महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
श्रीकृष्ण ही विश्वकर्मा, विश्वरूप, विश्वभोक्ता, विश्वविधाता और विश्वविजेता हैं। वे ही एक हाथमें त्रिशूल और दूसरे हाथमें रक्तसे भरा खप्पर लिये विकरालरूप धारण करते हैं। अपने नाना प्रकारके कर्मोंसे जगत्में विख्यात हुए श्रीकृष्णकी ही सब लोग स्तुति करते हैं॥ १४॥
तं गन्धर्वाणामप्सरसां च नित्य- मुपतिष्ठन्ते विबुधानां शतानि । तं राक्षसाश्च परिसंवदन्ति रायस्पोषः स विजिगीषुरेकः ॥ १५ ॥
सैकड़ों गन्धर्व, अप्सराएँ तथा देवता सदा इनकी सेवामें उपस्थित रहते हैं। राक्षस भी इनसे सम्मति लिया करते हैं। एकमात्र ये ही धनके रक्षक और विजयके अभिलाषी हैं॥ १५॥
तमध्वरे शंसितारः स्तुवन्ति रथन्तरे सामगाश्च स्तुवन्ति । तं ब्राह्मणा ब्रह्ममन्त्रैः स्तुवन्ति तस्मै हविरध्वर्यवः कल्पयन्ति ॥ १६ ॥
यज्ञमें स्तोतालोग इन्हींकी स्तुति करते हैं। सामगान करनेवाले विद्वान् रथन्तर साममें इन्हींके गुण गाते हैं। वेदवेत्ता ब्राह्मण वेदके मन्त्रोंसे इन्हींका स्तवन करते हैं और यजुर्वेदी अध्वर्यु यज्ञमें इन्हींको हविष्यका भाग देते हैं॥ १६॥
स पौराणीं ब्रह्मगुहां प्रविष्टो महीसत्रं भारताग्रे ददर्श । स चैव गामुद्दधाराग्र्यकर्मा विक्षोभ्य दैत्यानुरगान् दानवांश्च ॥ १७ ॥
भारत! इन्होंने ही पूर्वकालमें ब्रह्मरूप पुरातन गुहामें प्रवेश करके इस पृथ्वीका जलमें प्रलय होना देखा है। इन सृष्टिकर्म करनेवाले श्रीकृष्णने दैत्यों, दानवों तथा नागोंको विक्षुब्ध करके इस पृथ्वीका रसातलसे उद्धार किया है॥ १७॥
तं घोषार्थे गीर्भिरिन्द्राः स्तुवन्ति स चापीशो भारतैकः पशूनाम् । तस्य भक्षान् विविधान् वेदयन्ति तमेवाजौ वाहनं वेदयन्ति ॥ १८ ॥
व्रजकी रक्षाके लिये गोवर्द्धन पर्वत उठानेके समय इन्द्र आदि देवताओंने इनकी स्तुति की थी। भरतनन्दन! ये एकमात्र श्रीकृष्ण ही समस्त पशुओं (जीवों)-के अधिपति हैं। इनको नाना प्रकारके भोजन अर्पित किये जाते हैं। युद्धमें ये ही विजय दिलानेवाले माने जाते हैं॥ १८॥
तस्यान्तरिक्षं पृथिवी दिवं च सर्वं वशे तिष्ठति शाश्वतस्य । स कुम्भे रेतः ससृजे सुराणां यत्रोत्पन्नमृषिमाहुर्वसिष्ठम् ॥ १९ ॥ पृथ्वी, आकाश और स्वर्गलोक सभी इन सनातन पुरुष श्रीकृष्णके वशमें रहते हैं। इन्होंने कुम्भमें देवताओं (मित्र और वरुण)-का वीर्य स्थापित किया था; जिससे महर्षि वसिष्ठकी उत्पत्ति हुई बतायी जाती है ॥ १९ ॥
स मातरिश्वा विभुरश्ववाजी स रश्मिवान् सविता चादिदेवः । तेनासुरा विजिताः सर्व एव तद्विक्रान्तैर्विजितानीह त्रीणि ॥ २० ॥ ये ही सर्वत्र विचरनेवाले वायु हैं, तीव्रगामी अश्व हैं, सर्वव्यापी हैं, अंशुमाली सूर्य और आदि देवता हैं। इन्होंने ही समस्त असुरोंपर विजय पायी तथा इन्होंने ही अपने तीन पदोंसे तीनों लोकोंको नाप लिया था ॥ २० ॥
स देवानां मानुषाणां पितॄणां तमेवाहुर्यज्ञविदां वितानम् । स एव कालं विभजन्नुदेति तस्योत्तरं दक्षिणं चायने द्वे ॥ २१ ॥ ये श्रीकृष्ण सम्पूर्ण देवताओं, पितरों और मनुष्योंके आत्मा हैं। इन्हींको यज्ञवेत्ताओंका यज्ञ कहा गया है। ये ही दिन और रातका विभाग करते हुए सूर्यरूपमें उदित होते हैं। उत्तरायण और दक्षिणायन इन्हींके दो मार्ग हैं ॥ २१ ॥
तस्यैवोर्ध्वं तिर्यगधश्चरन्ति गभस्तयो मेदिनीं भासयन्तः । तं ब्राह्मणा वेदविदो जुषन्ति तस्यादित्यो भामुपयुज्य भाति ॥ २२ ॥ इन्हींके ऊपर-नीचे तथा अगल-बगलमें पृथ्वीको प्रकाशित करनेवाली किरणें फैलती हैं। वेदवेत्ता ब्राह्मण इन्हींकी सेवा करते हैं और इन्हींके प्रकाशका सहारा लेकर सूर्यदेव प्रकाशित होते हैं ॥ २२ ॥
स मासि मास्यध्वरकृद् विधत्ते तमध्वरे वेदविदः पठन्ति । स एवोक्तश्चक्रमिदं त्रिनाभि सप्ताश्वयुक्तं वहते वै त्रिधाम ॥ २३ ॥
ये यज्ञकर्ता श्रीकृष्ण प्रत्येक मासमें यज्ञ करते हैं। प्रत्येक यज्ञमें वेदज्ञ ब्राह्मण इन्हींके गुण गाते हैं। ये ही तीन नाभियों, तीन धामों और सात अश्वोंसे युक्त इस संवत्सर-चक्रको धारण करते हैं ।। २३ ।।
महातेजाः सर्वगः सर्वसिंहः कृष्णो लोकान् धारयते यथैकः । हंसं तमोध्नं च तमेव वीर कृष्णं सदा पार्थ कर्तारमेहि ।। २४ ।।
वीर कुन्तीनन्दन! ये महातेजस्वी और सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले सर्वसिंह श्रीकृष्ण अकेले ही सम्पूर्ण जगत्को धारण करते हैं। तुम इन श्रीकृष्णको ही अन्धकारनाशक सूर्य और समस्त कार्योंका कर्ता समझो ।। २४ ।।
स एकदा कक्षगतो महात्मा तृप्तो विभुः खाण्डवे धूमकेतुः । स राक्षसानुरगांश्चावजित्य सर्वत्रगः सर्वमग्नौ जुहोति ।। २५ ।।
इन्हीं महात्मा वासुदेवने एक बार अग्निस্বরূপ होकर खाण्डव वनकी सूखी लकड़ियोंमें व्याप्त हो पूर्णतः तृप्तिका अनुभव किया था। ये सर्वव्यापी प्रभु ही राक्षसों और नागोंको जीतकर सबको अग्निमें ही होम देते हैं ।। २५ ।।
स एव पार्थाय श्वेतमश्वं प्रायच्छत् स एवाश्वानथ सर्वांश्चकार । स बन्धुरस्तस्य रथस्त्रिचक्र- स्त्रिवृच्छिराश्चतुरश्वस्त्रिनाभिः ।। २६ ।।
इन्होंने ही अर्जुनको श्वेत अश्व प्रदान किया था। इन्होंने ही समस्त अश्वोंकी सृष्टि की थी। ये ही संसाररूपी रथको बाँधनेवाले बन्धन हैं। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण ही इस रथके चक्र हैं। ऊर्ध्व, मध्य और अधः—जिसकी गति है। काल, अदृष्ट, इच्छा और संकल्प—ये चार जिसके घोड़े हैं। सफेद, काला और लाल रंगका त्रिविध कर्म ही जिसकी नाभि है। वह संसार-रथ इन श्रीकृष्णके ही अधिकारमें है ।। २६ ।।
स विहायो व्यदधात् पञ्चनाभिः स निर्ममे गां दिवमन्तरिक्षम् । सोऽरण्यानि व्यसृजत् पर्वतांश्च हृषीकेशोऽमितदीप्ताग्नितेजाः ।। २७ ।।
पाँचों भूतोंके आश्रयरूप श्रीकृष्णने ही आकाशकी सृष्टि की है। इन्होंने ही पृथ्वी, स्वर्गलोक और अन्तरिक्षकी रचना की है, अत्यन्त प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी इन हृषीकेशने ही वन और पर्वतोंको उत्पन्न किया है ।। २७ ।।
अलंघयद वै सरितो जिघांसन्
शक्रं वज्रं प्रहरन्तं निरास ।
स महेन्द्रः स्तूयते वै महाध्वरे
विप्रैरेको ऋक्सहस्रैः पुराणैः ॥ २८ ॥
इन्हीं वासुदेवने वज्रका प्रहार करनेके लिये उद्यत हुए इन्द्रको मार डालनेकी इच्छासे कितनी ही सरिताओंको लाँघा और उन्हें परास्त किया था। वे ही महेन्द्ररूप हैं। ब्राह्मण बड़े-बड़े यज्ञोंमें सहस्रों पुरानी ऋचाओंंद्वारा एकमात्र इन्हींकी स्तुति करते हैं ॥ २८ ॥
दुर्वासा वै तेन नान्येन शक्यो
गृहे राजन् वासयितुं महौजाः ।
तमेवाहुर्ऋषिमेकं पुराणं
स विश्वकृद् विधात्यात्मभावान् ॥ २९ ॥
राजन्! इन श्रीकृष्णके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है जो अपने घरमें महातेजस्वी दुर्वासाको ठहरा सके। इनको ही अद्वितीय पुरातन ऋषि कहते हैं। ये ही विश्वनिर्माता हैं और अपने स्वरूपसे ही अनेक पदार्थोंकी सृष्टि करते रहते हैं ॥ २९ ॥
वेदांश्च यो वेदयतेऽधिदेवो
विधींश्च यश्चाश्रयते पुराणान् ।
कामे वेदे लौकिके यत्फलं च
विष्वक्सेनः सर्वमेतत् प्रतीहि ॥ ३० ॥
ये देवताओंके देवता होकर भी वेदोंका अध्ययन करते और प्राचीन विधियोंका आश्रय लेते हैं। लौकिक और वैदिक कर्मका जो फल है, वह सब श्रीकृष्ण ही हैं ऐसा विश्वास करो ॥ ३० ॥
ज्योतींषि शुक्लानि हि सर्वलोके
त्रयो लोका लोकपालास्त्रयश्च ।
त्रयोऽग्नयो व्याहृतयश्च तिस्रः
सर्वे देवा देवकीपुत्र एव ॥ ३१ ॥
ये ही सम्पूर्ण लोकोंकी शुक्लज्योति हैं तथा तीनों लोक, तीनों लोकपाल, त्रिविध अग्नि, तीनों व्याहृतियाँ और सम्पूर्ण देवता भी ये देवकीनन्दन श्रीकृष्ण ही हैं ॥ ३१ ॥
स वत्सरः स ऋतुः सोऽर्धमासः
सोऽहोरात्रः स कला वै स काष्ठाः ।
मात्रा मुहूर्ताश्च लवाः क्षणाश्च
विष्वक्सेनः सर्वमेतत् प्रतीहि ॥ ३२ ॥
संवत्सर, ऋतु, पक्ष, दिन-रात, कला, काष्ठा, मात्रा, मुहूर्त, लव और क्षण—इन सबको श्रीकृष्णका ही स्वरूप समझो ॥ ३२ ॥
चन्द्रादित्यौ ग्रहनक्षत्रताराः सर्वाणि दर्शान्यथ पौर्णमासम् । नक्षत्रयोगा ऋतवश्च पार्थ विष्वक्सेनात् सर्वमेतत् प्रसूतम् ॥ ३३ ॥ पार्थ! चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र, तारा, अमावास्या, पौर्णमासी, नक्षत्रयोग तथा ऋतु— इन सबकी उत्पत्ति श्रीकृष्णसे ही हुई है ॥ ३३ ॥
रुद्रादित्या वसवोऽथाश्विनौ च साध्याश्च विश्वे मरुतां गणाश्च । प्रजापतिर्देवमातादितिश्च सर्वे कृष्णादृषयश्चैव सप्त ॥ ३४ ॥ रुद्र, आदित्य, वसु अश्विनीकुमार, साध्य, विश्वेदेव, मरुद्गण, प्रजापति, देवमाता अदिति और सप्तर्षि—ये सब-के-सब श्रीकृष्णसे ही प्रकट हुए हैं ॥ ३४ ॥
वायुर्भूत्वा विक्षिपेते च विश्व- मग्निर्भूत्वा दहते विश्वरूपः । आपो भूत्वा मज्जयते च सर्वं ब्रह्मा भूत्वा सृजते विश्वसंघान् ॥ ३५ ॥ ये विश्वरूप श्रीकृष्ण ही वायुरूप धारण करके संसारको चेष्टा प्रदान करते हैं, अग्निरूप होकर सबको भस्म करते हैं, जलका रूप धारण करके जगत्को डुबाते हैं और ब्रह्मा होकर सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करते हैं ॥ ३५ ॥
वेद्यं च यद् वेदयते च वेद्यं विधिश्च यश्च श्रयते विधेयम् । धर्मे च वेदे च बले च सर्वं चराचरं केशवं त्वं प्रतीहि ॥ ३६ ॥ ये स्वयं वेद्यस्वरूप होकर भी वेदवेद्य तत्त्वको जाननेका प्रयत्न करते हैं। विधिरूप होकर भी विहित कर्मोंका आश्रय लेते हैं। ये ही धर्म, वेद और बलमें स्थित हैं। तुम यह विश्वास करो कि सारा चराचर जगत् श्रीकृष्णका ही स्वरूप है ॥ ३६ ॥
ज्योतिर्भूतः परमोऽसौ पुरस्तात् प्रकाशते यत्प्रभया विश्वरूपः । अपः सृष्ट्वा सर्वभूतात्मयोनिः पुराकरोत् सर्वमेवाथ विश्वम् ॥ ३७ ॥ ये विश्वरूपधारी श्रीकृष्ण परम ज्योतिर्मय सूर्यका रूप धारण करके पूर्व दिशामें प्रकट होते हैं। जिनकी प्रभासे सारा जगत् प्रकाशित होता है। ये समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिके
स्थान हैं। इन्होंने पूर्वकालमें पहले जलकी सृष्टि करके फिर सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न किया था॥ ३७ ॥
