भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1497, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1497

पार्थ! पुराणोंमें जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके (अलग-अलग) धर्म बतलाये गये हैं तथा सब वर्णोंके लोग जिस-जिस धर्मकी उपासना करते हैं, वह सब मैंने तुम्हें सुना दिया है। अब जो कुछ बाकी रह गया हो, उसकी भगवान् श्रीकृष्णसे शिक्षा लो ॥ ५ ॥

अहं ह्येनं वेद्मि तत्त्वेन कृष्णं
योऽयं हि यच्चास्य बलं पुराणम् ।
अमेयात्मा केशवः कौरवेन्द्र
सोऽयं धर्मं वक्ष्यति संशयेषु ॥ ६ ॥

इन श्रीकृष्णका जो स्वरूप है और जो इनका पुरातन बल है, उसे ठीक-ठीक मैं जानता हूँ। कौरवराज! भगवान् श्रीकृष्ण अप्रमेय हैं; अतः तुम्हारे मनमें संदेह होनेपर यही तुम्हें धर्मका उपदेश करेंगे ॥ ६ ॥

कृष्णः पृथिवीमसृजत् खं दिवं च
कृष्णस्य देहान्मेदिनी सम्बभूव ।
वराहोऽयं भीमबलः पुराणः
स पर्वतान् व्यसृजद् वै दिशश्च ॥ ७ ॥

श्रीकृष्णने ही इस पृथ्‍वी, आकाश और स्वर्गकी सृष्टि की है। इन्हींके शरीरसे पृथ्‍वीका प्रादुर्भाव हुआ है। यही भयंकर बलवाले वराहके रूपमें प्रकट हुए थे तथा इन्हीं पुराण-पुरुषने पर्वतों और दिशाओंको उत्पन्न किया है ॥ ७ ॥

अस्य चाधोऽथान्तरिक्षं दिवं च
दिशश्चतस्रो विदिशश्चतस्रः ।
सृष्टिस्तथैवेयमनुप्रसूता
स निर्ममे विश्वमिदं पुराणम् ॥ ८ ॥

अन्तरिक्ष, स्वर्ग, चारों दिशाएँ तथा चारों कोण—ये सब भगवान् श्रीकृष्णसे नीचे हैं। इन्हींसे सृष्टिकी परम्परा प्रचलित हुई है तथा इन्होंने ही इस प्राचीन विश्वका निर्माण किया है ॥ ८ ॥

अस्य नाभ्यां पुष्करं सम्प्रसूतं
यत्रोत्पन्नः स्वयमेवामितौजाः ।
तेनाच्छिन्नं तत् तमः पार्थ घोरं
यत् तत् तिष्ठत्यर्णवं तर्जयानम् ॥ ९ ॥

कुन्तीनन्दन! सृष्टिके आरम्भमें इनकी नाभिसे कमल उत्पन्न हुआ और उसीके भीतर अमित तेजस्वी ब्रह्माजी स्वतः प्रकट हुए। जिन्होंने उस घोर अन्धकारका नाश किया है, जो समुद्रको भी डाँट बताता हुआ सब ओर व्याप्त हो रहा था (अर्थात् जो अगाध और अपार था) ॥ ९ ॥

कृते युगे धर्म आसीत् समग्र-