महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘परंतु यह खीर तुमने अपने पैरोंके तलवोंमें नहीं लगायी है। बेटा! तुमने ऐसा क्यों किया? तुम्हारा यह कार्य मुझे प्रिय नहीं लगा।’ इस प्रकार जब उन्होंने मुझसे प्रसन्नतापूर्वक कहा, तब मैंने अपने शरीरको अद्भुत कान्तिसे सम्पन्न देखा ।। ४४ १/२ ।। रुक्मिणीं चाब्रवीत् प्रीतः सर्वस्त्रीणां वरं यशः ।। ४५ ।। कीर्तिं चानुत्तमां लोके समवाप्स्यसि शोभने । न त्वां जरा वा रोगो वा वैवर्ण्यं चापि भाविनि ।। ४६ ।। स्प्रक्ष्यन्ति पुण्यगन्धा च कृष्णमाराधयिष्यसि । फिर मुनिने रुक्मिणीसे भी प्रसन्नतापूर्वक कहा—‘शोभने! तुम सम्पूर्ण स्त्रियोंमें उत्तम यश और लोकमें सर्वोत्तम कीर्ति प्राप्त करोगी। भामिनि! तुम्हें बुढ़ापा या रोग अथवा कान्तिहीनता आदि दोष नहीं छू सकेंगे। तुम पवित्र सुगन्धसे सुवासित होकर श्रीकृष्णकी आराधना करोगी ।। ४५-४६ १/२ ।। षोडशानां सहस्राणां वधूनां केशवस्य ह ।। ४७ ।। वरिष्ठा च सलोक्या च केशवस्य भविष्यसि । ‘श्रीकृष्णकी जो सोलह हजार रानियाँ हैं, उन सबमें तुम श्रेष्ठ और पतिके सालोक्यकी अधिकारिणी होओगी’ ।। ४७ १/२ ।। तव मातरमित्युक्त्वा ततो मां पुनरब्रवीत् ।। ४८ ।। प्रस्थितः सुमहातेजा दुर्वासाग्निरिव ज्वलन् । एषैव ते बुद्धिरस्तु ब्राह्मणान्प्रति केशव ।। ४९ ।। प्रद्युम्न! तुम्हारी मातासे ऐसा कहकर वे अग्निके समान प्रज्वलित होनेवाले महातेजस्वी दुर्वासा यहाँसे प्रस्थित होते समय फिर मुझसे बोले—‘केशव! ब्राह्मणोंके प्रति तुम्हारी सदा ऐसी ही बुद्धि बनी रहे’ ।। ४८-४९ ।। इत्युक्त्वा स तदा पुत्र तत्रैवान्तरधीयत । तस्मिन्नन्तर्हिते चाहमुपांशुव्रतमाचरम् ।। ५० ।। यत्किंचिद् ब्राह्मणो ब्रूयात् सर्वं कुर्यामिति प्रभो । प्रभावशाली पुत्र! ऐसा कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके अदृश्य हो जानेपर मैंने अस्पष्ट वाणीमें धीरेसे यह व्रत लिया कि ‘आजसे कोई ब्राह्मण मुझसे जो कुछ कहेगा, वह सब मैं पूर्ण करूँगा’ ।। ५० १/२ ।। एतद् व्रतमहं कृत्वा मात्रा ते सह पुत्रक ।। ५१ ।। ततः परमहृष्टात्मा प्राविशं गृहमेव च । बेटा! ऐसी प्रतिज्ञा करके परम प्रसन्नचित्त होकर मैंने तुम्हारी माताके साथ घरमें प्रवेश किया ।। ५१ १/२ ।। प्रविष्टमात्रश्च गृहे सर्वं पश्यामि तन्नवम् ।। ५२ ।।