भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1499, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1499

श्रीकृष्ण ही विश्वकर्मा, विश्वरूप, विश्वभोक्ता, विश्वविधाता और विश्वविजेता हैं। वे ही एक हाथमें त्रिशूल और दूसरे हाथमें रक्तसे भरा खप्पर लिये विकरालरूप धारण करते हैं। अपने नाना प्रकारके कर्मोंसे जगत्में विख्यात हुए श्रीकृष्णकी ही सब लोग स्तुति करते हैं॥ १४॥

तं गन्धर्वाणामप्सरसां च नित्य- मुपतिष्ठन्ते विबुधानां शतानि । तं राक्षसाश्च परिसंवदन्ति रायस्पोषः स विजिगीषुरेकः ॥ १५ ॥

सैकड़ों गन्धर्व, अप्सराएँ तथा देवता सदा इनकी सेवामें उपस्थित रहते हैं। राक्षस भी इनसे सम्मति लिया करते हैं। एकमात्र ये ही धनके रक्षक और विजयके अभिलाषी हैं॥ १५॥

तमध्वरे शंसितारः स्तुवन्ति रथन्तरे सामगाश्च स्तुवन्ति । तं ब्राह्मणा ब्रह्ममन्त्रैः स्तुवन्ति तस्मै हविरध्वर्यवः कल्पयन्ति ॥ १६ ॥

यज्ञमें स्तोतालोग इन्हींकी स्तुति करते हैं। सामगान करनेवाले विद्वान् रथन्तर साममें इन्हींके गुण गाते हैं। वेदवेत्ता ब्राह्मण वेदके मन्त्रोंसे इन्हींका स्तवन करते हैं और यजुर्वेदी अध्वर्यु यज्ञमें इन्हींको हविष्यका भाग देते हैं॥ १६॥

स पौराणीं ब्रह्मगुहां प्रविष्टो महीसत्रं भारताग्रे ददर्श । स चैव गामुद्दधाराग्र्यकर्मा विक्षोभ्य दैत्यानुरगान् दानवांश्च ॥ १७ ॥

भारत! इन्होंने ही पूर्वकालमें ब्रह्मरूप पुरातन गुहामें प्रवेश करके इस पृथ्वीका जलमें प्रलय होना देखा है। इन सृष्टिकर्म करनेवाले श्रीकृष्णने दैत्यों, दानवों तथा नागोंको विक्षुब्ध करके इस पृथ्वीका रसातलसे उद्धार किया है॥ १७॥

तं घोषार्थे गीर्भिरिन्द्राः स्तुवन्ति स चापीशो भारतैकः पशूनाम् । तस्य भक्षान् विविधान् वेदयन्ति तमेवाजौ वाहनं वेदयन्ति ॥ १८ ॥

व्रजकी रक्षाके लिये गोवर्द्धन पर्वत उठानेके समय इन्द्र आदि देवताओंने इनकी स्तुति की थी। भरतनन्दन! ये एकमात्र श्रीकृष्ण ही समस्त पशुओं (जीवों)-के अधिपति हैं। इनको नाना प्रकारके भोजन अर्पित किये जाते हैं। युद्धमें ये ही विजय दिलानेवाले माने जाते हैं॥ १८॥