ऋतूनुत्पातान् विविधान्यद्भुतानि मेघान् विद्युत्सर्वमैरावतं च। सर्वं कृष्णात् स्थावरं जङ्गमं च विश्वात्मानं विष्णुमेनं प्रतीहि॥ ३८ ॥ ऋतु, नाना प्रकारके उत्पात, अनेकानेक अद्भुत पदार्थ, मेघ, बिजली, ऐरावत और सम्पूर्ण चराचर जगत्की इन्हींसे उत्पत्ति हुई है। तुम इन्हींको समस्त विश्वका आत्मा—विष्णु समझो॥ ३८ ॥
विश्वावासं निर्गुणं वासुदेवं संकर्षणं जीवभूतं वदन्ति। ततः प्रद्युम्नमनिरुद्धं चतुर्थ- माज्ञापयत्यात्मयोनिर्महात्मा॥ ३९ ॥ ये विश्वके निवासस्थान और निर्गुण हैं। इन्हींको वासुदेव, जीवभूत संकर्षण, प्रद्युम्न और चौथा अनिरुद्ध कहते हैं। ये आत्मयोनि परमात्मा सबको अपनी आज्ञाके अधीन रखते हैं॥ ३९ ॥
स पञ्चाधा पञ्चजनोपपन्नं संचोदयन् विश्वमिदं सिसृक्षुः। ततश्चकारावनिमारुतौ च खं ज्योतिरम्भश्च तथैव पार्थ॥ ४० ॥ कुन्तीकुमार! ये देवता, असुर, मनुष्य, पितर और तिर्यग् रूपसे पाँच प्रकारके संसारकी सृष्टि करनेकी इच्छा रखकर पञ्चभूतोंसे युक्त जगत्के प्रेरक होकर सबको अपने अधीन रखते हैं। उन्होंने ही क्रमशः पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाशकी सृष्टि की है॥ ४० ॥
स स्थावरं जङ्गमं चैवमेत- च्चतुर्विधं लोकमिमं च कृत्वा। ततो भूमिं व्यदधात् पञ्चबीजां द्यौः पृथिव्यां धास्यति भूरि वारि॥ ४१ ॥ इन्होंने जरायुज आदि चार प्रकारके प्राणियोंसे युक्त इस चराचर जगत्की सृष्टि करके चतुर्विध भूत-समुदाय और कर्म—इन पाँचोंकी बीजरूपा भूमिका निर्माण किया। ये ही आकाशस्वरूप बनकर इस पृथ्वीपर प्रचुर जलकी वर्षा करते हैं॥ ४१ ॥
तेन विश्वं कृतमेतद्धि राजन् स जीवयत्यात्मनैवात्मयोनिः। ततो देवानसुरान् मानवांश्च
लोकानृषींश्चापि पितॄन् प्रजाश्च । समासेन विधिवत्प्राणिलोकान् सर्वान् सदा भूतपतिः सिसृक्षुः ॥ ४२ ॥ राजन्! इन्होंने ही इस विश्वको उत्पन्न किया है और ये ही आत्मयोनि श्रीकृष्ण अपनी ही शक्तिसे सबको जीवन प्रदान करते हैं। देवता, असुर, मनुष्य, लोक, ऋषि, पितर, प्रजा और संक्षेपतः सम्पूर्ण प्राणियोंको इन्हींसे जीवन मिलता है। ये भगवान् भूतनाथ ही सदा विधिपूर्वक समस्त भूतोंकी सृष्टिकी इच्छा रखते हैं ॥ ४२ ॥
शुभाशुभं स्थावरं जङ्गमं च विष्वक्सेनात् सर्वमेतत् प्रतीहि । यद् वर्तते यच्च भविष्यतीह सर्वं ह्येतत् केशवं त्वं प्रतीहि ॥ ४३ ॥ शुभ-अशुभ और स्थावर-जंगमरूप यह सारा जगत् श्रीकृष्णसे उत्पन्न हुआ है, इस बातपर विश्वास करो। भूत, भविष्य और वर्तमान सब श्रीकृष्णका ही स्वरूप है। यह तुम्हें अच्छी तरह समझ लेना चाहिये ॥ ४३ ॥
मृत्युश्चैव प्राणिनामन्तकाले साक्षात् कृष्णः शाश्वतो धर्मवाहः । भूतं च यच्चेह न विद्या किंचिद् विष्वक्सेनात् सर्वमेतत् प्रतीहि ॥ ४४ ॥ प्राणियोंका अन्तकाल आनेपर साक्षात् श्रीकृष्ण ही मृत्युरूप बन जाते हैं। ये धर्मके सनातन रक्षक हैं। जो बात बीत चुकी है तथा जिसका अभी कोई पता नहीं है, वे सब श्रीकृष्णसे ही प्रकट होते हैं, यह निश्चितरूपसे जान लो ॥ ४४ ॥
यत् प्रशस्तं च लोकेषु पुण्यं यच्च शुभाशुभम् । तत्सर्वं केशवोऽचिन्त्यो विपरीतमतः परम् ॥ ४५ ॥ तीनों लोकोंमें जो कुछ भी उत्तम, पवित्र तथा शुभ या अशुभ वस्तु है, वह सब अचिन्त्य भगवान् श्रीकृष्णका ही स्वरूप है, श्रीकृष्णसे भिन्न कोई वस्तु है, ऐसा सोचना अपनी विपरीत बुद्धिका ही परिचय देना है ॥ ४५ ॥
एतादृशः केशवोऽतश्च भूयो नारायणः परमश्चाव्ययश्च । मध्याद्यन्तस्य जगतस्तस्थुषश्च बुभूषतां प्रभवश्चाव्ययश्च ॥ ४६ ॥ भगवान् श्रीकृष्णकी ऐसी ही महिमा है। बल्कि ये इससे भी अधिक प्रभावशाली हैं। ये ही परम पुरुष अविनाशी नारायण हैं। ये ही स्थावर-जंगमरूप जगत्के आदि, मध्य और
अन्त हैं तथा संसारमें जन्म लेनेकी इच्छावाले प्राणियोंकी उत्पत्तिके कारण भी ये ही हैं। इन्हींको अविकारी परमात्मा कहते हैं ॥ ४६ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि महापुरुषमाहात्म्ये अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें महापुरुषमाहात्म्यविषयक एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५८ ॥
श्रीकृष्णका प्रद्युम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना
एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णका प्रद्युम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना
युधिष्ठिर उवाच
ब्रूहि ब्राह्मणपूजायां व्युष्टिं त्वं मधुसूदन ।
वेत्ता त्वमस्य चार्थस्य वेद त्वां हि पितामहः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— मधुसूदन! ब्राह्मणकी पूजा करनेसे क्या फल मिलता है? इसका आप ही वर्णन कीजिये; क्योंकि आप इस विषयको अच्छी तरह जानते हैं और मेरे पितामह भी आपको इस विषयका ज्ञाता मानते हैं ॥ १ ॥
वासुदेव उवाच
शृणुष्वावहितो राजन् द्विजानां भरतर्षभ ।
यथा तत्त्वेन वदतो गुणान् वै कुरुसत्तम ॥ २ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— कुरुकुलतिलक भरतभूषण नरेश! मैं ब्राह्मणोंके गुणोंका यथार्थरूपसे वर्णन करता हूँ, आप ध्यान देकर सुनिये ॥ २ ॥
द्वारवत्यां समासीनं पुरा मां कुरुनन्दन ।
