महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1502, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअलंघयद वै सरितो जिघांसन्
शक्रं वज्रं प्रहरन्तं निरास ।
स महेन्द्रः स्तूयते वै महाध्वरे
विप्रैरेको ऋक्सहस्रैः पुराणैः ॥ २८ ॥
इन्हीं वासुदेवने वज्रका प्रहार करनेके लिये उद्यत हुए इन्द्रको मार डालनेकी इच्छासे कितनी ही सरिताओंको लाँघा और उन्हें परास्त किया था। वे ही महेन्द्ररूप हैं। ब्राह्मण बड़े-बड़े यज्ञोंमें सहस्रों पुरानी ऋचाओंंद्वारा एकमात्र इन्हींकी स्तुति करते हैं ॥ २८ ॥
दुर्वासा वै तेन नान्येन शक्यो
गृहे राजन् वासयितुं महौजाः ।
तमेवाहुर्ऋषिमेकं पुराणं
स विश्वकृद् विधात्यात्मभावान् ॥ २९ ॥
राजन्! इन श्रीकृष्णके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है जो अपने घरमें महातेजस्वी दुर्वासाको ठहरा सके। इनको ही अद्वितीय पुरातन ऋषि कहते हैं। ये ही विश्वनिर्माता हैं और अपने स्वरूपसे ही अनेक पदार्थोंकी सृष्टि करते रहते हैं ॥ २९ ॥
वेदांश्च यो वेदयतेऽधिदेवो
विधींश्च यश्चाश्रयते पुराणान् ।
कामे वेदे लौकिके यत्फलं च
विष्वक्सेनः सर्वमेतत् प्रतीहि ॥ ३० ॥
ये देवताओंके देवता होकर भी वेदोंका अध्ययन करते और प्राचीन विधियोंका आश्रय लेते हैं। लौकिक और वैदिक कर्मका जो फल है, वह सब श्रीकृष्ण ही हैं ऐसा विश्वास करो ॥ ३० ॥
ज्योतींषि शुक्लानि हि सर्वलोके
त्रयो लोका लोकपालास्त्रयश्च ।
त्रयोऽग्नयो व्याहृतयश्च तिस्रः
सर्वे देवा देवकीपुत्र एव ॥ ३१ ॥
ये ही सम्पूर्ण लोकोंकी शुक्लज्योति हैं तथा तीनों लोक, तीनों लोकपाल, त्रिविध अग्नि, तीनों व्याहृतियाँ और सम्पूर्ण देवता भी ये देवकीनन्दन श्रीकृष्ण ही हैं ॥ ३१ ॥
स वत्सरः स ऋतुः सोऽर्धमासः
सोऽहोरात्रः स कला वै स काष्ठाः ।
मात्रा मुहूर्ताश्च लवाः क्षणाश्च
विष्वक्सेनः सर्वमेतत् प्रतीहि ॥ ३२ ॥
संवत्सर, ऋतु, पक्ष, दिन-रात, कला, काष्ठा, मात्रा, मुहूर्त, लव और क्षण—इन सबको श्रीकृष्णका ही स्वरूप समझो ॥ ३२ ॥