महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1512, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंततो विलोक्य तेजस्वी ब्राह्मणो मामुवाच ह । जितः क्रोधस्त्वया कृष्ण प्रकृत्यैव महाभुज ॥ ३७ ॥ न तेऽपराधमिह वै दृष्टवानस्मि सुव्रत । प्रीतोऽस्मि तव गोविन्द वृणु कामान् यथेप्सितान् ॥ ३८ ॥ तब वे तेजस्वी ब्राह्मण मेरी ओर देखकर बोले—‘महाबाहु श्रीकृष्ण! तुमने स्वभावसे ही क्रोधको जीत लिया है। उत्तम व्रतधारी गोविन्द! मैंने यहाँ तुम्हारा कोई भी अपराध नहीं देखा है, अतः तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे मनोवांछित कामनाएँ माँग लो ॥ ३७-३८ ॥
प्रसन्नस्य च मे तात पश्य व्युष्टिं यथाविधि । यावदेव मनुष्याणामन्ने भावो भविष्यति ॥ ३९ ॥ यथैवान्ने तथा तेषां त्वयि भावो भविष्यति । ‘तात! मेरे प्रसन्न होनेका जो भावी फल है, उसे विधिपूर्वक सुनो। जबतक देवताओं और मनुष्योंका अन्नमें प्रेम रहेगा, तबतक जैसा अन्नके प्रति उनका भाव या आकर्षण होगा, वैसा ही तुम्हारे प्रति भी बना रहेगा ॥ ३९ १/२ ॥
यावच्च पुण्या लोकेषु त्वयि कीर्तिर्भविष्यति ॥ ४० ॥ त्रिषु लोकेषु तावच्च वैशिष्ट्यं प्रतिपत्स्यसे । सुप्रियः सर्वलोकस्य भविष्यसि जनार्दन ॥ ४१ ॥ ‘तीनों लोकोंमें जबतक तुम्हारी पुण्यकीर्ति रहेगी, तबतक त्रिभुवनमें तुम प्रधान बने रहोगे। जनार्दन! तुम सब लोगोंके परम प्रिय होओगे ॥ ४०-४१ ॥
यत्ते भिन्नं च दग्धं च यच्च किंचिद् विनाशितम् । सर्वं तथैव द्रष्टासि विशिष्टं वा जनार्दन ॥ ४२ ॥ ‘जनार्दन! तुम्हारी जो-जो वस्तु मैंने तोड़ी-फोड़ी, जलायी या नष्ट कर दी है, वह सब तुम्हें पूर्ववत् या पहलेसे भी अच्छी अवस्थामें सुरक्षित दिखायी देगी ॥ ४२ ॥
यावदेतत् प्रलिप्तं ते गात्रेषु मधुसूदन । अतो मृत्युभयं नास्ति यावदिच्छसि चाच्युत ॥ ४३ ॥ ‘मधुसूदन! तुमने अपने सारे अंगोंमें जहाँतक खीर लगायी है, वहाँतकके अंगोंमें चोट लगनेसे तुम्हें मृत्युका भय नहीं रहेगा। अच्युत! तुम जबतक चाहोगे, यहाँ अमर बने रहोगे ॥ ४३ ॥
न तु पादतले लिप्ते कस्मात्ते पुत्रकाद्य वै । नैतन्मे प्रियमित्येवं स मां प्रीतोऽब्रवीत् तदा ॥ ४४ ॥ इत्युक्तोऽहं शरीरं स्वं ददर्श श्रीसमायुतम् ।