प्रद्युम्नः परिपप्रच्छ ब्राह्मणैः परिकोपितः ॥ ३ ॥
कुरुनन्दन! पहलेकी बात है, एक दिन ब्राह्मणोंने मेरे पुत्र प्रद्युम्नको कुपित कर दिया। उस समय मैं द्वारकामें ही था। प्रद्युम्नने मुझसे आकर पूछा— ॥ ३ ॥
किं फलं ब्राह्मणेष्वस्ति पूजायां मधुसूदन ।
ईश्वरत्वं कुतस्तेषामिहैव च परत्र च ॥ ४ ॥
‘मधुसूदन! ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे क्या फल होता है? इहलोक और परलोकमें वे क्यों ईश्वरतुल्य माने जाते हैं? ॥ ४ ॥
सदा द्विजातीन् सम्पूज्य किं फलं तत्र मानद ।
एतद् ब्रूहि स्फुटं सर्वं सुमहान् संशयोऽत्र मे ॥ ५ ॥
‘मानद! सदा ब्राह्मणोंकी पूजा करके मनुष्य क्या फल पाता है? यह सब मुझे स्पष्टरूपसे बताइये, क्योंकि इस विषयमें मुझे महान् संदेह है’ ॥ ४ ॥
इत्युक्ते वचने तस्मिन् प्रद्युम्नेन तथा त्वहम् ।
प्रत्यब्रुवं महाराज यत् तच्छृणु समाहितः ॥ ६ ॥
व्युष्टिं ब्राह्मणपूजायां रौक्मिणेय निबोध मे ।
एते हि सोमराजान ईश्वराः सुखदुःखयोः ॥ ७ ॥
अस्मिँल्लोके रौक्मिणेय तथामुष्मिंश्च पुत्रक ।
महाराज! प्रद्युम्नके ऐसा कहनेपर मैंने उसको उत्तर दिया। रुक्मिणीनन्दन! ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे क्या फल मिलता है, यह मैं बता रहा हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। बेटा! ब्राह्मणोंके राजा सोम (चन्द्रमा) हैं। अतः ये इस लोक और परलोकमें भी सुख-दुःख देनेमें समर्थ होते हैं ।। ६-७ १/२ ।।
ब्राह्मणप्रमुखं सौम्यं न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥ ८ ॥
ब्राह्मणप्रतिपूजायामायुः कीर्तिर्यशो बलम् ।
लोका लोकेश्वराश्चैव सर्वे ब्राह्मणपूजकाः ॥ ९ ॥
ब्राह्मणोंमें शान्तभावकी प्रधानता होती है। इस विषयमें मुझे कोई विचार नहीं करना है। ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे आयु, कीर्ति, यश और बलकी प्राप्ति होती है। समस्त लोक और लोकेश्वर ब्राह्मणोंके पूजक हैं ।। ८-९ ।।
त्रिवर्गे चापवर्गे च यशःश्रीरोगशान्तिषु ।
देवतापितृपूजासु संतोष्याश्चैव नो द्विजाः ॥ १० ॥
धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये, मोक्षकी प्राप्तिके लिये और यश, लक्ष्मी तथा आरोग्यकी उपलब्धिके लिये एवं देवता और पितरोंकी पूजाके समय हमें ब्राह्मणोंको पूर्ण संतुष्ट करना चाहिये ।। १० ।।
तत्कथं वै नाद्रियेयमीश्वरोऽस्मीति पुत्रक ।
मा ते मन्युर्महाबाहो भवत्वत्र द्विजान् प्रति ॥ ११ ॥
बेटा! ऐसी दशामें मैं ब्राह्मणोंका आदर कैसे नहीं करूँ? महाबाहो! मैं ईश्वर (सब कुछ करनेमें समर्थ) हूँ—ऐसा मानकर तुम्हें ब्राह्मणोंके प्रति क्रोध नहीं करना चाहिये ।। ११ ।।
ब्राह्मणा हि महद्भूतमस्मिँल्लोके परत्र च ।
भस्म कुर्य्युर्जगदिदं क्रुद्धाः प्रत्यक्षदर्शिनः ॥ १२ ॥
ब्राह्मण इस लोक और परलोकमें भी महान् माने गये हैं। वे सब कुछ प्रत्यक्ष देखते हैं और यदि क्रोधमें भर जायँ तो इस जगत्को भस्म कर सकते हैं ।। १२ ।।
अन्यान्पि सृजेयुश्च लोकाँल्लोकेश्वरांस्तथा ।
कथं तेषु न वर्तेरन् सम्यग् ज्ञानात् सुतेजसः ॥ १३ ॥
दूसरे-दूसरे लोक और लोकपालोंकी वे सृष्टि कर सकते हैं। अतः तेजस्वी पुरुष ब्राह्मणोंके महत्त्वको अच्छी तरह जानकर भी उनके साथ सद्वर्ताव क्यों न करेंगे? ।। १३ ।।
अवसन्मद्गृहे तात ब्राह्मणो हरिपिङ्गलः ।
चीरवासा बिल्वदण्डी दीर्घश्मश्रुः कृशो महान् ॥ १४ ॥
तात! पहलेकी बात है, मेरे घरमें एक हरित-पिंगल वर्णवाले ब्राह्मणने निवास किया था। वह चिथड़े पहिनता और बेलका डंडा हाथमें लिये रहता था। उसकी मूँछें और दाढ़ियाँ बढ़ी हुई थीं। वह देखनेमें दुबला-पतला और ऊँचे कदका था ॥ १४ ॥ दीर्घेभ्यश्च मनुष्येभ्यः प्रमाणादधिको भुवि । स स्वैरं चरते लोकान् ये दिव्या ये च मानुषाः ॥ १५ ॥ इस भूतलपर जो बड़े-से-बड़े मनुष्य हैं, उन सबसे वह अधिक लंबा था और दिव्य तथा मानव लोकोंमें इच्छानुसार विचरण करता था ॥ १५ ॥ इमां गाथां गायमानश्चत्वरेषु सभासु च । दुर्वाससं वासयेत् को ब्राह्मणं सत्कृतं गृहे ॥ १६ ॥ वे ब्राह्मण देवता जिस समय यहाँ पधारे थे, उस समय धर्मशालाओंमें और चौराहोंपर यह गाथा गाते फिरते थे कि 'कौन मुझ दुर्वासा ब्राह्मणको अपने घरमें सत्कारपूर्वक ठहरायेगा ॥ १६ ॥ रोषणः सर्वभूतानां सूक्ष्मेऽप्यपकृते कृते । परिभाषां च मे श्रुत्वा को नु दद्यात् प्रतिश्रयम् ॥ १७ ॥ यो मां कश्चिद् वासयीत न स मां कोपयेदिति । 'यदि मेरा थोड़ा-सा भी अपराध बन जाय तो मैं समस्त प्राणियोंपर अत्यन्त कुपित हो उठता हूँ। मेरे इस भाषणको सुनकर कौन मेरे लिये ठहरनेका स्थान देगा? जो कोई मुझे अपने घरमें ठहराये, वह मुझे क्रोध न दिलाये। इस बातके लिये उसे सतत सावधान रहना होगा' ॥ १७ ½ ॥ यस्मान्नाद्रियते कश्चित् ततोऽहं समवासयम् ॥ १८ ॥ स सम्भुङ्क्ते सहस्राणां बहूनामन्नमेकदा । एकदा सोऽल्पकं भुङ्क्ते न चैवैति पुनर्गृहम् ॥ १९ ॥ बेटा! जब कोई भी उनका आदर न कर सका तब मैंने उन्हें अपने घरमें ठहराया। वे कभी तो एक ही समय इतना अन्न भोजन कर लेते थे, जितनेसे कई हजार मनुष्य तृप्त हो सकते थे और कभी बहुत थोड़ा अन्न खाते तथा घरसे निकल जाते थे। उस दिन फिर घरको नहीं लौटते थे ॥ १८-१९ ॥ अकस्माच्च प्रहसति तथाकस्मात् प्ररोदिति । न चास्य वयसा तुल्यः पृथिव्यामभवत् तदा ॥ २० ॥ वे अकस्मात् जोर-जोरसे हँसने लगते और अचानक फूट-फूटकर रो पड़ते थे। उस समय इस पृथ्वीपर उनका समवयस्क कोई नहीं था ॥ २० ॥ अथ स्वावसथं गत्वा स शय्यास्तरणानि च । कन्याश्चालंकृता दग्ध्वा ततो व्यपगतः पुनः ॥ २१ ॥
