भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1504, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1504

स्थान हैं। इन्होंने पूर्वकालमें पहले जलकी सृष्टि करके फिर सम्पूर्ण जगत्‌को उत्पन्न किया था॥ ३७ ॥

ऋतूनुत्पातान् विविधान्यद्भुतानि मेघान् विद्युत्सर्वमैरावतं च। सर्वं कृष्णात् स्थावरं जङ्गमं च विश्वात्मानं विष्णुमेनं प्रतीहि॥ ३८ ॥ ऋतु, नाना प्रकारके उत्पात, अनेकानेक अद्भुत पदार्थ, मेघ, बिजली, ऐरावत और सम्पूर्ण चराचर जगत्‌की इन्हींसे उत्पत्ति हुई है। तुम इन्हींको समस्त विश्वका आत्मा—विष्णु समझो॥ ३८ ॥

विश्वावासं निर्गुणं वासुदेवं संकर्षणं जीवभूतं वदन्ति। ततः प्रद्युम्नमनिरुद्धं चतुर्थ- माज्ञापयत्यात्मयोनिर्महात्मा॥ ३९ ॥ ये विश्वके निवासस्थान और निर्गुण हैं। इन्हींको वासुदेव, जीवभूत संकर्षण, प्रद्युम्न और चौथा अनिरुद्ध कहते हैं। ये आत्मयोनि परमात्मा सबको अपनी आज्ञाके अधीन रखते हैं॥ ३९ ॥

स पञ्चाधा पञ्चजनोपपन्नं संचोदयन् विश्वमिदं सिसृक्षुः। ततश्चकारावनिमारुतौ च खं ज्योतिरम्भश्च तथैव पार्थ॥ ४० ॥ कुन्तीकुमार! ये देवता, असुर, मनुष्य, पितर और तिर्यग् रूपसे पाँच प्रकारके संसारकी सृष्टि करनेकी इच्छा रखकर पञ्चभूतोंसे युक्त जगत्‌के प्रेरक होकर सबको अपने अधीन रखते हैं। उन्होंने ही क्रमशः पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाशकी सृष्टि की है॥ ४० ॥

स स्थावरं जङ्गमं चैवमेत- च्चतुर्विधं लोकमिमं च कृत्वा। ततो भूमिं व्यदधात् पञ्चबीजां द्यौः पृथिव्यां धास्यति भूरि वारि॥ ४१ ॥ इन्होंने जरायुज आदि चार प्रकारके प्राणियोंसे युक्त इस चराचर जगत्‌की सृष्टि करके चतुर्विध भूत-समुदाय और कर्म—इन पाँचोंकी बीजरूपा भूमिका निर्माण किया। ये ही आकाशस्वरूप बनकर इस पृथ्वीपर प्रचुर जलकी वर्षा करते हैं॥ ४१ ॥

तेन विश्वं कृतमेतद्धि राजन् स जीवयत्यात्मनैवात्मयोनिः। ततो देवानसुरान् मानवांश्च