महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1498, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्त्रेताकाले ज्ञानमनुप्रपन्नः । बलं त्वासीद् द्वापरे पार्थ कृष्णः कलौ त्वधर्मः क्षितिमेवाजगाम ॥ १० ॥ पार्थ! सत्ययुगमें श्रीकृष्ण सम्पूर्ण धर्मरूपसे विराजमान थे, त्रेतामें पूर्णज्ञान या विवेकरूपमें स्थित थे, द्वापरमें बलरूपसे स्थित हुए थे और कलियुगमें अधर्मरूपसे इस पृथ्वीपर आयेंगे (अर्थात् उस समय अधर्म ही बलवान् होगा) ॥ १० ॥
स एव पूर्वं निजघान दैत्यान् स पूर्वदेवश्च बभूव सम्राट् । स भूतानां भावनो भूतभव्यः स विश्वस्यास्य जगतश्चाभिगोप्ता ॥ ११ ॥ इन्होंने ही प्राचीनकालमें दैत्योंका संहार किया और ये ही दैत्यसम्राट् बलिके रूपमें प्रकट हुए। ये भूतभावन प्रभु ही भूत और भविष्य इनके ही स्वरूप हैं तथा ये ही इस सम्पूर्ण जगत्के रक्षा करनेवाले हैं ॥ ११ ॥
यदा धर्मो ग्लाति वंशे सुराणां तदा कृष्णो जायते मानुषेषु । धर्मे स्थित्वा स तु वै भावितात्मा परांश्च लोकानपरांश्च पाति ॥ १२ ॥ जब धर्मका ह्रास होने लगता है, तब ये शुद्ध अन्तःकरणवाले श्रीकृष्ण देवताओं तथा मनुष्योंके कुलमें अवतार लेकर स्वयं धर्ममें स्थित हो उसका आचरण करते हुए उसकी स्थापना तथा पर और अपर लोकोंकी रक्षा करते हैं ॥ १२ ॥
त्याज्यं त्यक्त्वा चासुराणां वधाय कार्याकार्ये कारणं चैव पार्थ । कृतं करिष्यत् क्रियते च देवो राहुं सोमं विद्धि च शक्रमेनम् ॥ १३ ॥ कुन्तीनन्दन! ये त्याज्य वस्तुका त्याग करके असुरोंका वध करनेके लिये स्वयं कारण बनते हैं। कार्य, अकार्य और कारण सब इन्हींके स्वरूप हैं। ये नारायणदेव ही भूत, भविष्य और वर्तमान कालमें किये जानेवाले कर्मरूप हैं। तुम इन्हींको राहु, चन्द्रमा और इन्द्र समझो ॥ १३ ॥
स विश्वकर्मा स हि विश्वरूपः स विश्वभुग् विश्वसृग् विश्वजिच्च । स शूलभृच्छोणितभृत् कराल- स्तं कर्मभिर्विदितं वै स्तुवन्ति ॥ १४ ॥