एक दिन अपने ठहरनेके स्थानपर जाकर वहाँ बिछी हुई शय्याओं, बिछौनों और वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हुई कन्याओंको उन्होंने जलाकर भस्म कर दिया और स्वयं वहाँसे खिसक गये ।। २१ ।।
अथ मामब्रवीद् भूयः स मुनिः संशितव्रतः ।
कृष्ण पायसमिच्छामि भोक्तुमित्येव सत्वरः ।। २२ ।।
फिर तुरंत ही मेरे पास आकर वे कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनि मुझसे इस प्रकार बोले—‘कृष्ण! मैं शीघ्र ही खीर खाना चाहता हूँ’ ।। २२ ।।
तदैव तु मया तस्य चित्तज्ञेन गृहे जनः ।
सर्वाण्यन्नानि पानानि भक्ष्याश्चोच्चावचास्तथा ।। २३ ।।
भवन्तु सत्कृतानीह पूर्वमेव प्रचोदितः ।
ततोऽहं ज्वलमानं वै पायसं प्रत्यवेदयम् ।। २४ ।।
मैं उनके मनकी बात जानता था, इसलिये घरके लोगोंको पहलेसे ही आज्ञा दे दी थी कि ‘सब प्रकारके उत्तम, मध्यम अन्नपान और भक्ष्य-भोज्य पदार्थ आदरपूर्वक तैयार किये जायँ।’ मेरे कथनानुसार सभी चीजें तैयार थीं ही, अतः मैंने मुनिको गरमागरम खीर निवेदन किया ।। २३-२४ ।।
तं भुक्त्वैव स तु क्षिप्रं ततो वचनमब्रवीत् ।
क्षिप्रमङ्गानि लिम्पस्व पायसेनेति स स्म ह ।। २५ ।।
उसको थोड़ा-सा ही खाकर वे तुरंत मुझसे बोले—‘कृष्ण! इस खीरको शीघ्र ही अपने सारे अंगोंमें पोत लो’ ।। २५ ।।
अविमृश्यैव च ततः कृतवानस्मि तत् तथा ।
तेनोच्छिष्टेन गात्राणि शिरश्चैवाभ्यमृक्षयम् ।। २६ ।।
मैंने बिना विचारे ही उनकी इस आज्ञाका पालन किया। वही जूठी खीर मैंने अपने सिरपर तथा अन्य सारे अंगोंमें पोत ली ।। २६ ।।
स ददर्श तदाभ्याशे मातरं ते शुभाननाम् ।
तामपि स्मयमानां स पायसेनाभ्यलेपयम् ।। २७ ।।
इतनेहीमें उन्होंने देखा कि तुम्हारी सुमुखी माता पास ही खड़ी-खड़ी मुसकरा रही हैं। मुनिकी आज्ञा पाकर मैंने मुसकराती हुई तुम्हारी माताके अंगोंमें भी खीर लपेट दी ।। २७ ।।
मुनिः पायसदिग्धाङ्गीं रथे तूर्णमयोजयत् ।
तमारुह्य रथं चैव निर्ययौ स गृहान्मम ।। २८ ।।
जिसके सारे अंगोंमें खीर लिपटी हुई थी, उस महारानी रुक्मिणीको मुनिने तुरंत रथमें जोत दिया और उसी रथपर बैठकर वे मेरे घरसे निकले ।। २८ ।।
अग्निवर्णो ज्वलन् धीमान् स द्विजो रथधुर्यवत् ।
प्रतोदेनातुदद् बालां रुक्मिणीं मम पश्यतः ।। २९ ।।
वे बुद्धिमान् ब्राह्मण दुर्वासा अपने तेजसे अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे। उन्होंने मेरे देखते-देखते जैसे रथके घोड़ोंपर कोड़े चलाये जाते हैं, उसी प्रकार भोली-भाली रुक्मिणीको भी चाबुकसे चोट पहुँचाना आरम्भ किया ॥ २९ ॥ न च मे स्तोकमप्यासीद् दुःखमीर्ष्याकृतं तदा । तथा स राजमार्गेण महता निर्ययौ बहिः ॥ ३० ॥ उस समय मेरे मनमें थोड़ा-सा भी ईर्ष्याजनित दुःख नहीं हुआ। इसी अवस्थामें वे महलसे बाहर आकर विशाल राजमार्गसे चलने लगे ॥ ३० ॥ तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं दाशार्हा जातमन्यवः । तत्राजल्पन् मिथः केचित् समाभाष्य परस्परम् ॥ ३१ ॥ ब्राह्मणा एव जायेरन् नान्यो वर्णः कथंचन । को ह्येनं रथमास्थाय जीवेदन्यः पुमानिह ॥ ३२ ॥ यह महान् आश्चर्यकी बात देखकर दशार्हवंशी यादवोंको बड़ा क्रोध हुआ। उनमेंसे कुछ लोग वहाँ आपसमें इस प्रकार बातें करने लगे—'भाइयो! इस संसारमें ब्राह्मण ही पैदा हों, दूसरा कोई वर्ण किसी तरह पैदा न हो। अन्यथा यहाँ इन बाबाजीके सिवा और कौन पुरुष इस रथपर बैठकर जीवित रह सकता था ॥ ३१-३२ ॥ आशीविषविषं तीक्ष्णं ततस्तीक्ष्णतरो द्विजः । ब्रह्माशीविषदग्धस्य नास्ति कश्चिच्चिकित्सकः ॥ ३३ ॥ 'कहते हैं—विषैले साँपोंका विष बड़ा तीखा होता है, परंतु ब्राह्मण उससे भी अधिक तीक्ष्ण होता है। जो ब्राह्मणरूपी विषधर सर्पसे जलाया गया हो, उसके लिये इस संसारमें कोई चिकित्सक नहीं है' ॥ ३३ ॥ तस्मिन् व्रजति दुर्धर्षे प्रास्खलद् रुक्मिणी पथि । तन्नामर्षयत श्रीमांस्ततस्तूर्णमचोदयत् ॥ ३४ ॥ उन दुर्धर्ष दुर्वासाके इस प्रकार रथसे यात्रा करते समय बेचारी रुक्मिणी रास्तेमें लड़खड़ाकर गिर पड़ी, परंतु श्रीमान् दुर्वासा मुनि इस बातको सहन न कर सके। उन्होंने तुरंत उसे चाबुकसे हाँकना शुरू किया ॥ ३४ ॥ ततः परमसंक्रुद्धो रथात् प्रस्कन्द्य स द्विजः । पदातिरुत्पथेनैव प्राद्रवद् दक्षिणामुखः ॥ ३५ ॥ जब वह बारंबार लड़खड़ाने लगी, तब वे और भी कुपित हो उठे और रथसे कूदकर बिना रास्तेके ही दक्षिण दिशाकी ओर पैदल ही भागने लगे ॥ ३५ ॥ तमुत्पथेन धावन्तमन्वधावं द्विजोत्तमम् । तथैव पायसादिग्धः प्रसीद भगवन्निति ॥ ३६ ॥ इस प्रकार बिना रास्तेके ही दौड़ते हुए विप्रवर दुर्वासाके पीछे-पीछे मैं उसी तरह सारे शरीरमें खीर लपेटे दौड़ने लगा और बोला—'भगवन्! प्रसन्न होइये' ॥ ३६ ॥
