भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1503, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1503

चन्द्रादित्यौ ग्रहनक्षत्रताराः सर्वाणि दर्शान्यथ पौर्णमासम् । नक्षत्रयोगा ऋतवश्च पार्थ विष्वक्सेनात् सर्वमेतत् प्रसूतम् ॥ ३३ ॥ पार्थ! चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र, तारा, अमावास्या, पौर्णमासी, नक्षत्रयोग तथा ऋतु— इन सबकी उत्पत्ति श्रीकृष्णसे ही हुई है ॥ ३३ ॥

रुद्रादित्या वसवोऽथाश्विनौ च साध्याश्च विश्वे मरुतां गणाश्च । प्रजापतिर्देवमातादितिश्च सर्वे कृष्णादृषयश्चैव सप्त ॥ ३४ ॥ रुद्र, आदित्य, वसु अश्विनीकुमार, साध्य, विश्वेदेव, मरुद्गण, प्रजापति, देवमाता अदिति और सप्तर्षि—ये सब-के-सब श्रीकृष्णसे ही प्रकट हुए हैं ॥ ३४ ॥

वायुर्भूत्वा विक्षिपेते च विश्व- मग्निर्भूत्वा दहते विश्वरूपः । आपो भूत्वा मज्जयते च सर्वं ब्रह्मा भूत्वा सृजते विश्वसंघान् ॥ ३५ ॥ ये विश्वरूप श्रीकृष्ण ही वायुरूप धारण करके संसारको चेष्टा प्रदान करते हैं, अग्निरूप होकर सबको भस्म करते हैं, जलका रूप धारण करके जगत्‌को डुबाते हैं और ब्रह्मा होकर सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करते हैं ॥ ३५ ॥

वेद्यं च यद् वेदयते च वेद्यं विधिश्च यश्च श्रयते विधेयम् । धर्मे च वेदे च बले च सर्वं चराचरं केशवं त्वं प्रतीहि ॥ ३६ ॥ ये स्वयं वेद्यस्वरूप होकर भी वेदवेद्य तत्त्वको जाननेका प्रयत्न करते हैं। विधिरूप होकर भी विहित कर्मोंका आश्रय लेते हैं। ये ही धर्म, वेद और बलमें स्थित हैं। तुम यह विश्वास करो कि सारा चराचर जगत् श्रीकृष्णका ही स्वरूप है ॥ ३६ ॥

ज्योतिर्भूतः परमोऽसौ पुरस्तात् प्रकाशते यत्प्रभया विश्वरूपः । अपः सृष्ट्वा सर्वभूतात्मयोनिः पुराकरोत् सर्वमेवाथ विश्वम् ॥ ३७ ॥ ये विश्वरूपधारी श्रीकृष्ण परम ज्योतिर्मय सूर्यका रूप धारण करके पूर्व दिशामें प्रकट होते हैं। जिनकी प्रभासे सारा जगत् प्रकाशित होता है। ये समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिके