यासुरान् सर्वान् दानवांश्च महामतिः ।
पश्यतामेव देवानां तत्रैवान्तरधीयत ॥
परम बुद्धिमान् श्रीहरि समस्त असुरों और दानवोंको परास्त करके देवताओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये ।।

तं दृष्ट्वान्तर्हितं देवं विष्णुं देवामितद्युतिम् ।
विस्मयोत्फुल्लनयना ब्रह्माणमिदमब्रुवन् ॥
अनन्त तेजस्वी श्रीविष्णुदेवको अदृश्य हुआ देख आश्चर्यसे चकित नेत्रवाले देवता ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले— ।।

देवा ऊचुः

भगवन् सर्वलोकेश सर्वलोकपितामह ।
इदमत्यद्भुतं वृत्तं त्वं नः शंसितुमर्हसि ॥
**देवताओंने पूछा—**सर्वलोकेश्वर! सम्पूर्ण जगत्‌के पितामह! भगवन्! यह अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त हमें बतानेकी कृपा करें ।।

कोऽयमस्मान् परित्राय तूष्णीमेव यथागतम् ।
प्रतिप्रयातो दिव्यात्मा तं नः शंसितुमर्हसि ॥
कौन दिव्यात्मा पुरुष हमारी रक्षा करके चुपचाप जैसे आया था; वैसे लौट गया? यह हमें बतानेकी कृपा करें ।।

भीष्म उवाच

एवमुक्तः सुरैः सर्वैर्वचनं वचनार्थवित् ।
उवाच पद्मनाभस्य पूर्वरूपं प्रति प्रभो ॥
भीष्मजी कहते हैं— प्रभो! सम्पूर्ण देवताओंके ऐसा कहनेपर वचनके तात्पर्यको समझानेवाले ब्रह्माजीने भगवान् पद्मनाभ (विष्णु)-के पूर्वरूपके विषयमें इस प्रकार कहा—॥

ब्रह्मोवाच
न ह्येनं वेद तत्त्वेन भुवनं भुवनेश्वरम् ।
संख्यातुं नैव चात्मानं निर्गुणं गुणिनां वरम् ॥
ब्रह्माजी बोले— देवताओ! ये भगवान् सम्पूर्ण भुवनोंके अधीश्वर हैं। इन्हें जगत्‌का कोई भी प्राणी यथार्थरूपसे नहीं जानता। गुणवानोंमें श्रेष्ठ निर्गुण परमात्माकी महिमाका कोई पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकता ॥

अत्र वो वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् ।
सुपर्णस्य च संवादमृषीणां चापि देवताः ॥
देवगण! इस विषयमें मैं तुमलोगोंको गरुड और ऋषियोंका संवादरूप प्राचीन इतिहास बता रहा हूँ ॥

पुरा ब्रह्मर्षयश्चैव सिद्धाश्च भुवनेश्वरम् ।
आश्रित्य हिमवत्पृष्ठे चक्रिरे विविधाः कथाः ॥
पूर्वकालकी बात है, हिमालयके शिखरपर ब्रह्मर्षि और सिद्धगण जगदीश्वर श्रीहरिकी शरण ले उन्हींके विषयमें नाना प्रकारकी बातें कर रहे थे ॥

तेषां कथयतां तत्र कथान्ते पततां वरः ।
प्रादुरासीन्महातेजा वाहश्चक्रगदाभृतः ॥
उनकी बातचीत पूरी होते ही चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णुके वाहन महातेजस्वी पक्षिराज गरुड वहाँ आ पहुँचे ॥

स तानृषीन् समासाद्य विनयावनताननः ।
अवतीर्य महावीर्यस्तानृषीनभिजग्मिवान् ॥
उन ऋषियोंके पास पहुँचकर महापराक्रमी गरुड नीचे उतर पड़े और विनयसे मस्तक झुकाकर उनके समीप गये।

अभ्यर्चितः स ऋषिभिः स्वागतेन महाबलः ।
उपाविशत तेजस्वी भूमौ वेगवतां वरः ॥
ऋषियोंने स्वागतपूर्वक वेगवानोंमें श्रेष्ठ महान् बलवान् एवं तेजस्वी गरुडका पूजन किया। उनसे पूजित होकर वे पृथ्वीपर बैठे ॥

तमासीनं महात्मानं वैनतेयं महाद्युतिम् ।

ऋषयः परिपप्रच्छुर्महात्मानं तपस्विनः ॥ बैठ जानेपर उन महाकाय, महामना और महातेजस्वी विनतानन्दन गरुडसे वहाँ बैठे हुए तपस्वी ऋषियोंने पूछा ।।

ऋषय ऊचुः

कौतूहलं वैनतेय परं नो हृदि वर्तते । तस्य नान्योऽस्ति वक्तेह त्वामृते पन्नगाशन ॥ तदाख्यातमिहेच्छामो भवता प्रश्नमुत्तमम् । ऋषि बोले—विनतानन्दन गरुड! हमारे हृदयमें एक प्रश्नको लेकर बड़ा कौतूहल उत्पन्न हो गया है। उसका समाधान करनेवाला यहाँ आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है, अतः हम आपके द्वारा अपने उस उत्तम प्रश्नका विवेचन कराना चाहते हैं ।।

गरुड उवाच

किं मया ब्रूत वक्तव्यं कार्यं च वदतां वराः ॥ यूयं हि मां यथायुक्तं सर्वे वै देष्टुमर्हथ । गरुड बोले—वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनीश्वरो! मेरे द्वारा किस विषयमें आप प्रवचन कराना चाहते हैं? यह बताइये। आप मुझे सभी यथोचित कार्योंके लिये आज्ञा दे सकते हैं ।।

ब्रह्मोवाच

नमस्कृत्या ह्यनन्ताय ततस्ते हृदि सत्तमाः । प्रष्टुं प्रचक्रमुस्तत्र वैनतेयं महाबलम् ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—देवताओ! तदनन्तर उन श्रेष्ठतम ऋषियोंने अन्तरहित भगवान् नारायणको नमस्कार करके महाबली गरुडसे वहाँ इस प्रकार पूछना आरम्भ किया ।।

ऋषय ऊचुः

देवदेवं महात्मानं नारायणमनामयम् । भवानुपास्ते वरदं कुतोऽसौ कश्च तत्त्वतः ॥ ऋषि बोले—विनतानन्दन! जिस रोग-शोकसे रहित वरदायक देवाधिदेव महात्मा नारायणकी आप उपासना करते हैं, उनका प्राकट्य कहाँसे हुआ है? तथा वे वास्तवमें कौन हैं? ।।

प्रकृतिर्विकृतिर्वास्य कीदृशी क्व नु संस्थितिः । एतद् भवन्तं पृच्छामो देवोऽयं क्व कृतालयः ॥ उनकी प्रकृति अथवा विकृति कैसी है? उनकी स्थिति कहाँ है? तथा वे नारायणदेव कहाँ अपना घर बनाये हुए हैं? ये सब बातें हमलोग आपसे पूछते हैं ।।

एष भक्तप्रियो देवः प्रियभक्तस्तथैव च ।

त्वं प्रियश्चास्य भक्तश्च नान्यः काश्यप विद्यते ॥ कश्यपकुमार! ये भगवान् नारायण भक्तोंके प्रिय हैं तथा भक्त भी उन्हें बहुत प्रिय हैं और आप भी उनके प्रिय एवं भक्त हैं। आपके समान दूसरा कोई उन्हें प्रिय नहीं है ॥

मुष्णन्निव मनश्चक्षुर्ष्यविभाव्यतनुर्विभुः । अनादिमध्यनिधनो न विद्मैनं कुतो ह्यसौ ॥ उनका विग्रह इन्द्रियोंद्वारा प्रत्यक्ष अनुभवमें आने योग्य नहीं है। वे सबके मन और नेत्रोंको मानो चुराये लेते हैं। उनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है। हम इनके विषयमें यह नहीं समझ पाते कि ये कहाँसे प्रकट हुए हैं? ॥

वेदेष्वपि च विश्वात्मा गीयते न च विद्महे । तत्त्वतस्तत्त्वभूतात्मा विभुर्नित्यः सनातनः ॥ वेदोंमें भी विश्वात्मा कहकर इनकी महिमाका गान किया गया है, परंतु हम यह नहीं जानते कि वे तत्त्वभूतस्वरूप नित्य सनातन प्रभु वस्तुतः कैसे हैं? ॥

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । गुणाश्चैषां यथासंख्यं भावाभावौ तथैव च ॥ तमः सत्त्वं रजश्चैव भावाश्चैव तदात्मकाः । मनो बुद्धिश्च तेजश्च बुद्धिगम्यानि तत्त्वतः ॥ पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और अग्नि—ये पाँच भूत; क्रमशः इन भूतोंके गुण; भाव-अभाव; सत्त्व, रज, तम, सात्त्विक, राजस और तामस भाव; मन, बुद्धि और तेज—ये वास्तवमें बुद्धिगम्य हैं ॥