ततो विलोक्य तेजस्वी ब्राह्मणो मामुवाच ह । जितः क्रोधस्त्वया कृष्ण प्रकृत्यैव महाभुज ॥ ३७ ॥ न तेऽपराधमिह वै दृष्टवानस्मि सुव्रत । प्रीतोऽस्मि तव गोविन्द वृणु कामान् यथेप्सितान् ॥ ३८ ॥ तब वे तेजस्वी ब्राह्मण मेरी ओर देखकर बोले—‘महाबाहु श्रीकृष्ण! तुमने स्वभावसे ही क्रोधको जीत लिया है। उत्तम व्रतधारी गोविन्द! मैंने यहाँ तुम्हारा कोई भी अपराध नहीं देखा है, अतः तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे मनोवांछित कामनाएँ माँग लो ॥ ३७-३८ ॥
प्रसन्नस्य च मे तात पश्य व्युष्टिं यथाविधि । यावदेव मनुष्याणामन्ने भावो भविष्यति ॥ ३९ ॥ यथैवान्ने तथा तेषां त्वयि भावो भविष्यति । ‘तात! मेरे प्रसन्न होनेका जो भावी फल है, उसे विधिपूर्वक सुनो। जबतक देवताओं और मनुष्योंका अन्नमें प्रेम रहेगा, तबतक जैसा अन्नके प्रति उनका भाव या आकर्षण होगा, वैसा ही तुम्हारे प्रति भी बना रहेगा ॥ ३९ १/२ ॥
यावच्च पुण्या लोकेषु त्वयि कीर्तिर्भविष्यति ॥ ४० ॥ त्रिषु लोकेषु तावच्च वैशिष्ट्यं प्रतिपत्स्यसे । सुप्रियः सर्वलोकस्य भविष्यसि जनार्दन ॥ ४१ ॥ ‘तीनों लोकोंमें जबतक तुम्हारी पुण्यकीर्ति रहेगी, तबतक त्रिभुवनमें तुम प्रधान बने रहोगे। जनार्दन! तुम सब लोगोंके परम प्रिय होओगे ॥ ४०-४१ ॥
यत्ते भिन्नं च दग्धं च यच्च किंचिद् विनाशितम् । सर्वं तथैव द्रष्टासि विशिष्टं वा जनार्दन ॥ ४२ ॥ ‘जनार्दन! तुम्हारी जो-जो वस्तु मैंने तोड़ी-फोड़ी, जलायी या नष्ट कर दी है, वह सब तुम्हें पूर्ववत् या पहलेसे भी अच्छी अवस्थामें सुरक्षित दिखायी देगी ॥ ४२ ॥
यावदेतत् प्रलिप्तं ते गात्रेषु मधुसूदन । अतो मृत्युभयं नास्ति यावदिच्छसि चाच्युत ॥ ४३ ॥ ‘मधुसूदन! तुमने अपने सारे अंगोंमें जहाँतक खीर लगायी है, वहाँतकके अंगोंमें चोट लगनेसे तुम्हें मृत्युका भय नहीं रहेगा। अच्युत! तुम जबतक चाहोगे, यहाँ अमर बने रहोगे ॥ ४३ ॥
न तु पादतले लिप्ते कस्मात्ते पुत्रकाद्य वै । नैतन्मे प्रियमित्येवं स मां प्रीतोऽब्रवीत् तदा ॥ ४४ ॥ इत्युक्तोऽहं शरीरं स्वं ददर्श श्रीसमायुतम् ।
‘परंतु यह खीर तुमने अपने पैरोंके तलवोंमें नहीं लगायी है। बेटा! तुमने ऐसा क्यों किया? तुम्हारा यह कार्य मुझे प्रिय नहीं लगा।’ इस प्रकार जब उन्होंने मुझसे प्रसन्नतापूर्वक कहा, तब मैंने अपने शरीरको अद्भुत कान्तिसे सम्पन्न देखा ।। ४४ १/२ ।। रुक्मिणीं चाब्रवीत् प्रीतः सर्वस्त्रीणां वरं यशः ।। ४५ ।। कीर्तिं चानुत्तमां लोके समवाप्स्यसि शोभने । न त्वां जरा वा रोगो वा वैवर्ण्यं चापि भाविनि ।। ४६ ।। स्प्रक्ष्यन्ति पुण्यगन्धा च कृष्णमाराधयिष्यसि । फिर मुनिने रुक्मिणीसे भी प्रसन्नतापूर्वक कहा—‘शोभने! तुम सम्पूर्ण स्त्रियोंमें उत्तम यश और लोकमें सर्वोत्तम कीर्ति प्राप्त करोगी। भामिनि! तुम्हें बुढ़ापा या रोग अथवा कान्तिहीनता आदि दोष नहीं छू सकेंगे। तुम पवित्र सुगन्धसे सुवासित होकर श्रीकृष्णकी आराधना करोगी ।। ४५-४६ १/२ ।। षोडशानां सहस्राणां वधूनां केशवस्य ह ।। ४७ ।। वरिष्ठा च सलोक्या च केशवस्य भविष्यसि । ‘श्रीकृष्णकी जो सोलह हजार रानियाँ हैं, उन सबमें तुम श्रेष्ठ और पतिके सालोक्यकी अधिकारिणी होओगी’ ।। ४७ १/२ ।। तव मातरमित्युक्त्वा ततो मां पुनरब्रवीत् ।। ४८ ।। प्रस्थितः सुमहातेजा दुर्वासाग्निरिव ज्वलन् । एषैव ते बुद्धिरस्तु ब्राह्मणान्प्रति केशव ।। ४९ ।। प्रद्युम्न! तुम्हारी मातासे ऐसा कहकर वे अग्निके समान प्रज्वलित होनेवाले महातेजस्वी दुर्वासा यहाँसे प्रस्थित होते समय फिर मुझसे बोले—‘केशव! ब्राह्मणोंके प्रति तुम्हारी सदा ऐसी ही बुद्धि बनी रहे’ ।। ४८-४९ ।। इत्युक्त्वा स तदा पुत्र तत्रैवान्तरधीयत । तस्मिन्नन्तर्हिते चाहमुपांशुव्रतमाचरम् ।। ५० ।। यत्किंचिद् ब्राह्मणो ब्रूयात् सर्वं कुर्यामिति प्रभो । प्रभावशाली पुत्र! ऐसा कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके अदृश्य हो जानेपर मैंने अस्पष्ट वाणीमें धीरेसे यह व्रत लिया कि ‘आजसे कोई ब्राह्मण मुझसे जो कुछ कहेगा, वह सब मैं पूर्ण करूँगा’ ।। ५० १/२ ।। एतद् व्रतमहं कृत्वा मात्रा ते सह पुत्रक ।। ५१ ।। ततः परमहृष्टात्मा प्राविशं गृहमेव च । बेटा! ऐसी प्रतिज्ञा करके परम प्रसन्नचित्त होकर मैंने तुम्हारी माताके साथ घरमें प्रवेश किया ।। ५१ १/२ ।। प्रविष्टमात्रश्च गृहे सर्वं पश्यामि तन्नवम् ।। ५२ ।।
यद् भिन्नं यच्च वै दग्धं तेन विप्रेण पुत्रक ।
पुत्र! घरमें प्रवेश करके मैं देखता हूँ तो उन ब्राह्मणने जो कुछ तोड़-फोड़ या जला दिया था, वह सब नूतनरूपसे प्रस्तुत दिखायी दिया ॥ ५२ १/२ ॥
ततोऽहं विस्मयं प्राप्तः सर्वं दृष्ट्वा नवं दृढम् ॥ ५३ ॥
अपूजयं च मनसा रौक्मिणेय सदा द्विजान् ।
रुक्मिणीनन्दन! वे सारी वस्तुएँ नूतन और सुदृढ़ रूपमें उपलब्ध हैं, यह देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ और मैंने मन-ही-मन द्विजोंकी सदा ही पूजा की ॥ ५३ १/२ ॥
