भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1493, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1493

'गर्भवती स्त्री और वृद्ध आदिके भोजन करनेसे पहले भोजन नहीं करते हैं। पूर्वाह्नमें जुआ नहीं खेलते और दिनमें नींद नहीं लेते हैं ।। १३ ।। एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्गुणैर्युक्तान् कथं कपान् । विजेष्यथ निवर्तध्वं निवृत्तानां सुखं हि वः ।। १४ ।। 'इनसे तथा अन्य बहुत-से गुणोंद्वारा संयुक्त हुए कप नामक दानवोंको आपलोग क्यों पराजित करना चाहते हैं? इस अवांछनीय कार्यसे निवृत्त होइये, क्योंकि निवृत्त होनेसे ही आपलोगोंको सुख मिलेगा' ।। १४ ।।

ब्राह्मणा ऊचुः कपान्वयं विजेष्यामो ये देवास्ते वयं स्मृताः । तस्माद् वध्याः कपाऽस्माकं धनिन् याहि यथाऽऽगतम् ।। १५ ।। तब ब्राह्मणोंने कहा—जो देवता हैं, वे हमलोग हैं; अतः देवद्रोही कप हमारे लिये वध्य हैं। इसलिये हम कपोंके कुलको पराजित करेंगे। धनी! तुम जैसे आये हो उसी तरह लौट जाओ ।। १५ ।। धनी गत्वा कपानाह न वो विप्राः प्रियंकराः । गृहीत्वास्त्राण्यतो विप्रान् कपाः सर्वे समाद्रवन् ।। १६ ।। धनीने जाकर कपोंसे कहा—'ब्राह्मणलोग आपका प्रिय करनेको उद्यत नहीं हैं।' यह सुनकर अस्त्र-शस्त्र हाथमें ले सभी कप ब्राह्मणोंपर टूट पड़े ।। १६ ।। समुदग्रध्वजान् दृष्ट्वा कपान् सर्वे द्विजातयः । व्यसृजन् ज्वलितानग्नीन् कपानां प्राणनाशनान् ।। १७ ।। उनकी ऊँची ध्वजाएँ फहरा रही थीं। कपोंको आक्रमण करते देख सभी ब्राह्मण उन कपोंपर प्रज्वलित एवं प्राणनाशक अग्निका प्रहार करने लगे ।। १७ ।। ब्रह्मसृष्टा हव्यभुजः कपान् हत्वा सनातनाः । नभसीव यथाभ्राणि व्यराजन्त नराधिप ।। १८ ।। नरेश्वर! ब्राह्मणोंके छोड़े हुए सनातन अग्निदेव उन कपोंका संहार करके आकाशमें बादलोंके समान प्रकाशित होने लगे ।। १८ ।। हत्वा वै दानवान् देवाः सर्वे सम्भूय संयुगे । तेनाभ्यजानन् हि तदा ब्राह्मणैर्निहतान् कपान् ।। १९ ।। उस समय सब देवताओंने युद्धमें संगठित होकर दानवोंका संहार कर डाला। किंतु उस समय उन्हें यह मालूम नहीं था कि ब्राह्मणोंने कपोंका विनाश कर डाला है ।। १९ ।। अथागम्य महातेजा नारदोऽकथयद् विभो । यथा हता महाभागैस्तेजसा ब्राह्मणैः कपाः ।। २० ।।