जायन्ते तात तस्माद्धि तिष्ठते तेष्वसौ विभुः । संचिन्त्य बहुधा बुद्ध्या नाध्यवस्यामहे परम् ॥ तस्य देवस्य तत्त्वेन तन्नः शंस यथातथम् । तात! ये सब उन्हीं श्रीहरिसे उत्पन्न होते हैं और वे भगवान् इन सबमें व्यापकरूपसे स्थित हैं। हम उनके विषयमें अपनी बुद्धिके द्वारा नाना प्रकारसे विचार करते हैं तथापि किसी उत्तम निश्चयपर नहीं पहुँच पाते, अतः आप यथार्थ रूपसे हमें उनका तत्त्व बताइये ॥

सुपर्ण उवाच

स्थूलतो यस्तु भगवांस्तेनैव स्वेन हेतुना । त्रैलोक्यस्य तु रक्षार्थं दृश्यते रूपमास्थितः ॥ गरुडजीने कहा—महात्माओ! जो स्थूलस्वरूप भगवान् हैं, वे तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये उसी कारणभूत अपने स्वरूपसे लोगोंको दृष्टिगोचर होते हैं ॥

मया तु महदाश्चर्यं पुरा दृष्टं सनातने ।

देवे श्रीवत्सनिलये तच्छृणुध्वमशेषतः ॥ मैंने पूर्वकालमें श्रीवत्सचिह्नके आश्रयभूत सनातन-देव श्रीहरिके विषयमें जो महान् आश्चर्यकी बात देखी है, वह सब बताता हूँ, सुनिये ॥ न स्म शक्यो मया वेत्तुं न भवद्भिः कथंचन ॥ यथा मां प्राह भगवांस्तथा तच्छ्रूयतां मम । मैं या आपलोग कोई भी किसी तरह भगवान्के यथार्थ स्वरूपको नहीं जान सकते। भगवान्ने स्वयं ही अपने विषयमें मुझसे जो कुछ जैसा कहा है, वह उसी रूपमें सुनिये ॥ मयामृतं देवतानां मिषतामृषिसत्तमाः ॥ हृतं विपाट्य तं यन्त्रं विद्राव्यामृतरक्षिणः । देवता विमुखीकृत्य सेन्द्राः समरुतो मृधे ॥ तं दृष्ट्वा मम विक्रान्तं वागुवाचाशरीरिणी । मुनिश्रेष्ठगण! मैंने देवताओंके देखते-देखते उनके रक्षायन्त्रको विदीर्ण करके अमृतके रक्षकोंको खदेड़कर युद्धमें इन्द्र और मरुद्गणोंसहित सम्पूर्ण देवताओंको पराजित करके शीघ्र ही अमृतका अपहरण कर लिया। मेरे उस पराक्रमको देखकर आकाशवाणीने कहा ॥

अशरीरिणी वागुवाच

प्रीतोऽस्मि ते वैनतेय कर्मणानेन सुव्रत । अवृथा तेऽस्तु मद्वाक्यं ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ **आकाशवाणी बोली—**उत्तम व्रतका पालन करनेवाले विनतानन्दन! मैं तुम्हारे इस पराक्रमसे बहुत प्रसन्न हूँ। मेरी यह वाणी व्यर्थ नहीं जानी चाहिये; इसलिये बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा मनोरथ पूर्ण करूँ? ॥

सुपर्ण उवाच

तामेवंवादिनीं वाचमहं प्रत्युक्तवांस्तदा । ज्ञातुमिच्छामि कस्त्वं हि ततो मे दास्यसे वरम् ॥ **गरुड कहते हैं—**ऋषिगण! आकाशवाणीकी ऐसी बात सुनकर मैंने उस समय यों उत्तर दिया—'पहले मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप कौन हैं? फिर मुझे वर दीजियेगा' ॥ ततो जलदगम्भीरं प्रहस्य गदतां वरः । उवाच वरदः प्रीतः काले त्वं माभिवेत्स्यसि ॥ तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ वरदायक भगवान्ने बड़े जोरसे हँसकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें प्रसन्नतापूर्वक कहा—'समय आनेपर मेरे विषयमें तुम सब कुछ जान लोगे ॥ वाहनं भव मे साधु वरं दद्मि तवोत्तमम् । न ते वीर्येण सदृशः कश्चिल्लोके भविष्यति ॥ पतङ्ग पततां श्रेष्ठ न देवो नापि दानवः ।