इत्यहं रौक्मिणेयस्य पृच्छतो भरतर्षभ ॥ ५४ ॥
माहात्म्यं द्विजमुख्यस्य सर्वमाख्यातवांस्तदा ।
भरतभूषण! रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नके पूछनेपर इस तरह मैंने उनसे विप्रवर दुर्वासाका सारा माहात्म्य कहा था ॥ ५४ १/२ ॥
तथा त्वमपि कौन्तेय ब्राह्मणान् सततं प्रभो ॥ ५५ ॥
पूजयस्व महाभागान् वाग्भिर्दानैश्च नित्यदा ।
प्रभो! कुन्तीनन्दन! इसी प्रकार आप भी सदा मीठे वचन बोलकर और नाना प्रकारके दान देकर महाभाग ब्राह्मणोंकी सर्वदा पूजा करते रहें ॥ ५५ १/२ ॥
एवं व्युष्टिमहं प्राप्तो ब्राह्मणस्य प्रसादजाम् ।
यच्च मामाह भीष्मोऽयं तत्सत्यं भरतर्षभ ॥ ५६ ॥
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार ब्राह्मणके प्रसादसे मुझे उत्तम फल प्राप्त हुआ। ये भीष्मजी मेरे विषयमें जो कुछ कहते हैं, वह सब सत्य है ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि दुर्वासोभिक्षा नाम एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें दुर्वासाकी भिक्षा नामक एक सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५९ ॥
श्रीकृष्णद्वारा भगवान् शङ्करके माहात्म्यका वर्णन
षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णद्वारा भगवान् शङ्करके माहात्म्यका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
दुर्वाससः प्रसादात् ते यत् तदा मधुसूदन ।
अवाप्तमिह विज्ञानं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— मधुसूदन! उस समय दुर्वासाके प्रसादसे इहलोकमें आपको जो विज्ञान प्राप्त हुआ, उसे विस्तारपूर्वक मुझे बताइये ॥ १ ॥
महाभाग्यं च यत् तस्य नामानि च महात्मनः ।
तत् त्वत्तो ज्ञातुमिच्छामि सर्वं मतिमतां वर ॥ २ ॥
बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! उन महात्माके महान् सौभाग्यको और उनके नामोंको मैं यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ। वह सब विस्तारपूर्वक बताइये ॥ २ ॥
वासुदेव उवाच
हन्त ते कीर्तयिष्यामि नमस्कृत्य कपर्दिने ।
यदवाप्तं मया राजन् श्रेयो यच्चार्जितं यशः ॥ ३ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— राजन्! मैं जटाजूटधारी भगवान् शंकरको नमस्कार करके प्रसन्नतापूर्वक यह बता रहा हूँ कि मैंने कौन-सा श्रेय प्राप्त किया और किस यशका उपार्जन किया ॥ ३ ॥
प्रयतः प्रातरुत्थाय यदधीये विशाम्पते ।
प्राञ्जलिः शतरुद्रीयं तन्मे निगदतः शृणु ॥ ४ ॥
प्रजानाथ! मैं प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए हाथ जोड़कर जिस शतरुद्रियका जप एवं पाठ करता हूँ, उसे बता रहा हूँ; सुनो ॥ ४ ॥
प्रजापतिस्तत् ससृजे तपसोऽन्ते महातपाः ।
शङ्करस्त्वसृजत् तात प्रजाः स्थावरजङ्गमाः ॥ ५ ॥
तात! महातपस्वी प्रजापतिने तपस्याके अन्तमें उस शतरुद्रियकी रचना की और शंकरजीने समस्त चराचर प्राणियोंकी सृष्टि की ॥ ५ ॥
नास्ति किंचित् परं भूतं महादेवाद् विशाम्पते ।
इह त्रिष्वपि लोकेषु भूतानां प्रभवो हि सः ॥ ६ ॥
प्रजानाथ! तीनों लोकोंमें महादेवजीसे बढ़कर दूसरा कोई श्रेष्ठ देवता नहीं है; क्योंकि वे समस्त भूतोंकी उत्पत्तिके कारण हैं ॥ ६ ॥
न चैवोत्सहते स्थातुं कश्चिदग्रे महात्मनः ।
न हि भूतं समं तेन त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ ७ ॥ उन महात्मा शंकरके सामने कोई भी खड़ा होनेका साहस नहीं कर सकता। तीनों लोकोंमें कोई भी प्राणी उनकी समता करनेवाला नहीं है ॥ ७ ॥
गन्धेनापि हि संग्रामे तस्य क्रुद्धस्य शत्रवः । विसंज्ञा हतभूयिष्ठा वेपन्ते च पतन्ति च ॥ ८ ॥ संग्राममें जब वे कुपित होते हैं, उस समय उनकी गन्धसे भी सारे शत्रु अचेत और मृतप्राय होकर थर-थर काँपने एवं गिरने लगते हैं ॥ ८ ॥
घोरं च निनदं तस्य पर्जन्यनिनदोपमम् । श्रुत्वा विशीर्येद् हृदयं देवानामपि संयुगे ॥ ९ ॥ संग्राममें मेघगर्जनाके समान गम्भीर उनका घोर सिंहनाद सुनकर देवताओंका भी हृदय विदीर्ण हो सकता है ॥ ९ ॥
यांश्च घोरेण रूपेण पश्येत् क्रुद्धः पिनाकधृत् । न सुरा नासुरा लोके न गन्धर्वा न पन्नगाः ॥ १० ॥ कुपिते सुखमेधन्ते तस्मिन्नपि गुहागताः । पिनाकधारी रुद्र कुपित होकर जिन्हें भयंकररूपसे देख लें, उनके भी हृदयके टुकड़े-टुकड़े हो जायँ। संसारमें भगवान् शंकरके कुपित हो जानेपर देवता, असुर, गन्धर्व और नाग यदि भागकर गुफामें छिप जायँ तो भी सुखसे नहीं रह सकते ॥ १० १/२ ॥
प्रजापतेश्च दक्षस्य यजतो वितते क्रतौ ॥ ११ ॥ विव्याध कुपितो यज्ञं निर्भयस्तु भवस्तदा । धनुषा बाणमुत्सृज्य सघोषं विननाद च ॥ १२ ॥ प्रजापति दक्ष जब यज्ञ कर रहे थे, उस समय उनका यज्ञ आरम्भ होनेपर कुपित हुए भगवान् शंकरने निर्भय होकर उनके यज्ञको अपने बाणोंसे बींध डाला और धनुषसे बाण छोड़कर गम्भीर स्वरमें सिंहनाद किया ॥ ११-१२ ॥
ते न शर्म कुतः शान्तिं विषादं लेभिरे सुराः । विद्धे च सहसा यज्ञे कुपिते च महेश्वरे ॥ १३ ॥ इससे देवता बेचैन हो गये, फिर उन्हें शान्ति कैसे मिले। जब यज्ञ सहसा बाणोंसे बिंध गया और महेश्वर कुपित हो गये तब बेचारे देवता विषादमें डूब गये ॥ १३ ॥
तेन ज्यातलघोषेण सर्वे लोकाः समाकुलाः । बभूवुरवशाः पार्थ विषेदुश्च सुरसुराः ॥ १४ ॥ पार्थ! उनके धनुषकी प्रत्यंचाके शब्दसे समस्त लोक व्याकुल और विवश हो उठे और सभी देवता एवं असुर विषादमें मग्न हो गये ॥ १४ ॥
आपश्चक्षुभिरे चैव चकम्पे च वसुन्धरा । व्यद्रवन् गिरयश्चापि द्यौः पफाल च सर्वशः ॥ १५ ॥
समुद्र आदिका जल क्षुब्ध हो उठा, पृथ्वी काँपने लगी, पर्वत पिघलने लगे और आकाश सब ओरसे फटने-सा लगा ॥ १५ ॥
अन्धेन तमसा लोकाः प्रावृता न चकाशिरे ।
प्रणष्टा ज्योतिषां भाश्व सह सूर्येण भारत ॥ १६ ॥
समस्त लोक घोर अन्धकारसे आवृत होनेके कारण प्रकाशित नहीं होते थे। भारत! ग्रहों और नक्षत्रोंका प्रकाश सूर्यके साथ ही नष्ट (अदृश्य) हो गया ॥ १६ ॥
भृशं भीतास्ततः शान्तिं चक्रुः स्वस्त्ययनानि च ।
ऋषयः सर्वभूतानामात्मनश्च हितैषिणः ॥ १७ ॥
सम्पूर्ण भूतोंका और अपना भी हित चाहनेवाले ऋषि अत्यन्त भयभीत हो शान्ति एवं स्वस्तिवाचन आदि कर्म करने लगे ॥ १७ ॥
ततः सोऽभ्यद्रवद् देवान् रुद्रो रौद्रपराक्रमः ।
भगस्य नयने क्रुद्धः प्रहारेण व्यशातयत् ॥ १८ ॥
तदनन्तर भयानक पराक्रमी रुद्र देवताओंकी ओर दौड़े। उन्होंने क्रोधपूर्वक प्रहार करके भगदेवताके नेत्र नष्ट कर दिये ॥ १८ ॥
पूषणं चाभिदुद्राव पादेन च रुषान्वितः ।
पुरोडाशं भक्षयतो दशनान् वै व्यशातयत् ॥ १९ ॥
फिर उन्होंने रोषमें भरकर पैदल ही पूषादेवताका पीछा किया और पुरोडाश भक्षण करनेवाले उनके दाँतोंको तोड़ डाला ॥ १९ ॥
ततः प्रणेमुर्देवास्ते वेपमानाः स्म शङ्करम् ।
पुनश्च संदधे रुद्रो दीप्तं सुनिशितं शरम् ॥ २० ॥
तब सब देवता काँपते हुए वहाँ भगवान् शंकरको प्रणाम करने लगे। इधर रुद्रदेवने पुनः एक प्रज्वलित एवं तीखे बाणका संधान किया ॥ २० ॥
रुद्रस्य विक्रमं दृष्ट्वा भीता देवाः सहर्षिभिः ।
ततः प्रसादयामासुः शर्वं ते विबुधोत्तमाः ॥ २१ ॥
रुद्रका पराक्रम देखकर ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवता थर्रा उठे। फिर उन श्रेष्ठ देवताओंने भगवान् शिवको प्रसन्न किया ॥ २१ ॥
जेपुश्च शतरुद्रीयं देवाः कृत्वाञ्जलिं तदा ।
संस्तूयमानस्त्रिदशैः प्रसाद महेश्वरः ॥ २२ ॥
उस समय देवतालोग हाथ जोड़कर शतरुद्रियका जप करने लगे। देवताओंके द्वारा अपनी स्तुति की जानेपर महेश्वर प्रसन्न हो गये ॥ २२ ॥
रुद्रस्य भागं यज्ञे च विशिष्टं ते त्वकल्पयन् ।
भयेन त्रिदशा राजन् शरणं च प्रपेदिरे ॥ २३ ॥
राजन्! देवतालोग भयके मारे भगवान् शंकरकी शरणमें गये। उन्होंने यज्ञमें रुद्रके लिये विशिष्ट भागकी कल्पना की (यज्ञावशिष्ट सारी सामग्री रुद्रके अधिकारमें दे दी) ॥ २३ ॥
तेन चैव हि तुष्टेन स यज्ञः संधितोऽभवत् ।
यद् यच्चापहृतं तत्र तत्तथैवान्वजीवयत् ॥ २४ ॥
भगवान् शंकरके संतुष्ट होनेपर वह यज्ञ पुनः पूर्ण हुआ। उसमें जिस-जिस वस्तुको नष्ट किया गया था, उन सबको उन्होंने पुनः पूर्ववत् जीवित कर दिया ॥ २४ ॥
असुराणां पुराण्यासंत्रीणि वीर्यवतां दिवि ।
आयसं राजतं चैव सौवर्णमपि चापरम् ॥ २५ ॥
पूर्वकालमें बलवान् असुरोंके तीन पुर (विमान) थे; जो आकाशमें विचरते रहते थे। उनमेंसे एक लोहेका, दूसरा चाँदीका और तीसरा सोनेका बना हुआ था ॥ २५ ॥
नाशकत् तानि मघवा जेतुं सर्वायुधैरपि ।
अथ सर्वेऽमरा रुद्रं जग्मुः शरणमर्दिताः ॥ २६ ॥
इन्द्र अपने सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग करके भी उन पुरोंपर विजय न पा सके। तब पीड़ित हुए समस्त देवता रुद्रदेवकी शरणमें गये ॥ २६ ॥
तत ऊचुर्महात्मानो देवाः सर्वे समागताः ।
रुद्र रौद्रा भविष्यन्ति पशवः सर्वकर्मसु ॥ २७ ॥
जहि दैत्यान् सह पुरैर्लोकांस्त्रायस्व मानद ।
तदनन्तर वहाँ पधारे हुए सम्पूर्ण महामना देवताओंने रुद्रदेवसे कहा—'भगवन् रुद्र! पशुतुल्य असुर हमारे समस्त कर्मोंके लिये भयंकर हो गये हैं और भविष्यमें भी ये हमें भय देते रहेंगे। अतः मानद! हमारी प्रार्थना है कि आप तीनों पुरोंसहित समस्त दैत्योंका नाश और लोकोंकी रक्षा करें' ॥ २७ १/२ ॥
स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा कृत्वा विष्णुं शरोत्तमम् ॥ २८ ॥
शल्यमग्निं तथा कृत्वा पुङ्खं वैवस्वतं यमम् ।
वेदान् कृत्वा धनुः सर्वान् ज्यां च सावित्रिमुत्तमाम् ॥ २९ ॥
ब्रह्माणं सारथिं कृत्वा विनियुज्य च सर्वशः ।
त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तेन तानि बिभेद सः ॥ ३० ॥
उनके ऐसा कहनेपर भगवान् शिवने 'तथास्तु' कहकर उनकी बात मान ली और भगवान् विष्णुको उत्तम बाण, अग्निको उस बाणका शल्य, वैवस्वत यमको पंख, समस्त वेदोंको धनुष, गायत्रीको उत्तम प्रत्यंचा और ब्रह्माको सारथि बनाकर सबको यथावत् रूपसे अपने-अपने कार्योंमें नियुक्त करके तीन पर्व और तीन शल्यवाले उस बाणके द्वारा उन तीनों पुरोंको विदीर्ण कर डाला ॥ २८—३० ॥
शरेणादित्यवर्णेन कालाग्निसमतेजसा ।
तेऽसुराः सपुरास्तत्र दग्धा रुद्रेण भारत ॥ ३१ ॥